भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८७

पर समारोपित कर दिया था ॥८१॥ पति के मृत हो जाने पर उसने कुछ भी खाया नहीं था—शोक हृदय में बैठा ही था—ऐसे दुःखों से अपने स्वामी से वियोग के दुःख से वह बहुत कशित हो गयी थी। अतः उसने भी अपने आपको भी अग्नि में पति के ही शव के साथ प्रवेश कर सती हो जाने का सुदृढ़ निश्चय कर लिया था ॥८२॥ और्व महामुनि ने यह सम्पूर्ण समाचार सुना तो वे महामुनि स्वयं ही अपने आश्रम से बाहिर निकलकर आ गये थे और उससे यह वचन कहा था ॥८३॥ हे राज्ञि ! तुमको इस समय में पति के साथ प्राणत्याग नहीं करना चाहिए कारण यह है कि तुम्हारे उदर में पुत्र स्थित है जो कि समस्त चक्रवर्त्तियों में परम श्रेष्ठ होगा ॥८४॥

इति तद्वचनं श्रुत्वा माता तव मनस्विनी । विरराम मृतेस्तां तु मुनिः स्वाश्रममानयत् । ततः सा सर्वदुःखानि नियम्य त्वन्मुखांबुजम् ॥८५॥ दिदृक्षुराश्रमोपांते तस्यैव न्यवसत्सुखम् । सुषाव च ततः काले सा त्वामौर्वाश्रमे तदा ॥८६॥ जातकर्मादिकं सर्वं भवतः सोऽकरोन्मुनिः । और्वाश्रमे विवृद्धश्च भवांस्तेनानुकंपितः ॥८७॥ त्वयैव विदितं सर्वमतः परमरिंदम । एवं प्रभावो नृपतिः कार्त्तवीर्योऽभवद्भुवि ॥८८॥ व्रतस्यास्य प्रभावेण सर्वलोकेषु विश्रुतः । यद्धर्णौर्जितो युद्धे पिता ते वनमाविशत् ॥८९॥ तद्वृत्तांतमशेषेण मया ते समुदीरितम् । एतच्च सर्वमाख्यातं व्रतानामुत्तमं तव ॥६०॥ समन्त्रतन्त्रं लोकेषु सर्वलोकफलप्रदम् । न ह्यस्य कर्तुर्नृपतेः पुरुषार्थचतुष्टये ॥६१॥

तुम्हारी मनस्विनी माता ने इस उस मुनि के वचन का श्रवण किया था तो फिर वह सती होकर दग्ध होने से कार्य से विरत हो गयी थी और फिर उसको वह मुनि अपने आश्रम में ले आये थे। इसके पश्चात् उसने सब दुःखों की ओर से अपने मन को नियमित कर लिया था तथा उस गर्भस्थ