संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर-प्रतिज्ञा पालन ] [ ३६१
कर्म ऐसे थे कि वह वृद्धों के सम्मत थे ।२। वह दिन में भोजन नहीं करता है अथवा रात्रि में शयन भी नहीं किया करता है और स्मरण करता हुआ बहुत लम्बी श्वास लिया करता है जो कि बहुत गर्म होती हैं तथा उसका हृदय रात दिन अत्यन्त ही उद्विग्न रहता है ।३। जब राजा ने यह श्रवण किया था कि अपने गुरु को अवजित करके अपना सम्पूर्ण राज्य शत्रुओं ने ले लिया है । वह पिता पराजित होकर मेरी माता के सहित बहुत ही गहन वन में प्रयाण कर गये हैं और वहाँ पर ही स्वर्गलोक के प्रवासी हो गये हैं । उस पर इक्ष्वाकु के वंश में समुत्पन्न उसने महान् क्रोध से युक्त होकर तथा शोक से संविष्ट होते हुए सत्प्रतिज्ञा वाले ने समस्त शत्रुओं के कुल का उच्छेदन करने के लिये तुरन्त ही प्रतिज्ञा की थी और इस परिभव की थी और इस परिभव की अग्नि को कठिनाई से सहन किया था ।४। फिर किसी समय में उस महीपाल ने मङ्गल कौतुक करके सब दिशाओं में क्रम से जाकर शत्रु के जीतने का मन में विचार किया था ।५। वह राजा अनेकों सहस्र रथ-अश्व-गज और सैनिकों से सब ओर से संवृत होकर अपने उत्तम- पुर से निकल दिया था ।६। उस राजाने शत्रुओं को जीतने के लिए प्रस्थान कर दिया था । जिस समय में वहाँ से चला है उस समय में उसकी सेनाओं का ऐसा विशाल समुदाय उसके साथ में था कि उसमें जो अश्व थे वे ऊपर की ओर उछालें मार रहे थे कि ऐसा प्रतीत होता था मानों अत्युच्च तरङ्गों से समाकुल जलनिधि ही होवे । वह सेना छहों अङ्गों से युक्त थी । मत्त हाथियों के समूह ऐसे थे मानों भूमण्डल कुलगिरियों के समुदाय से संयुत है । उसकी सेनामें श्वेत ध्वजाओं के समूह आकाश में फहरा रहे थे जो ऐसा आभास हो रहा था कि पूर्ण अन्तरिक्ष चन्द्रमा की किरणों से श्वेत चमक रहा हो । ऐसी महान् विशाल सेना को साथ लेकर ही वह चला था ।७।
तस्याग्रेसरसैन्ययूथचरणप्रक्षुण्णशैलोच्चयः क्षोदापूरितनिम्नभागमवनीपालस्य संयास्यतः । प्रत्येकं चतुरङ्गसैन्यनिकरप्रक्षोदसंभूतरेणुप्रावृतिरुत्स्थली समभवद्भूमिस्तु तत्रानिशम् ॥८
निघ्नन्दृप्ताननेकान्द्विपतुरगरथव्यूहसंभिन्नवीरान्सद्यः शोभां दधानोऽसुरनिकरचमूनिघ्नतश्चन्द्रमौलिः । दूरादेवाभिशंसन्नरिनगरनिरोधेषु कर्माभिषंगे तेषां शीघ्रापयानक्षणमभिदिशति प्राणिधेयं विधत्ते ॥६