भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अपने बालक के मुख कमल को देखने की इच्छा वाली होकर उसी आश्रम के समीप में सुख पूर्वक निवास कर रही थी ।८५। जब प्रसव काल उपस्थित हुआ तो उसने उसी और्व मुनि के आश्रम में प्रसव किया था ।८६। उसी मुनि ने आपका समस्त जातकर्म आदि संस्कार किया था और आप उसी मुनि की कृपा के भाजन होते हुए और्वाश्रय में ही पालित होकर बड़े हुए हैं ।८७। हे अरिन्दम ! इसके पश्चात् जो भी कुछ हुआ है वह आपको सब ज्ञात ही है । इस प्रकार के प्रभाव वाला राजा कार्त्तवीर्य इस भूमण्डल पर हुआ था ।८८। इसी व्रत के प्रभाव से वह लोकों में प्रख्यात हुआ है । जिसके वंश में समुत्पन्न होने वालों के द्वारा आपके पिता को युद्ध में जीत लिया गया है और वन में चले गये थे ।८९। उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने आपको कहकर सुना दिया है और यह सब व्रतों में उत्तम व्रत मैंने आपको बतला दिया है ।९०। यह ऐसा व्रत है कि लोकों में मन्त्रों और तन्त्रों के सहित सब ही लौकिक फल को प्रदान कर देने वाला है । जो इस व्रत को राजा किया करता है उसको चारों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) पुरुषार्थों की प्राप्ति हो जाया करती है ।९१।

भवत्यभीप्सितं किञ्चिद्दुर्लभं भुवनत्रये ।
संक्षेपेण मयाख्यातं व्रतं हैहयभूभुजः ।
जामदग्न्यस्य च मुने किमन्यत्कथयामि ते ॥६२॥

जैमिनिरुवाच-

ततः स सगरो राजा कृतांजलिपुटो मुनिम् ॥६३॥
उवाच भगवन्नेतत्कर्तुमिच्छाम्यहं व्रतम् ।
सम्यक्त्वमुपदेशेन तत्रानुज्ञां प्रयच्छ मे ॥६४॥
कर्मणानेन विप्रर्षे कृतार्थोऽस्मि न संशयः ।
इत्युक्तस्तेन राज्ञा तु तथेत्युक्त्वा महामुनिः ॥६५॥
दीक्षयामास राजानं शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
स दीक्षितो वसिष्ठेन सगरो राजसत्तमः ॥६६॥
द्रव्याण्यानीय विधिवत्प्रचचार शुभव्रतम् ।
पूजयित्वा जगन्नाथं विधिना तेन पार्थिवः ॥६७॥