संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विजिगीषुर्दिशो राजा राज्ञो यस्याभियास्यति ॥१० विषयं स नृपस्तस्य सद्यः प्रणतिमेष्यति । विजित्य नृपतीन्सर्वान्कृत्वा च स्वपदानुगान् ॥११ संकेतगामिनः कांश्चित्कृत्वा राज्ये न्यवर्त्तत । एवं स विसरन्दिक्षु दक्षिणाभिमुखो नृपः ॥१२ स्मरन्पूर्वकृतं वैरं हैहयानभ्यवर्त्तत । ततस्तस्य नृपैः सार्द्धं समग्ररथकुंजरैः ॥१३ बभूव हैहयैर्वीरैः संग्रामो रोमहर्षणः । राज्ञां यत्र सहस्राणि स बलानि महाहवे ॥१४
जिस समय में वह राजा सम्प्रयाण कर रहा था उस समय में उसकी जो सबसे आगे चलने वाली सेना के समुदायों के चरणों से शैलों के उच्च-भाग क्षुण्ण हुए थे उनके क्षोदों से निम्न भाग जो भूमि में थे वे भर गये थे और चतुरङ्गिणी सेना के हाथी-अश्व-रथ और पैदल सैनिकों के हर एक के एक के चरणों से जो भूमि खुदकर प्रक्षोद रेणु उठी थी उससे ऊँचे स्थल ढक गये थे । इस तरह से वह भूमि निरन्तर ऐसी ही होगयी थी ।८। अनेक दृप्त अर्थात् दर्प से परिपूर्ण हाथी-घोड़े और रथों के व्यूह से संभिन्न वीरों को निहनन करने वाले उसकी शोभा तुरन्त ही असुरों के समूहों की सेनाओं का हनन करने वाले भगवान् शिव की शोभा को धारण वह नृप कर रहा था । उनके कर्मों के अभिषङ्ग होने पर दूर से ही शत्रुओं के नगर के विरोधों में ऐसा अभिशंसन करते हुए कि यहाँ से शीघ्र ही कहीं से भाग जाने के क्षणों का निर्देश करता है और प्राणियों के धैर्य का किया करता है ।६। वह राजा जिसको सब दिशाओं में विजय प्राप्त करने की इच्छा है जिस राजा के ऊपर अभिमान करेगा ।१०। वह राजा उसके देश की प्रणति को प्राप्त करा देगा । उस नृप ने सभी नृपतियों को जीतकर उनको अपने चरणों का अनुचर बना लिया था ।११। उसे महान् वीर राजा ने कुछ नृपों की सङ्केत पर गमन करने वाले बनाकर उनको अपने ही राज्य पर भेज दिया था अर्थात् अपनी आज्ञा के इशारे वाले होना उन्होंने स्वीकार कर लिया था तो उनको राज्य पर बिठा दिया था । इस रीति से विसरण सब दिशाओं में करके फिर राजा दक्षिण की ओर अभिमुख हुआ था ।१२। उस राजा ने अपने साथ पूर्व में की हुई शत्रुता स्मरण करके हैहय राजाओं के ऊपर