संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७३
सहस्रों क्षत्रिय नृपों का भूमि पर हनन कर दिया था ।३१। फिर भी दो वर्षों में इस भूमि को क्षत्रियों का वध करके क्षत्रियों से रहित बना दिया था और फिर दश वर्षों के लम्बे समय तक तपस्या का तपन किया था ।३२। हे राजन् ! जब फिर भी उनको यह ज्ञान हुआ था कि ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को अपने तपोबल से समुत्पन्न कर दिया है तो फिर भी उन्होंने साक्षात् विनाश करने वाले काल के ही समान इस भूमण्डल में क्षत्रियों को मार-काटकर समाप्त कर दिया था ।३३। उतने में समय में फिर क्षत्रिय लोग समुत्पन्न हो गये थे तब दो वर्ष पर्यन्त निरन्तर पृथ्वी पर उन सबका हनन करते भार्गवेन्द्र ने किया था ।३४। हे राजेन्द्र ! अपने पिताश्री के क्षत्रियों के द्वारा निधन का स्मरण करते हुए पूर्ण रूप से उन्होंने इक्कीस बार इस भूमि को इसी रीति से क्षत्रियों से रहित कर दिया था । उनकी माता रेणुका ने अपने पति के वियोग के शोक में रुदन करते हुए इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को करों से प्रताड़ित किया था उतनी ही बार परशुरामजी ने इस भूमण्डल क्षत्रियों से रहित कर दिया था ।३५।
॥ वसिष्ठ गमन वर्णन ॥
वसिष्ठ उवाच-
ततो मूर्द्धाभिषिक्तानां राज्ञाममिततेजसाम् ।
षट्सहस्रद्वयं रामो जीवग्राहं गृहीतवान् ॥१
ततो राजसहस्राणि गृहीत्वा मुनिभिः सह ।
स जगाम महातेजाः कुरुक्षेत्रं तपोमयम् ॥२
सरसां पंचकं तत्र खानयित्वा भृगूद्वहः ।
सुखावगाहतीर्थानि तानि चक्रे समंततः ॥३
जघान तत्र वै राज्ञः शरीरप्रभवासृजा ।
सरांसि तानि वै पंच पूरयामास भार्गवः ॥४
स्नात्वा तेषु यथान्यायं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
पितॄन्संतर्पयामास यथाशास्त्रमतंद्रितः ॥५