भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

सगर-प्रतिज्ञा पालन ] [ ३६१

कर्म ऐसे थे कि वह वृद्धों के सम्मत थे ।२। वह दिन में भोजन नहीं करता है अथवा रात्रि में शयन भी नहीं किया करता है और स्मरण करता हुआ बहुत लम्बी श्वास लिया करता है जो कि बहुत गर्म होती हैं तथा उसका हृदय रात दिन अत्यन्त ही उद्विग्न रहता है ।३। जब राजा ने यह श्रवण किया था कि अपने गुरु को अवजित करके अपना सम्पूर्ण राज्य शत्रुओं ने ले लिया है । वह पिता पराजित होकर मेरी माता के सहित बहुत ही गहन वन में प्रयाण कर गये हैं और वहाँ पर ही स्वर्गलोक के प्रवासी हो गये हैं । उस पर इक्ष्वाकु के वंश में समुत्पन्न उसने महान् क्रोध से युक्त होकर तथा शोक से संविष्ट होते हुए सत्प्रतिज्ञा वाले ने समस्त शत्रुओं के कुल का उच्छेदन करने के लिये तुरन्त ही प्रतिज्ञा की थी और इस परिभव की थी और इस परिभव की अग्नि को कठिनाई से सहन किया था ।४। फिर किसी समय में उस महीपाल ने मङ्गल कौतुक करके सब दिशाओं में क्रम से जाकर शत्रु के जीतने का मन में विचार किया था ।५। वह राजा अनेकों सहस्र रथ-अश्व-गज और सैनिकों से सब ओर से संवृत होकर अपने उत्तम- पुर से निकल दिया था ।६। उस राजाने शत्रुओं को जीतने के लिए प्रस्थान कर दिया था । जिस समय में वहाँ से चला है उस समय में उसकी सेनाओं का ऐसा विशाल समुदाय उसके साथ में था कि उसमें जो अश्व थे वे ऊपर की ओर उछालें मार रहे थे कि ऐसा प्रतीत होता था मानों अत्युच्च तरङ्गों से समाकुल जलनिधि ही होवे । वह सेना छहों अङ्गों से युक्त थी । मत्त हाथियों के समूह ऐसे थे मानों भूमण्डल कुलगिरियों के समुदाय से संयुत है । उसकी सेनामें श्वेत ध्वजाओं के समूह आकाश में फहरा रहे थे जो ऐसा आभास हो रहा था कि पूर्ण अन्तरिक्ष चन्द्रमा की किरणों से श्वेत चमक रहा हो । ऐसी महान् विशाल सेना को साथ लेकर ही वह चला था ।७।

तस्याग्रेसरसैन्ययूथचरणप्रक्षुण्णशैलोच्चयः क्षोदापूरितनिम्नभागमवनीपालस्य संयास्यतः । प्रत्येकं चतुरङ्गसैन्यनिकरप्रक्षोदसंभूतरेणुप्रावृतिरुत्स्थली समभवद्भूमिस्तु तत्रानिशम् ॥८

निघ्नन्दृप्ताननेकान्द्विपतुरगरथव्यूहसंभिन्नवीरान्सद्यः शोभां दधानोऽसुरनिकरचमूनिघ्नतश्चन्द्रमौलिः । दूरादेवाभिशंसन्नरिनगरनिरोधेषु कर्माभिषंगे तेषां शीघ्रापयानक्षणमभिदिशति प्राणिधेयं विधत्ते ॥६

३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विजिगीषुर्दिशो राजा राज्ञो यस्याभियास्यति ॥१० विषयं स नृपस्तस्य सद्यः प्रणतिमेष्यति । विजित्य नृपतीन्सर्वान्कृत्वा च स्वपदानुगान् ॥११ संकेतगामिनः कांश्चित्कृत्वा राज्ये न्यवर्त्तत । एवं स विसरन्दिक्षु दक्षिणाभिमुखो नृपः ॥१२ स्मरन्पूर्वकृतं वैरं हैहयानभ्यवर्त्तत । ततस्तस्य नृपैः सार्द्धं समग्ररथकुंजरैः ॥१३ बभूव हैहयैर्वीरैः संग्रामो रोमहर्षणः । राज्ञां यत्र सहस्राणि स बलानि महाहवे ॥१४

जिस समय में वह राजा सम्प्रयाण कर रहा था उस समय में उसकी जो सबसे आगे चलने वाली सेना के समुदायों के चरणों से शैलों के उच्च-भाग क्षुण्ण हुए थे उनके क्षोदों से निम्न भाग जो भूमि में थे वे भर गये थे और चतुरङ्गिणी सेना के हाथी-अश्व-रथ और पैदल सैनिकों के हर एक के एक के चरणों से जो भूमि खुदकर प्रक्षोद रेणु उठी थी उससे ऊँचे स्थल ढक गये थे । इस तरह से वह भूमि निरन्तर ऐसी ही होगयी थी ।८। अनेक दृप्त अर्थात् दर्प से परिपूर्ण हाथी-घोड़े और रथों के व्यूह से संभिन्न वीरों को निहनन करने वाले उसकी शोभा तुरन्त ही असुरों के समूहों की सेनाओं का हनन करने वाले भगवान् शिव की शोभा को धारण वह नृप कर रहा था । उनके कर्मों के अभिषङ्ग होने पर दूर से ही शत्रुओं के नगर के विरोधों में ऐसा अभिशंसन करते हुए कि यहाँ से शीघ्र ही कहीं से भाग जाने के क्षणों का निर्देश करता है और प्राणियों के धैर्य का किया करता है ।६। वह राजा जिसको सब दिशाओं में विजय प्राप्त करने की इच्छा है जिस राजा के ऊपर अभिमान करेगा ।१०। वह राजा उसके देश की प्रणति को प्राप्त करा देगा । उस नृप ने सभी नृपतियों को जीतकर उनको अपने चरणों का अनुचर बना लिया था ।११। उसे महान् वीर राजा ने कुछ नृपों की सङ्केत पर गमन करने वाले बनाकर उनको अपने ही राज्य पर भेज दिया था अर्थात् अपनी आज्ञा के इशारे वाले होना उन्होंने स्वीकार कर लिया था तो उनको राज्य पर बिठा दिया था । इस रीति से विसरण सब दिशाओं में करके फिर राजा दक्षिण की ओर अभिमुख हुआ था ।१२। उस राजा ने अपने साथ पूर्व में की हुई शत्रुता स्मरण करके हैहय राजाओं के ऊपर

सगर-प्रतिज्ञा पालन ] [ ३६३

आक्रमण किया था। फिर उन सबके साथ जो पूर्णतया रथों और हाथियों से संयुत थे इसका महान् युद्ध हुआ था। १३। उन हैहय वीरों के साथ उसका बड़ा ही रोमाञ्चकारी भीषण युद्ध हुआ था जिस युद्ध में सहस्रों राजा थे और बड़ी विशाल सेनाएं भी थीं। १४।

निजघान महाबाहुः संक्रुद्धः कोसलेश्वरः ।
जित्वा हैहयभूपालान्भंक्त्वा दग्ध्वा च तत्पुरीम् ॥१५
निःशेषशून्यामकरोद्वैरांतकरणो नृपः ।
समग्रबलसंमर्द्दप्रमृष्टाशेषभूतलः ॥१६
हैहयानामशेषं तु चक्रे राज्यं रजः समम् ।
राज्यं पुरीं चापहाय भ्रष्टैश्वर्या हतत्विषः ॥१७
राजानो हतभूयिष्ठा व्यद्रवंत समंततः ।
अभिद्रुत्य नृपांस्तांस्तु द्रवमाणान्महीपतिः ॥१८
जघान सानुगान्मत्तः प्रजाः क्रुद्ध इवांतकः ।
ततस्तान्प्रति सक्रोधः सगरः समरेऽरिहा ॥१९
मुमोचास्त्रं महारौद्रं भार्गवं रिपुभीषणम् ।
तेनोत्सृष्टातिरोद्रत्रिभुवनभयदप्रस्फुरद्भागैवास्त्र-
ज्वालादंदह्यमानावशतनुततयस्ते नृपाः सद्य एव ।
वाय्वस्त्रावृत्तधूमोगमपटलतमोमुष्टदृष्टिप्रसारा
भ्रेमुर्भू पृष्ठलोठद्वहुलतमरजो गूढमात्रा मुहूर्त्त म् ॥२०
आग्नेयास्त्रप्रतापप्रतिहतगतयोऽदृष्टमार्गाः समंता-
द्भूपाला नष्टसंघाः परवशतनवो व्याकुलीभूतचित्ताः ।
भीताः संत्युक्तवस्त्रायुधकवचविभूषादिका मुक्तकेशा
विस्पष्टोन्मत्तभावानृशतरमनुकुर्वत्यग्रतः
शात्रवाणाम् ॥२१

उन सभी का निहनन महान् बाहुओं वाले कोसलेश्वर ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर कर दिया था। फिर हैहय नृपों को जीतकर उनकी पुरी को तोड़-कर दग्ध कर दिया था। १५। वैर के अन्त करने वाले नृप ने उनकी पुरी

३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

को पूर्णतया शून्य कर दिया था । वह राजा ऐसा बलवान् था कि उसने अपनी समग्र सेना के द्वारा मर्दन करके सबको भीड़ डाला था और सम्पूर्ण भूतल को प्रमृष्ट कर दिया था ।१६। उस राजा ने हैहयों के समस्त राज्य को धूल में मिला दिया था। जब वहाँ कुछ भी शेष न रहा तो वे सब अपने राज्य और पुरोंको छोड़कर क्षीण कान्ति वाले और विनष्ट ऐश्वर्य वाले हो गये थे ।१७। जो राजा मरने से बच गये थे ऐसे बहुत से वहाँ चारों ओर भाग गये थे । उस महीपति ने जो भी वहाँ से भाग रहे थे उनको वेग से आगे बढ़कर निग्रहीत कर लिया था ।१८। इस मदोन्मत्त बलवान् नृप ने क्रुद्ध अन्तक जैसे प्रजाओं को मार दिया करता है वैसे ही इसने भी सबका संहार कर दिया था । समर में शत्रुओं के हनन करने वाले राजा सगर ने उन पर बड़ा भारी क्रोध किया था ।१६। फिर सगर नृप ने महान् रौद्र-शत्रुओं के लिये बहुत ही भीषण भार्गव अस्त्र को उन पर छोड़ा था । इस महास्त्र का बड़ा भारी सब पर प्रभाव पड़ा था । उसके छोड़े जाने पर जो कि अत्यन्त ही रौद्र था, वह तीनों भुवनों को भय देने वाला था । ऐसा प्रस्फुरण करता हुआ जो भार्गव अस्त्र था उसकी ज्वालाओं से दग्ध होते हुए और अवश शरीरों वाले वे समस्त नृपगण हो गये थे । इसके उपरान्त जो वायु-अस्त्र का प्रयोग करने से चारों ओर धूम के समूह ने उनको ऐसा घेर लिया था कि वहाँ पर घोर अन्धकार से उन को दृष्टि भी मुष्ट हो गयी थी अर्थात् देखने की शक्ति समाप्त हो गयी थी और मुहूर्त्त भर तक तो वे सब अधिक अन्धकार और रज से ढके हुए होकर भूमि के पृष्ठ पर लोटते हुए चक्कर काट रहे थे ।२०। शत्रुओं के सैनिकों की दशा उस समय में ऐसी हो गयी थी कि छोड़े हुए आग्नेयास्त्र के प्रताप से जिनकी गति प्रतिहत हो गयी है अर्थात् वे चलने में असमर्थ हो गये थे क्योंकि उनको उस समय में मार्ग दिखलाई नहीं दे रहा था—चारों ओर उन नृपों के सङ्ग नष्ट हो गये थे और उनके शरीर परवश हो गये थे तथा उनके चित्त व्याकुल हो गये थे । वे ऐसे भीत हो गये थे कि उन्होंने अपने वस्त्र-आयुध-कवच और विभूषा आदि सबका त्याग कर दिया था-उनके मस्तकों के केश खुले हुए थे—वे सब अत्यन्त उन्मत्तों के ही भावों का उस समय में अनुकरण कर रहे थे ।२१।

विजित्य हैहयान्सर्वान्समरे सगरो बली ।
संक्षुब्धसागराकारः काम्बोजानभ्यवर्तत ॥२२॥

सगर-प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६५

नानावादित्रघोषाहतपटहरवाकर्णनध्वस्तधैर्याः सद्यः संत्यक्तराज्यस्वबलपुरपुरंध्रीसमूहा विमूढाः । कांबोजास्तालजंघाः शकयवनकिरातादयः साकमेते भ्रमुर्भूर्यंत्रभीत्या दिशि दिशि रिपवो यस्य पूर्वापराधाः ॥२३

भीतास्तस्त नरेश्वरस्य रिपवः केचित्प्रता- पानलज्वालामुष्टदृशो विसृज्य वसतिं राज्यं च पुत्रादिभिः । द्विट्सैन्यैः समभिद्रुता वनभुवं संप्राप्य तत्रापि तेऽ- स्तैमित्यं समुपागता गिरिगुहासुप्तोत्थितेन द्विपः ॥२४

तालजंघान्निहत्याजौ राजा सबलवाहनान् । क्रमेण नाशयामास तद्राज्यमरिकर्षणः ॥२५

ततो यवनकांबोजकिरादीननेकंशः । निजघान रुषाविष्टः पल्हवान्पारदानपि ॥२६

हन्यमानास्तु ते सर्वे राजानस्तेन संयुगे । द्रुद्रुवुः संघशो भीता ह्यवशिष्टाः समंततः ॥२७

युष्माभिर्यस्य राज्यं बहुभिरपहृतं तस्य पुत्रोऽधुनाऽहं हन्तुं वः सप्रतिज्ञ प्रसममुपगतो वैरनिर्यातनैषी । इत्युच्चैः श्रावयाणो युधि निजचरितं वैरिभिर्नागवीर्यः क्षत्रैर्विध्वंसितेजाः सगरनरपतिः स्मारयामास भूपः ॥२८

समर में उस समय में सगर नृप ने सब हैहय नृपों को पराजित करके वह बलवान् नृप संक्षुब्धसागर के समान आकार वाला हो गया था और फिर उसने काम्बोजों पर आक्रमण किया था ।२२। जिन्होंने सगर नृप का पहिले अपराध किया था वे सब इस समय में बहुत ही बुरी दशा में पड़कर दिशाओं में मारे-मारे इसके शत्रुगण भूमि पर भ्रमण कर रहे थे अर्थात् प्राणों की रक्षा के लिए भटकते हुए घूम रहे थे । जब युद्ध में अनेक तरह के वाद्यों के घोष से और पटहों की ध्वनि के श्रवण करने से उन सब

३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

की धीरज छूट गया था-उन्होंने तुरन्त ही अपना राज्य-सेना और स्त्रियों का भी त्याग कर दिया और किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये थे । इनके अतिरिक्त तालजङ्घ-काम्बोज-शक-पवन और किरात आदि सब साथ ही साथ अस्त्रों के भय से भ्रमण कर रहे थे ।२३। उस सगर नरेश्वर के भय से डरे हुए शत्रुगण उस समय में ऐसे हो गये कि कुछ की तो प्रताप की अग्नि की ज्वाला से दृष्टि ही नष्ट हो गयी थी और वे सब अपना राज्य-वसति का त्यागकर के पुत्रादि के साथ शत्रु की सेनाओं से खदेड़े हुए जङ्गम में पहुँच गये थे वहाँ पर भी उनके नेत्रों में स्तिमता छाया हुआ था जैसे कि गिरियों की गुफाओं में सोकर उठने पर होता है । तात्पर्य यह है कि वन में भी उनको कुछ सूझ नहीं रहा था ।२४। शत्रुओं से कर्षण करने वाले उस राजा ने रण में तालजङ्घों को निहत करके और उनके सैनिक तथा वाहनों का विनाश करके उसने क्रम से उनके राज्य का ध्वंस कर दिया था ।२५। इसके अनन्तर पवन-काम्बोज और किरात आदि तथा वल्हव एवं पारद प्रभृति को सब को क्रोध में समाविष्ट होकर राजा सगर ने मार गिराया था ।२६। उस महायुद्ध में मारे जाते हुए वे सब राजा लोग उस प्रतापी राजा के द्वारा प्रताड़ित होकर मरने से जो भी कुछ बच गये थे भयभीत होते हुए समुदाय के समुदाय चारों ओर भाग गये थे ।२७। वे सब परस्पर में यह कहते हुए और बहुत ही ऊँचे स्वर से चिल्लाते हुए भाग रहे थे कि आप सब ने जिसके राज्य को वर वश छीन लिया था उसी का पुत्र यह है जो इस समय के अपने बैर को निकालने की इच्छा वाला होकर जबरदस्ती से यहाँ उपगत हुआ है-हाथियों के समान वीर्यवाले सगर नृप ने जिसका तेज ही विध्वंसकारी है उस युद्ध क्षेत्र में वैरियों के द्वारा अपना चरित सुनाता हुआ उन्हें याद करा रहा था ।२८।

तं दृष्ट्वा राजवर्यं सकलरिपुकुलप्रक्षयोपात्तदोक्षं भीताः स्त्रीबालपूर्वं शरणमभिययुः स्वासुसंरक्षणाय । इक्ष्वाकूणां वसिष्ठं कुलगुरुमभितः सप्त राज्ञां कुलेषु प्रख्याताः संप्रसूता नृपवररिपवः पारदाः पल्हवाद्याः ॥२९ वसिष्ठाश्रमोपांते वसंतमृषिभिर्वृतम् । उपगम्याब्रुवन्सर्वे कृतांजलिपुटा नृपाः ॥३०

सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६७

शरणं भव नो ब्रह्मन्नार्त्तानामभयैषिणाम् । सगरास्त्राग्निानिर्दग्धशरीराणां मुमूर्षताम् ।।३१ स हन्त्यस्मानशेषेण वैरांतकरणोन्मुखः । तस्माद्भयाद्धि निष्क्रांता वयं जीवितकांक्षिणः ।।३२ विभिन्नराज्यभोगर्द्धिस्र्वदारापत्यबांधवाः । केवलं प्राणरक्षार्थं त्वां स्वयं शरणं गतः ।।३३ न ह्यन्योऽस्ति पुमाँल्लोके सौहृदेन बलेन वा । यस्तं निवर्त्तयित्वास्मान्पालयेन्महतो भयात् ।।३४ त्वं किलाक्र्कान्वयभुवां राज्ञां कुलगुरुवृतः । तद्वंशपूर्वजे भूपैस्त्वत्प्रभावश्च तादृशः ।।३५

समस्त शत्रुओं के कुलों का पूर्णतया क्षय करने को दीक्षा ग्रहण करने वाले उस राजा को देखकर डरे हुए सब शत्रुगण स्त्री और बच्चों को आगे करके अपने प्राणों की रक्षा के लिए सगर नृप की शरणागति में आ गये। इक्ष्वाकु के वंशजों के कुलगुरु वसिष्ठजी के चारों ओर वे सात राजाओं के कुलों में परम प्रसिद्ध समुत्पन्न हुए पारद और वह्लव आदि सगर के शत्रु राजा उपस्थित हुए थे ।२९। वसिष्ठजी के समीप में ही ऋषियों से घिरे हुए निवास कर रहे थे। वहाँ पर उन सबने उपगत होकर हाथ जोड़कर उनसे कहा था ।३०। हे ब्रह्मन् आप ही हमारे रक्षा करने वाले होंवे। हम बहुत ही आर्त्त हैं और अभय दान के इच्छुक हैं। हम सब राजा सगर के अस्त्र को अग्नि से निर्दग्ध शरीर वाले हैं और मर रहे हैं ।३१। वह राजा सगर तो अपने वैर का अन्त करने के लिए उन्मुख हो रहा है और हम सबको ही मार रहा है। उसी के भय से हम निकलकर भागे हुए हैं और अपने जीवन की रक्षा के चाहने वाले हैं ।३२। हमारा सबका राज्य-भोग-समृद्धि-स्त्री-सन्तति और बान्धव सभी कुछ विभिन्न हो गया है। अब तो हम केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए आपको शरणागति में आये हैं ।३३। इस लोक में आपके सिवाय अन्य कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो सौहार्द से तथा बल-विक्रम से उसको हटाकर इस महान भय से हमारी रक्षा कर सके ।३४। आप तो निश्चित रूप से सूर्य वंश के भूपों के कुलगुरु माने गये हैं और उस राजा के वंश में जो भी पूर्वज हुए थे उन सबने आपको कुलगुरु बनाया है और इन सब पर भी आपका प्रभाव उसी प्रकार का है ।३५।

३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेनायं सगरोऽप्यद्य गुरुगौरवयंत्रितः ।
भवन्निदेशं नात्येति वेलामिव महोदधिः ॥३६
त्वं नः सुहृत्पिता माता लोकानां च गुरुर्विभो ।
तस्मादस्मान्महाभाग परित्रातुं त्वमर्हसि ॥३७
जैमिनिरुवाच-
इति तेषां वचः श्रुत्वा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
शनैर्विलोकयामास शरणं समुपागतान् ॥३८
वृद्धस्त्रीबालभूयिष्ठान्हतशेषान्नृपान्वयान् ।
दृष्ट्वा त्वतप्यद्भगवान्सर्वभूतानुकंपकः ॥३९
चिरं निरूप्य मनसा तान्विलोक्य च सादरम् ।
उज्जीवयञ्छनैर्वाचा मा भैष्टेति महामतिः ॥४०
अथावोचन्महाभागः कृपया परयान्वितः ।
समये स्थापयामास राज्ञस्ताञ्जीविताथिनः ॥४१
भूपव्याकोपदग्धं नृपकुलविहिताशेषधर्मादपेतं
कृत्वा तेषां वसिष्ठः समयमवनिपालप्रतिज्ञानिवृत्त्यै ।
गत्वा तं राजवर्यं स्वयमथ शनकैः सांत्वयित्वा यथावत् ।
सप्राणानामरीणामपगमनविधावभ्यनुज्ञां ययाचे ॥४२

इस कारण से आज भी यह राजा सगर अपने कुलगुरु आपके गौरव से यन्त्रित है। यह कभी भी आपके आदेश का उलंघन अपनी मर्यादा को समुद्र की भाँति नहीं करता है।३६। हे विभो ! हमारे तो इस समय में आप लोगों के गुरु हैं। इसलिए हे महाभाग ! आप ही इससे हमारी रक्षा करने के योग्य होते हैं।३७। जैमिनि ने कहा—ऋषिवर भगवान् वसिष्ठजी ने उनके इस वचन का श्रवण करके शरणागति में समागत उनको धीरे से अवलोकित किया था।३८। उनसे सभी वृद्ध-स्त्री-और बालक बहुत से थे और मरने से बचे-बचाये नृप वंशज थे। ऐसी दुरवस्था में स्थित उन सबको देखा था तो वसिष्ठजी का हृदय करुणाद्र हो गया था क्योंकि यह तो सभी प्राणिमात्र पर अनुकम्पा करने वाले महा पुरुष थे।३९। बहुत काल पर्यन्त उनका निरूपण

सगर प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६६

किया था और मन में बड़ा आदर करके उनका विलोकन किया था । फिर उन महती मति वाले वसिष्ठजी ने उनको उज्जीवित करते हुए धीरे से कहा था—आप लोग डरो मत ।४०। इसके पश्चात् उन महाभाग ने अत्यधिक कृपा से समन्वित होकर कहा था तथा जीवन के चाहने वाले उन समस्त नृपों को समय में (सन्धि करने में) स्थापित कर दिया था ।४१। वसिष्ठजी ने राजा सगर की प्रतिज्ञा की निवृत्ति के लिए ऐसा समय किया था कि वह राजा सगर की क्रोधाग्नि से दग्ध नृप समुदाय नृपों के कुल में किए हुए सम्पूर्ण धर्म से अपेत हो गया था। फिर वे स्वयं ही धीरे से उस नृप श्रेष्ठ सगर के समीप में प्राप्त हुए थे और उनको यथा-रीति सान्त्वना दी थी तथा जीवित शत्रुओं के अपगमन के विधान में उनकी आज्ञा की याचना की थी। अर्थात् वे सभी जीवित ही चले जायें—ऐसी याचना की थी ।४२।

सक्रोधोऽपि महीपतिर्गुरुवचः संभावयस्तानरीन् धर्मस्य स्वकुलोचितस्य च तथा वेषस्य सत्यागतः । श्रौतस्मार्त्तविभिन्नकर्मनिरतान्विप्रैश्च दूरोज्झतान् सासूनकेवलमत्यजन्मृतसमानेकैकशः पार्थिवान् ॥४३

अर्द्धमुण्डाञ्छकांश्चक्रे पल्हवान् श्मश्रुधारिणः । यवनान्विगतश्मश्रूंन्कांबोजांश्चिबुकान्वितान् ॥४४

एवं विरूपानन्यांश्च स चकार नृपान्वयान् । वेदोक्तकर्मनिर्मुक्तान्विप्रैश्च परिवर्जितान् ॥४५

कृत्वा संस्थाप्य समये जीवतस्तान्व्यसर्जयत् । ततस्ते रिपवस्तस्य त्यक्तस्वाचारलक्षणाः ॥४६

व्रात्यतां समनुप्राप्ताः सर्ववर्णविनिंदिताः । धिक्कृताः सततं सर्वे नृशंसा निरपत्रपाः ॥४७

क्रूराश्च संघशो लोके बभूवुर्म्लेच्छजातयः ॥४८

मुक्तास्तेनाथ राज्ञा शकयवनकिरातादयः सद्य एव त्यक्तस्वाचारवेषा गिरिगहनगुहाद्याश्रयाः संवभूवुः । एता अद्यापि सद्भिः सततमवमता जातयोऽसत्प्रवृत्त्या वर्त्तन्ते दुष्टचेष्टा जगति नरपतेः पालयंतः प्रतिज्ञाम् ॥४९

४०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यद्यपि राजा सगर को बहुत अधिक क्रोध हो रहा था तो भी उस नृप ने अपने गुरुदेव की आज्ञा का समादर करते हुए ऐसा स्वीकार कर लिया था वे सब शत्रु तभी जीवित एक-एक छोड़े जा सकते हैं जब कि वे अपने कुल के उचित धर्म और वेष का त्याग कर देवें और श्रोत तथा स्मार्त्त कर्मों से भिन्न कर्मों में निरत रहें और विप्रों के द्वारा दूर ही से त्यागे हुए रहें मृत के ही समान रहे तो रह सकते हैं ॥४३॥ उसमें जो शक जाति वाले थे उनके शिर तो आधे मुण्डित कर दिये गये थे और जो पह्लव थे उनको श्मश्रुधारी करा दिया था। जो यवन थे उनकी श्मश्रुओं को मुँडा दिया गया था और काम्बोज को मुकान्वित करा दिया था ॥४४॥ इस तरह से उस सगर ने अन्यों को विरूप विप्रों के द्वारा परिवर्तित बना दिये गये थे ॥४५॥ ऐसा ही सबको बनाकर समय में (सन्धि में) अर्थात् इस प्रकार की शर्त में बाँधकर संस्थापित करते हुए जीवित ही छोड़ दिया था अर्थात् ऐसे ढंग से ही उनके रहने पर उनका हनन नहीं किया था। इसके अनन्तर उसके वे समस्त शत्रुगण आचार के लक्षणों के परित्याग कर देने वाले हो गए थे ॥४६॥ इस तरह से रहने पर वे सभी व्रात्य हो गये थे और सभी वर्णों के द्वारा विनिन्दित बन गये थे अर्थात् किसी भी वर्ण वाले नहीं रहे थे। सर्वदा उनको धिक्कार दिया जा जाता था—वे बहुत क्रूर हो गये थे तथा एकदम निर्लज्ज भी बन गये थे ॥४७॥ वे सभी अत्यन्त क्रूरों के समुदायों वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हुए थे ॥४८॥ उस समय में जो भी राजा सगर के द्वारा जीवित ही छोड़ दिये गये थे। वे शकयवन और किरात आदि थे वे तुरन्त ही आचार और वेष के त्याग देने वाले हो गये और फिर वे पर्वतों की गुफाओं में आश्रय लेने वाले हो गये थे। ये जातियाँ अब भी सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही नीच मानी जाती हैं क्योंकि बहुत ही बुरी प्रवृत्ति होती है और उनकी चेष्टाएँ भी दुष्ट हैं। ये जगत् में राजा सगर की प्रतिज्ञा का पालन किया करते हैं ॥४६॥

—x—

सगर की दिग्विजय

जैमिनिरुवाच— अथानुज्ञाय सगरो वसिष्ठमृषिसत्तमम् । बलेन महता युक्तो विदर्भानभ्यवर्त्तत ॥१॥

सगर की दिग्विजय ] [ ४०१

ततो विदर्भराट् तस्मै स्वसुतां प्रीतिपूर्वकम् । केशिन्याख्यामनुपमामनुरूपां न्यवेदयत् ॥२॥ स तस्या राजशार्दूलो विधिवद्वहिनसाक्षिकम् । शुभे मुहूर्ते केशिन्याः पाणिं जग्राह भूमिपः ॥३॥ स्थित्वा दिनानि कतिचिद्गृहे तस्यातिसत्कृतः । विदर्भराज्ञा संमंत्र्य ततो गंतुं प्रचक्रमे ॥४॥ अनुज्ञातस्ततस्तेन पारिबर्हैश्च सत्कृतः । निष्क्रम्य तत्पुराद्राजा शूरसेनानुपेयिवान् ॥५॥ संभावितस्ततश्चैव यादवैर्मातृसोदरैः । धनौघैस्तर्पितस्तैश्च मधुराया विनिर्ययौ ॥६॥ एवं स सगरो राजा विजित्य वसुधामिमाम् । करैश्च स नृपान्सर्वाश्चक्रे संकेतगानपि ॥७॥

जैमिनी मुनि ने कहा-इसके अनन्तर नृप सगर ने परम श्रेष्ठ ऋषि वसिष्ठजी की अनुज्ञा प्राप्त करके महान सेना से समन्वित होकर विदर्भ देश पर आक्रमण किया था ।१। फिर विदर्भ के नृप ने अपनी केशिनी नाम वाली पुत्री को बहुत ही प्रीति के साथ उनकी सेवा में समर्पित कर दी थी । यह कन्या रूप लावण्यादि सब गुणों में अनुपम थी और उस नृप के सर्वथा अनुरूप थी ।२। उस राजशार्दूल नृप सगर ने अग्नि को साक्षी करके परम शुभ मुहूर्त में उस का पाणिग्रहण किया था ।३। वहाँ पर ससुराल ही में कुछ दिन तक स्थित रहकर उस विदर्भेश्वर के द्वारा बड़ा सत्कार प्राप्त किया था फिर विदर्भाधि अनुमति पाकर वहाँ से गमन करने का उपक्रम किया था ।४। उस राजा ने भी आज्ञा देदी थी तथा पारिबर्हों के अर्थात् दायों के द्वारा उसका अच्छा सत्कार किया था। फिर वहाँ पुर से राजा ने निकल कर शूरसेन देशों में पहुँचा था ।५। वहाँ पर भी माता के सादरों के द्वारा यादवों से उसका सम्मान किया गया था और बहुत-सा धन देकर उन्होंने भी उसको पूर्ण सन्तुष्ट किया था । इसके पश्चात् वहाँ से निकल कर चल दिया था ।६। मधुरा से चलकर इस रीति से उस राजा सगर ने इस सम्पूर्ण वसुधा पर विजय प्राप्त की थी और समस्त नृपों पर कर लगाकर उनको अपने ही संकेतों पर चलने वाले अनुगामी बना दिया था ।७।

४०२ ] [ कालिका पुराण

ततोऽनुमान्य नृपतीन्निजराज्याय सानुगान् । अनुजज्ञे नरपतिः समस्ताननुयायिनः ॥८ ततो बलेन महता स्कंधावारसमन्वितः । शनैरपीडयन्देशान्स्वराज्यमुपजग्मिवान् ॥६ संभाव्यमानश्च मुहुरुपदाभिरनेकशः । नानाजनपदैस्तूर्णमयोध्यां समुपागमत् ॥१० तदागमनमाज्ञाय नागरः सकलो जनः । नगरीं तामलंचक्रे महोत्सवसमुत्सुकः ॥११ ततः स नगरी सर्वा कृतकौतुकमंगला । सिक्तसंमृष्टभूभागा पूर्णकुम्भशतावृता ॥१२ समुच्छ्रितध्वजशता पताकाभिरलंकृता । सर्वत्रागरुधूपाढ्या विचित्रकुसुमोज्ज्वला ॥१३ सद्रत्नतोरणोत्तुंगगोपुराट्टालभूषिता । प्रसूनलाजवर्षैश्च स्वलंकृतमहापथा ॥१४

इसके उपरान्त उन नृपों को अपने राज्य पर स्थित बने रहने का आदेश देकर तथा सम्मान प्रदान करके कि वे अपने अनुगों के साथ अनुयायी रहें राजा ने प्रस्थान किया था इसके पश्चात् स्कन्धावार से संयुत उसने महान सैन्य के साथ सब देशों को पीड़ित करते हुए अन्त में अपनी ही राजधानी में आकर प्राप्त हो गया था ।८-६। उस राजा का अनेक प्रकार की भेटों से बड़ा सत्कार अनेक जनपदों के द्वारा किया गया था और फिर वह शीघ्र ही अयोध्या में आ गया था ।१०। वहाँ पर समस्त नागरिक जनों को जब ज्ञात हुआ कि राजा अयोध्या में आ गये हैं तो सबने बड़ा महान् उत्सव किया था और बड़ी उत्सुकता के साथ उस अयोध्यापुरी को सजाया था ।११। फिर वह समग्र नगरी माङ्गलिक कौतुकों से समलंकृत हुई थी। उसकी समस्त भूमि पर स्वच्छता हुई थी और छिड़काव किया गया था तथा जहाँ-तहाँ सैकड़ों ही पूर्ण कुम्भ स्थापित किये गये थे ।१२। उसमें सैकड़ों ध्वजाएं फहराई गयी थीं तथा अनेक पताकाओं से वह विभूषित बनायी गयी थी । वहाँ पर सभी अगरु की धूपों की महक हो रही थी एवं

सगर की दिग्विजय ] [ ४०३

नाना भाँति के सुन्दर सुमनों की मालाओं से वह समुज्ज्वल बनायी गयी थीं ।१३। अच्छे-अच्छे रत्नों के द्वारा निर्मित तोरण वन्दनवारें लगायी गयी थी तथा ऊँचे-ऊँचे गोपुर और अट्टालिकाओं से वह परम भूषित थी जो महापथ थे उनमें पुष्पों और लाजाओं की वर्षा की थी जिससे वे बहुत ही सुन्दर एवं सुशोभित हो रहे थे ।१४।

महोत्सवसमायुक्ता प्रतिगेहमभूत्पुरी ।
संपूजिताशेषवास्तुदेवतागृहमालिनी ॥१५
दिक्‌चक्रजयिनो राज्ञः संदर्शनमुदान्वितैः ।
पौरजानपदैर्हृष्टैः सर्वतः समलंकृता ॥१६
ततः प्रकृतयः सर्वे तर्थातः पुरवासिनः ।
वारकांताकदंबैश्च नगरीभिश्च संवृताः ॥१७
अभ्याययुस्ततः सर्वे समेत्य पुरवासिनः ।
स तैः समेत्य नृपतिर्लब्धाशीर्वादसत्क्रियः ॥१८
बधिरीकृतदिक्‌चक्रो जयशब्देन भूरिणा ।
नानावादित्रसंघोषमिश्रेण मधुरेण च ॥१९
सत्कृत्य तान्यथायोगं सहितस्तैर्मुदान्वितैः ।
आनंदयन्प्रजाः सर्वाः प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥२०
वेदघोषैः सुमधुरैर्ब्राह्मणैरभिनन्दितः ।
संस्तूयमानः सुभृशं सूतमागधवंदिभिः ॥२१

उस समय से अयोध्या पुरी में महान् उल्लास छाया हुआ था तथा प्रत्येक घर में महोत्सव मनाया जा रहा था । वहाँ पर सभी गृहों की पंक्तियों में भलीभाँति समस्त वास्तु देवताओं का पूजन किया गया था ।१५। दिग्विजय करने वाले चक्रवर्ती राजा सगर के दर्शन करने के आनन्द से युक्त नागरिक और देशवासी बहुत ही प्रसन्न थे और इनसे सभी ओर वह पुरी समलंकृत थी ।१६। फिर वहाँ पर सभी प्रकृतियाँ तथा अन्तःपुर के निवासी परम प्रसन्न थे और वार कान्ताओं के समुदायों से और नगरियों से संवृत थी । अर्थात् बहुत सी नर्तिका वेश्या से भी एकत्रित थीं ।१७। इसके पश्चात् सभी पुरवासी इकट्ठे होकर वहाँ पर आ गये थे और सबने एकत्रित होकर उस राजा को सत्कृत किया था तथा आशीर्वादों से मुदित किया था ।१८।

४०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उस समय में जयजयकार की समुच्च ध्वनि से सभी दिशाएं बधिर हो गयी थीं अर्थात् जयघोष में कहीं पर भी कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था। वहाँ पर बहुत से प्रकार के वाद्य बज रहे थे उनकी भी ध्वनि बहुत मधुर उसी जयघोष में मिल रही थी ।१९। राजा ने भी उन समस्त स्वागत करने वालों का योग्यता के अनुसार सत्कार किया था जिससे उनको भी परमाधिक हर्ष हो रहा था। इन प्रसन्न पुर वासियों के ही साथ में समस्त प्रजाजनों को आनन्दित करते हुए राजा ने पुर में प्रवेश किया था ।२०। उस समय में ब्राह्मणों ने भी परम मधुर वेद के मन्त्रों की ध्वनि से राजा का अभिनन्दन किया था। तथा सूत-मागध और वन्दियों के द्वारा उस शुभ समागमन के समय में राजा का संस्तवन किया जा रहा था ।२१।

जयशब्दैश्च परितो नानाजनपदेरितैः ।
करतालरचोन्मिश्रवीणावेणुतलस्वनैः ॥२२
गायद्भिर्गायकजनैर्नृत्यद्भिर्गणिकाजनैः ।
अन्वीयमानो विलसच्छ्वेतच्छत्रविराजितः ॥२३
विकीर्यमाणः परितः सहलाजकुसुमोत्करैः ।
पुरीमयोध्यामविशत्स्वपुरोमिव वासवः ॥२४
दृष्टिपूतेन गन्धेन ब्राह्मणानां च वर्त्मना ।
जगाम मध्येनगरं गृहं श्रीमदलंकृतम् ॥२५
अवरुह्य ततो यानाद्भार्याभ्यां सहितो मुदा ।
प्रविवेश गृहं मातुर्हृष्टपुष्टजनायुतम् ॥२६
पर्यंकस्थामुपामग्य मातरं विनयान्वितः ।
तत्पादौ संस्पृशन्मूर्ध्ना प्रणाममकरोत्तदा ॥२७
साभिनन्द्य तमाशीर्भिर्हर्षगद्गदया गिरा ।
ससंभ्रमं समुत्थाय पर्यष्वजत चात्मजम् ॥२८

उस नृपति के दोनों ओर अनेक जनपदों के द्वारा कहे गये जयजयकार का घोष हो रहा था और करताल—की ध्वनि से मिले हुए वीणा और वेणु के मधुर स्वर निकल रहे थे ।२२। राजा के पीछे-पीछे गान करने वाले गान कर रहे थे और गणिकाएं नृत्य करती हुई चली जा रही थीं। राजा के

सगर की दिग्विजय ] [ ४०५

ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था ॥२३॥ राजा के ऊपर लाजा और पुष्पों की वर्षा की जा रही थी । इस रीति से राजा ने अपनी पुरी अयोध्या में महेन्द्र-देव जिस तरह से इन्द्रपुरी में गमन कर रहे हों उसी भांति प्रवेश किया था ॥२४॥ दृष्टिपूत गन्ध से युक्त ब्राह्मणों के मार्ग से नगर के मध्य में जो भी सम्पन्न एवं अलंकृत गृह था उसमें राजा ने गमन किया था ॥२५॥ फिर अपनी दोनों भार्याओं के साथ प्रसन्नता से यान से नीचे उतर कर अपनी माताश्री के घर में राजा ने प्रवेश किया था जहाँ पर सहस्रों परम हृष्ट-पुष्ट जन विद्यमान थे ॥२६॥ उनकी माताजी एक पर्यङ्क पर विराजमान थीं उनके समीप में परम विनय से युक्त होकर उस समय में उनके चरणों का स्पर्श करके माथा टेककर प्रणाम किया था ॥२७॥ माताजी ने भी शुभाशीर्वाद देकर उसका अभिनन्दन किया था और फिर अत्यधिक हर्ष से गद्गद वाणी के द्वारा बड़े ही सम्भ्रम के साथ उठकर अपने परम प्रिय पुत्र को छाती से लगाकर परिष्वन किया था ॥२८॥

सहर्षं बहुधाशीर्भिरभ्यनंदद्शुभे स्नुषे । स तां संभाव्य कथया तत्र स्थित्वा चिरादिव ॥२९॥ अनुज्ञातस्तया राजा निश्चक्राम तदालयात् । ततः सानुचरो राजा श्वेतव्यजनवीजितः ॥३०॥ सुरराज इव श्रीमान्सभां समगमच्छनैः । संप्रविश्य सभां दिव्यामनेकनृपसेविताम् ॥३१॥ नत्वा गुरुजनं सर्वमाशीर्भिश्चाभिनंदितः । सिंहासने शुभे दिव्ये निषसाद नरेश्वरः ॥३२॥ संसेव्यमानश्च नृपैर्नानाजनपदेश्वरैः । नानाविधाः कथाः कुर्वंस्तत्र नृपसत्तमः ॥३३॥ संप्रीयमाणं सुतरामुवास सह बंधुभिः । प्रतिज्ञां पालयित्वैवं जितदिङ्मण्डलो नृपः ॥३४॥ अन्वतिष्ठद्यथान्यायमर्थत्रयमुदारधीः । स्वप्रभावजिताशेषवैरिदिङ्मण्डलाधिपः ॥३५॥

इसके अनन्तर जो परम सुन्दर दो पुत्र वधुएं साथ में ही समुपस्थित हुई थीं उनको भी बहुत आशीर्वादों से माताजी ने अभिनन्दित किया था।

४०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

फिर राजा ने अपनी सब सुन कर कुछ काल पर्यन्त वहाँ पर स्थिति की थी ।२६। फिर माताजी से अनुज्ञा प्राप्त करके राजा उनके घर से बाहिर निकल आये थे और इसके अनन्तर अनुचरों के सहित वहाँ से गमन कर रहे थे और श्वेत व्यजनों के द्वारा सेवकगण उनकी हवा करते जा रहे थे ।३०। देवराज इन्द्र के ही समान श्री सम्पन्न राजा धीरे-धीरे अपनी सभा के मण्डप में समागत हो गये थे । राजा ने अनेक अधीन नृपों से संसेवित परम दिव्य सभा में प्रवेश किया था ।३१। सर्व प्रथम वहाँ पर जो गुरुजन विराजमान थे उनको प्रणाम किया था और उनके द्वारा दिये हुए आशीर्वाद प्राप्त कर अभिनन्दित हुए थे । फिर नरेश्वर ने परम शुभ एवं अतीव दिव्य सिंहासन पर अपनी संस्थिति की थी ।३२। वहाँ पर अनेक जनपदों के स्वामी नृपों के द्वारा वह भली-भाँति सेव्यमान हुए थे और अनेक प्रकार की उस श्रेष्ठ नृप ने वहाँ पर कथालाप किया था ।३३। इस तरह से बन्धुओं के साथ सुतरां परम प्रसन्नता प्राप्त करते हुए वहाँ पर निवास किया था । इस रीति से नृप ने समस्त दिशाओं को जीतकर अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन किया था ।३४। न्याय के अनुसार उस उदार बुद्धि वाले नृप ने तीनों धर्म-अर्थ और काम को प्राप्त किया था । उस राजा का प्रभाव ही ऐसा था कि जिसके द्वारा विविध एवं समस्त दिशाओं के मण्डल के स्वामियों को पराजित कर दिया था ।३५।

एकातपत्रां पृथिवीमन्वशासद्वृषो यथा । स्वर्यातस्य पितुः पूर्वं परिभावममर्षितः ।।३६ स यां प्रतिज्ञामारूढस्तां सम्यक्परिपूर्य च । सप्तद्वीपाब्धिनगरग्रामायतनमालिनीम् ।।३७ जित्वा शत्रूनशेषेण पालयामास मेदिनीम् । एवं गच्छति काले च वसिष्ठो भगवानृषिः ।।३८ अभ्याजगाम तं भूयो द्रष्टुकामो जनेश्वरम् । तमायांतमति क्ष्य मुनिवर्यं ससंभ्रमः ।।३६ प्रत्युज्जगामार्घ्यहस्तः सहितस्तंनृपैनृपः । अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महामतिः ।।४० प्रणाममकरोत्तस्मै गुरुभक्तिसमन्वितमः ।

सगर की दिग्विजय ] [ ४०७

आशीभिर्वर्द्धयित्वा तं वसिष्ठः सगरं तदा ॥४१॥ आस्यतामिति होवाच सह सर्वैर्नरेश्वरैः । उपाविशत्ततो राजा कांचने परमासने ॥४२॥

स्वर्ग में गये हुए पिताजी के पूर्व में परिभव से यह सगर अत्यन्त क्रुद्ध हुए थे और फिर दिग्विजय करके एक छत्र समग्र वसुधा पर इसने अनुशासन किया था। ३६। उसने जिस प्रतिज्ञा को किया था उसको अच्छी तरह परिपूर्ण करके ही छोड़ा था। समस्त शत्रुओं को जीतकर सातों द्वीप और सागर से युक्त नगर-ग्राम और आयतनों की माला मेदिनी का पालन किया था। इस रीति से जब कुछ काल व्यतीत हो गया था तब भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने वहाँ पर पदार्पण किया था। ३७-३८। उस राजा को पुनः देखने की कामना वाले ऋषि वहाँ पर समागत हुए थे। जैसे ही वहाँ पर पदार्पण करते हुए ऋषि का अवलोकन राजा ने किया था वैसे ही सम्भ्रम के साथ राजा ने अपने हाथों में अर्घ-सामग्री ग्रहण कर तुरन्त ही उनका शुभागमन किया था उस समय में उसके साथ अन्य सभी नृप विद्यमान थे। महामति नृप ने अर्घा-पाद्य आदि समग्र उपचारों से भली भाँति उन ऋषि-वर का अर्चन किया था। ३६-४०। गुरुदेव की भक्ति से युक्त होकर उनको प्रणाम किया था। उस समय में वसिष्ठ जी ने भी आशीर्वचनों से सगर का वर्धन किया था। ४१। मुनि ने राजा को आज्ञा दी थी कि आठ बैठ जाइए तब फिर सब नृपों के सहित राजा सुवर्ण निर्मित आसन पर उपविष्ट हो गये थे। ४२।

मुनिना समनुज्ञातः सभार्य सह राजभिः । आगतस्तु नृपश्रेष्ठमुपासीनमुपह्वरे ॥४३॥ उवाच शृण्वतां राज्ञां शनैमृद्वक्षरं वचः । वसिष्ठ उवाच- कुशलं ननु ते राजन्बाह्येष्वाभ्यंतरेषु च ॥४४॥ मंत्रिष्वमात्यवर्गेषु राज्ये वा सकलेऽधुना । दिष्ट्या च विजिताः सर्वे समग्रबलवाहनाः ॥४५॥ अयत्नेनैव युद्धेषु भवता रिपवो हि यत् । दिष्ट्यारूढप्रतिज्ञेन मम मानयता वचः ॥४६॥ अरयस्त्यक्तधर्म्माणस्त्वया जीवविसर्जिताः ।

४०८ ] [ ब्रह्माण्डपुराण

तान्विजित्येतराञ्जेतुं पुनर्दग्विजयच्छयो ॥ ४७ ॥
गतस्सवाहनबलस्त्वेवमित्यश‍ृणवं वचः।
जितदिङ्मण्डलं भूयः श्रुत्वा त्वां नगरस्थितम् ॥ ४८ ॥
प्रीत्याहमागतो द्रष्टुमिदानीं राजसत्तम।
जैमिनिरुवाच—
वसिष्ठनैवमुक्तस्तु सगरस्तालजंघजित् ॥ ४९ ॥

जब मुनिवर ने अपनी आज्ञा प्रदान की थी तो नृप भार्याओं तथा अधीन नृपों के सहित मुनि के ही समीप में नीचे की ओर उपासीन हो गये थे। वहाँ पर समस्त नृपों का समुदाय श्रवण कर रहा था तभी मुनिवर ने धीरे से कोमल कान्त वचन राजा से कहे थे। वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन्! बाहिर-भीतर सर्वत्र कुशल-क्षेम तो है न ? ॥४४॥ समस्त मन्त्रियों में, अमात्यवर्गों में अथवा समग्र राज्य में इस समय कुशल तो है न? यह तो परम हर्ष की बात है कि आपने युद्धों में सेना और वाहनों के सहित सब अपने शत्रुओं को बिना ही किसी प्रयत्न के बहुत ही साधारण कर्मों द्वारा पराजित कर दिया है। मुझे बड़ी प्रसन्नता इसकी है कि अपनी प्रतिज्ञा पर समारूढ़ होते हुए भी आपने मेरे कथित वचनों को मान लिया है ॥४५-४६॥ आपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके उनको समस्त धर्मों का त्याग कर देने वाले बना कर जीवित ही रहने वाले छोड़ दिये हैं। इस रीति से उन सबको जीत कर आप अन्यों को पराजित करने के वास्ते आप दिग्विजय करने की इच्छा से सेना और वाहनों से संयुत होकर गये हैं—यह भी वचन मैंने सुन लिया है। फिर मैंने यह श्रवण किया है कि आप दिग्विजय करके वापिस लौट आये हैं और अपने ही नगर में इस समय समवस्थित हैं ॥४७-४८। हे परम श्रेष्ठ राजन् ! इस वर्तमान काल में प्रीति से ही आपसे मिलने के ही लिये यहाँ पर समागत हुआ हूँ। जैमिनि मुनि ने कहा—महामुनीन्द्र वसिष्ठ जी ने जब इस रीति से कहा था तो तालजङ्घ पर विजय पाने वाले राजा सगर ने उनसे निवेदन किया था ॥४९॥

कृतांजलिपुटो भूत्वा प्रत्युवाच महामुनिम् ।
सगर उवाच—
कुशलं ननु सर्वत्र महर्षे नात्र संशयः ॥ ५० ॥
कल्याणाभिमुखाः सर्वे देवताश्च मुनेऽनिशम् ।
भवान्ध्यायति कल्याणं मनसा यस्य संततम् ॥ ५१ ॥

सगर की दिग्विजय ] [ ४०६

तस्य मे चोपसर्गश्च संभवंतिकथं मुने।
भवताऽनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थश्चाधुना कृतः ॥५२
यन्मां द्रष्टुमिहायातः स्वयमेव भवान्गुरो।
यन्मह्यमाह भगवान्विपक्षविजयादिकम् ॥५३
तत्तथाऽनुष्ठितं किन्तु सर्वं भवदनुग्रहात् ।
भवत्प्रसादतः सर्वं मन्ये प्राप्तं महीक्षिताम् ॥५४
अन्यथा मम का शक्तिः शत्रून्हंतुं तथाविधान् ।
अनल्पी कुरुते फल्यं यन्मे व्यवसितं भवान् ॥५५
फलमल्पमपि प्रीतये स्यादगस्याधिरोपितुः।
जैमिनिरुवाच—
एवं संभावितः सम्यक्सगरेण महामुनिः ॥५६

दोनों हाथों को जोड़कर महामुनि को सगर ने उत्तर दिया था। सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरा सर्वत्र कुशल है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥५०॥ जिस मुझ सेवक का निरन्तर ही आप जैसे महापुरुष कल्याण की कामना का ध्यान रखा करते हैं उस सेवक मेरे प्रति सभी देवगण कल्याणाभिमुख अर्थात् श्रेय करने वाले सदा ही रहा करते हैं ॥५१॥ हे मुने ! ऐसे मुझको उपद्रव कैसे हो सकते हैं। मैं तो आपके परमाधिक अनुग्रह का भाजन हो गया हूँ और अब अपने समस्त कार्यों में सफल भी बना दिया गया हूँ ॥५२॥ हे गुरुदेव ! आप जो स्वयं ही मुझको अपना दर्शन देने के लिए यहाँ पर पधारे हैं और जो आपने विपक्षियों पर विजय आदि प्राप्त करने की बातें मुझसे कही हैं ॥५३॥ यह सभी कुछ वैसा ही किया गया है किन्तु यह सब आपकी ही अनुकम्पा से हुआ है। मैं स्वयं ही इस बात को मानता हूँ कि शत्रु तथा अन्य नृपों पर जो भी मैंने विजय प्राप्त की है—यह सब आपके ही प्रसाद से ही हुआ है ॥५४॥ नहीं तो ऐसे-ऐसे प्रबल शत्रुओं का हनन कर पराजित करने की मेरे जैसे की क्या शक्ति है। जो भी मेरा व्यवसित है उसको सफल आप जैसे महान् पुरुष ही किया करते हैं ॥५५॥ अग अधिरोपिता का अनल्प भी फल प्रीति के लिए ही होता है। जैमिनी मुनि ने कहा—इस रीति से राजा सगर के द्वारा उन महामुनि का समादर किया गया था।

४१० ] | ब्रह्माण्ड पुराण

अभ्यनुज्ञाय तं भूपः प्रजगाम निजाश्रमम् । वसिष्ठे तु गते राजा सगरः प्रीतमानसः ॥५७ अयोध्यायामभवत्सन्प्रशशासाखिलां भुवम् । भार्याभ्यां समुपेताभ्यां रूपशीलगुणादिभिः ॥५८ बुभुजे विषयान्ग्राम्यान्यथाकामं यथासुखम् । सुमतिकेशिनी चोभे विकसद्वदनांबुजे ॥५९ रूपौदार्यगुणोपेते पीनवृत्तपयोधरे । नील कुंचितकेशाढ्ये सर्वाभरणभूषिते ॥६० सर्वलक्षणसंपन्ने नवयौवनगोचरे । प्रिये सन्निहिते तस्य नित्यं प्रियहिते रते ॥६१ स्वाचारभावचेष्टाभिर्जह्रतुस्तुस्तन्मनोऽनिशम् । स चापि भरणोत्कर्ष प्रतीतात्मा महीपतिः ॥६२

फिर वह मुनि नृप सगर से आज्ञा ग्रहण करके अपने आश्रम को चले गये थे। वसिष्ठ मुनि के गमन कर जाने पर राजा के मन में परम हर्ष हुआ था ।५७। वह राजा फिर अयोध्या पुरी अपनी राजधानी में निवास करता था और उसने समस्त भूमण्डल पर प्रशासन किया था। दोनों भार्याओं को भी अपने पास में रखता था जो रूप लावण्य, शील स्वभाव और गुण गण आदि से सुसम्पन्न थीं ।५८। उस राजा सगर ने ग्राम्य विषयों के सुख का पूर्ण अपनी इच्छा के अनुरूप ही उपभोग किया था। सुमति और केशिनी ये दोनों ही विकसित कमल के समान परम सुन्दर मुखों वाली थीं ।५९। सुन्दर स्वरूप के साथ-साथ इन दोनों पत्नियों में विशाल उदारता भी थी। इनके उरोज युग्म परिपुष्ट वृत्ताकार एवं समुन्नत थे। इनके केशपाश नील वर्ण के कुञ्चित अर्थात् छल्लेदार परम सुहावने थे। ये सभी आभरणों से विभूषित रहा करती थीं ।६०। नूतन यौवन के उद्गम में दिखलाई देने वाली नारियों में जो गुण गण हुआ करते हैं। उन सभी से ये दोनों रानियां सुसम्पन्न थीं। ये दोनों बहुत ही प्रिय थीं और सदा राजा के समीप में रहा करती थीं तथा नित्य ही अपने परम प्रिय स्वामी के हित कार्य में रति रखने वाली थीं ।६१। इन दोनों के अपने आचरण राजा के प्रति इतने सुन्दर थे वे अपने हाव-भाव और चेष्टाओं के द्वारा निरन्तर ही राजा के मन को अपनी ओर आकर्षित रखा करती थीं। वह राजा भी उन दोनों के भरण के उत्कर्ष से प्रसन्न मन वाला था ।६२।