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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७३

सहस्रों क्षत्रिय नृपों का भूमि पर हनन कर दिया था ।३१। फिर भी दो वर्षों में इस भूमि को क्षत्रियों का वध करके क्षत्रियों से रहित बना दिया था और फिर दश वर्षों के लम्बे समय तक तपस्या का तपन किया था ।३२। हे राजन् ! जब फिर भी उनको यह ज्ञान हुआ था कि ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को अपने तपोबल से समुत्पन्न कर दिया है तो फिर भी उन्होंने साक्षात् विनाश करने वाले काल के ही समान इस भूमण्डल में क्षत्रियों को मार-काटकर समाप्त कर दिया था ।३३। उतने में समय में फिर क्षत्रिय लोग समुत्पन्न हो गये थे तब दो वर्ष पर्यन्त निरन्तर पृथ्वी पर उन सबका हनन करते भार्गवेन्द्र ने किया था ।३४। हे राजेन्द्र ! अपने पिताश्री के क्षत्रियों के द्वारा निधन का स्मरण करते हुए पूर्ण रूप से उन्होंने इक्कीस बार इस भूमि को इसी रीति से क्षत्रियों से रहित कर दिया था । उनकी माता रेणुका ने अपने पति के वियोग के शोक में रुदन करते हुए इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को करों से प्रताड़ित किया था उतनी ही बार परशुरामजी ने इस भूमण्डल क्षत्रियों से रहित कर दिया था ।३५।


॥ वसिष्ठ गमन वर्णन ॥

वसिष्ठ उवाच-

ततो मूर्द्धाभिषिक्तानां राज्ञाममिततेजसाम् ।
षट्सहस्रद्वयं रामो जीवग्राहं गृहीतवान् ॥१

ततो राजसहस्राणि गृहीत्वा मुनिभिः सह ।
स जगाम महातेजाः कुरुक्षेत्रं तपोमयम् ॥२

सरसां पंचकं तत्र खानयित्वा भृगूद्वहः ।
सुखावगाहतीर्थानि तानि चक्रे समंततः ॥३

जघान तत्र वै राज्ञः शरीरप्रभवासृजा ।
सरांसि तानि वै पंच पूरयामास भार्गवः ॥४

स्नात्वा तेषु यथान्यायं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
पितॄन्संतर्पयामास यथाशास्त्रमतंद्रितः ॥५

३७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पितुः प्रेतस्य राजेंद्र श्राद्धादिकमशेषतः ।
ब्राह्मणैः सह मातुश्च तत्र चक्रे यथोदितम् ॥६
एवं तीर्णप्रतीकः स कुरुक्षेत्रे तपोमये ।
उवासातंद्रितः सम्यक् पितृपूजापरायणः ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इसके अनन्तर अपरिमित तेज वाले मूर्द्धाभिषिक्त अर्थात् सर्वं शिरोमणि बारह सहस्र राजाओं का परशुरामजी ने जीवनों का ग्रहण किया था अर्थात् मार गिराया था ।१। इसके अनन्तर एक सहस्र राजाओं को पकड़ कर मुनिगणों के साथ महान् तेजस्वी वे परशुराम जी तपोमय कुरुक्षेत्र में गमन कर गये थे ।२। भृगूद्वह ने वहाँ पर पाँच सरोवर खुदवा कर उनको सब ओर परम सुख का आवाहन करने वाले तीर्थ कर दिया था ।३। वहीं पर उन सहस्र नृपों का हनन किया था और उनके शरीरों से निकले हुए रुधिर से भार्गव ने उन पाँचों सरोवरों को भर दिया था ।४। परमाधिक प्रतापी जमदग्नि के पुत्र ने न्यायानुसार उन सरोवरों में स्नान किया था और तन्द्रा से रहित होकर शास्त्रोक्त विधान से अपने पितरों को तृप्त किया था अर्थात् पितृगणों के लिए तर्पण किया था ।५। हे राजेन्द्र ! वहीं पर परशुरामजी ने जैसा भी शास्त्र में कहा गया है वही ब्राह्मणों के साथ रहकर अपने मृत पिता का और माता का श्राद्ध आदि पूर्ण रूप से सुसम्पन्न किया था ।६। इस रीति से पितृऋण से उत्तीर्ण होने वाले उन्होंने उस तप से परिपूर्ण कुरुक्षेत्र में पितृगणों की अर्चना में तत्पर होते हुए अतन्द्रित रहकर भली भाँति निवास किया था ।७।

ततः प्रभृत्यभूद्राजंस्तीर्थानामुत्तमोत्तमम् ।
विहितं जामदग्न्येन कुरुक्षेत्रे तपोवने ॥८
स्यमंतपंचकमिति स्थानं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
यत्र चक्रे भृगुश्रेष्ठः पितॄणां तृप्तिमक्षयाम् ॥९
स्नानदानतपोहोमद्विजभोजनतर्पणैः ।
भृशमाप्यायितास्तेन यत्र ते पितरोऽखिलाः ॥१०
अवापुरक्षयां तृप्तिं पितृलोकं च शाश्वतम् ।
समंतपंचकं नाम तीर्थं लोके परिश्रुतम् ॥११

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७५

सर्वपापक्षयकरं महापुण्योपबृंहितम् । मर्त्यानां यत्र यातानामेनांसि निखिलानि तु ॥१२ दूरादेवापयास्यंति प्रवाते शुष्कपर्णवत् । तत्क्षेत्रचर्यागमनं मर्त्यानामसतामिह ॥१३ न लभ्यते महाराज जातु जन्मशतैरपि । समंतपंचकं तीर्थं कुरुक्षेत्रेऽतिपावनम् ॥१४

इसके पश्चात् हे राजन् ! तपश्चर्या करने के उस वन कुरुक्षेत्र में जमदग्नि के पुत्र के द्वारा किया हुआ वह कुरु क्षेत्रधाम तभी से आरम्भ करके तीर्थों से सबसे परम श्रेष्ठ तीर्थ बन गया था ।८। वह स्थान सस्मय-मन्तक--इस नाम से तीनों लोकों में प्रख्यात हो गया था । क्योंकि वहाँ पर परशुरामजी ने अपने पितृगणों की अक्षय तृप्ति की थी ।६। वहाँ पर उन्होंने पितरों को बहुत ही अच्छी तरह से स्नान-दान-तप-होम-विप्रों के लिए भोजन और तर्पण आदि के द्वारा सन्तृप्त कर दिया था ।१०। और पितृगणों के लोक ने निरन्तर अक्षय तृप्ति प्राप्त की थी । स्यमन्तक नाम वाला तीर्थ लोक से परिश्रुत है ।११। यह तीर्थ समस्त पापों के क्षय का करने वाला है और महान पुण्य से उपबृहन्ति है । जहाँ पर समागत हुए मनुष्यों के सम्पूर्ण से उपबृहन्ति है । जहाँ पर समागत हुए मनुष्यों के सम्पूर्ण पाप दूर से ही वायु में शुष्क पत्रों की ही भाँति उपगत हो जाता करते हैं । मनुष्यों का जो असत् है उनकी चर्या तथा गमन बड़ी ही कठिनाई से प्राप्त हुआ करता है । यह हे महाराज ! कभी भी सौ में जन्मों भी प्राप्त नहीं करता है । स्यमन्तक पंचक तीर्थ कुरुक्षेत्र में बहुत ही अधिक पावन है ।१२-१४।

यत्र स्नातः सर्वतीर्थैः स्नातो भवति मानवः । कृतकृत्यस्ततो रामः सम्यक् पूर्णमनोरथः ॥१५ उवास तत्र नियतः कंचित्कालं महामतिः । ततः संवत्सरस्यांते ब्राह्मणैः सहितो वशी ॥१६ पितृपिंडप्रदानाय जामदग्न्योऽगमद्गयाम् । ततो गत्वा ततः श्राद्धं यथाशास्त्रमरिंदमः ॥१७

३७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ब्राह्मणांस्तर्पयामास पितॄनुद्दिश्य सत्कृतान् । शैवं तत्र परं स्थानं चन्द्रपादमिति स्मृतम् ॥१८ पितृतृप्तिकरं क्षेत्रं तादृग्लोके न विद्यते । यत्रार्चिताः स्वकुलजैैर्यथाशक्ति मनागपि ॥१९ पितरः पिंडदानाद्यैः प्राप्स्यंति गतिमक्षयाम् । पितॄनुद्दिश्य तत्रासौ तर्पितेषु द्विजातेषु ॥२० ददौ च विधिवत्पिडं पितृभक्तिसमन्वितः । ततस्तत्पितरः सर्वे पितृलोकादुपागताः ॥२१

वह तीर्थ ऐसा महिमामय है कि जहाँ पर स्नान कर लेने वाला मनुष्य संसार के समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य फल प्राप्त कर लेने वाला हो जाता है । इसके अनन्तर राम अपने सब कृत्यों को पूर्ण कर लेने वाले सफल तथा भली भाँति पूर्ण मनोरथों वाले हो गये थे ।१५। फिर वे महती मति वाले नियत होकर कुछ काल तक निवासी हो गये थे । फिर सम्वत्सर के अन्त में वशी ब्राह्मणों के सहित पितृगणों के लिए पिण्ड समर्पित करने के लिये जमदग्नि के पुत्र गया गये थे । वहाँ पर जाकर शत्रुओं के दमन करने वाले ने शास्त्र की पद्धति के ही अनुसार श्राद्ध किया था ।१६-१७। उन्होंने श्राद्ध से अपने पितृगणों का उद्देश्य ग्रहण करके ब्राह्मणों का सत्कार किया था और उनको संतृप्त किया था । उसके आगे शैव स्थान है जो चन्द्रपाद नाम से कहा गया है ।१८। पितृगणों की तृप्ति करने वाला उसके समान लोक में अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है । यह ऐसा स्थान है जहाँ पर अपने कुल में समुत्पन्न मानवों के द्वारा शक्ति के अनुसार अत्यल्प रूप से भी अर्चित हुए पितृगण पिण्ड दानादिक के द्वारा अक्षय गति को प्राप्त कर लेंगे । वहाँ पर पितृगणों का उद्देश्य लेकर द्विजातियों को तृप्त किया था । जब वे पूर्णतया तृप्त हो गये थे तो पितृगण के प्रति भक्तिभाव से समन्वित होकर विधि पूर्वक पिण्डदान दिया था । इसके अनन्तर सभी पितृलोक से वहीं पर उपागत हो गये थे ।१९-२१।

जुगृहुस्तत्कृतां पूजां जमदग्निपुरोगमाः । अथ संप्रीतमनसः समेत्य भृगुनंदनम् ॥२२ ऊचुस्तत्पितरः सर्वेऽदृश्या भूत्वांतरिक्षगाः ।

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७७

पितर ऊचु :- महत्कर्म कृतं वीर भवतान्यैः सुदुष्करम् ॥२३ अस्मानपि यथान्यायं सम्यक् तर्पितवानसि । अस्माकमक्षयां प्रीतिं तथापि त्वं न यच्छसि ॥२४ क्षत्रहत्यां हि कृत्वा तु कृतकर्माभवद्यतः । क्षेत्रस्यास्य प्रभावेण भक्त्या च तव दर्शनम् ॥२५ प्राप्ताः स्म पूजिताः किं तु नाक्षय्यफलभागिनः । तस्मात्त्वं वीरहत्यादिपापप्रशमनाय हि ॥२६ प्रायश्चित्तं यथान्यायं कुरु धर्मं च शाश्वतम् । वधाच्च विनिवर्तस्व क्षत्रियाणामतः परम् ॥२७ पितुर्न तेऽपराध्यंते न स्वतंत्रं यतो जगत् । तन्निमित्तं तु मरणं पितुस्ते विहितं पुरा ॥२८

जमदग्नि जिनमें आग्रगामी थे ऐसे उन सब पितृगणों ने वहाँ पर आकर उसके द्वारा की गयी पूजा का ग्रहण किया था और वे सब भृगुनन्दन पर बहुत अधिक प्रसन्न मन वाले हो गये थे ।२२। उन समस्त पितृगणों ने आकाश में स्थित होते हुए अदृश्य होकर ही उससे कहा था। पितृगण ने कहा—हे वीर ! तुमने बहुत ही बड़ा कार्य किया है जो कि अन्य जनों के द्वारा कभी भी नहीं हो सकता है अर्थात् महान् कठिन है ।२३। आपने न्याय पूर्वक बहुत ही अच्छी तरह से सन्तृप्त किया है तो भी हमारी कभी क्षीण न होने वाली प्रीति तुमने हमको नहीं दी है ।२४। कारण यह है कि आपने समस्त क्षत्रियों की हत्या करके ही आप कर्म करने वाले हुए हैं। यह तो इस क्षेत्र का ही प्रभाव है कि हमने आपको दर्शन दिया है तथा भक्ति भी इसका एक कारण है ।२५। हम लोग यहाँ पर पूजित तो अवश्य हुए हैं किन्तु फिर भी अक्षय फल के भागी नहीं हुए हैं। इस कारण से आपको उस महान् पाप के निवारण करने के लिये कुछ अवश्य ही कुछ करना ही होगा जो कि बड़े-बड़े वीरों की हत्या के प्रशमन के लिये होना चाहिए ।२६। अब आपका कर्त्तव्य है कि न्याय के अनुरूप इसका प्रायश्चित्त करो और निरन्तर रहने वाला धर्म का कर्म करो। तथा इससे आगे भविष्य में क्षत्रियों के वध करने के कार्य से दूर हो जाओ। अर्थात् क्षत्रियों की हत्या

३७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करना बन्द कर दो।२७। इन विचारों के द्वारा तुम्हारे पिता का कोई भी अपराध नहीं किया गया है क्योंकि यह जगत् स्वतन्त्र नहीं हैं अर्थात् जगत् के प्राणी स्वेच्छा से ही कर्मों के करने में कभी भी स्वतन्त्र नहीं हुआ करते हैं। पहिले आपके पिता का जो मरण हुआ है उसके यह कोई भी निमित्त नहीं है क्योंकि स्वाधीनता किसी में भी कर्मों के करने की हुआ ही नहीं करती है ।२८।

हंतुं कं कः समर्थः स्याल्लोके रक्षितुमेव वा ।
निमित्तमात्रमेवेह सर्वः सर्वस्य चैतयोः ॥२९॥
ध्रुवं कर्मानुरूपं ते चेष्टंते सर्व एव हि ।
कालानुवृत्तं बलवान्नृ लोको नात्र संशयः ॥३०॥
बाधितुं भुवि भूतानि भूतानां न विधिं विना ।
शक्यते वत्स सर्वोऽपि यतः शक्त्या स्वकर्मकृत् ॥३१॥
क्षत्रं प्रति ततो रोषं विमुच्यास्मत्प्रियेप्सया ।
शममाप्नुहि भद्रं ते स ह्यस्माकं परं बलम् ॥३२॥

वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्त्वांतर्दधुः सर्वे पितरो भृगुनन्दनम् ।
स चापि तद्वचः सर्वं प्रतिजग्राह सादरम् ॥३३॥
अकृतव्रणसंयुक्तो मुदा परमया युतः ।
प्रययौ च तदा रामस्तस्मात्सिद्धवनाश्रमम् ॥३४॥
तस्मिन्स्थित्वा भृगुश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सहितो नृप ।
तपसे धृतसंकल्पो बभूव स महामनाः ॥३५॥

इस लोक में कौन है जो किसी का हनन या रक्षण करने की सामर्थ्य रखता हो। तात्पर्य यही है कि किसी में भी किसी के मारने या रक्षा करने की शक्ति नहीं है। मरण और संरक्षण इन दोनों के विषय में सभी केवल इस लोक में एक निमित्त ही हुआ करते हैं और वस्तुतः स्वयं कोई भी कुछ करने वाला नहीं होता है ।२६। जो भी कोई यहाँ पर किया करते हैं वे सभी यह निश्चय है कि अपने पूर्व कृत कर्मों के ही अनुसार चेष्टा किया करते हैं। तात्पर्य यही हैं कि जैसा भी जिसका कर्म पूर्व में किया हुआ होता

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७६

है वही करने के लिए सबको यहां पर विवश होना ही पड़ता है। यहाँ पर मानवगण काल के ही अनुसार चला करते हैं। यह निस्सन्देह सत्य है कि नृलोक बलवान् है ।३०। इस भूमण्डल में कोई भी हे वत्स ! विधि के बिना प्राणियों को कोई बाधा पहुँचा कर शक्ति के द्वारा सामर्थ्य नहीं रखा करता है कारण यही है कि यहाँ पर सभी अपने कृत कर्मों के अनुसार ही सब किया करते हैं। तात्पर्य यही है कि कर्म ही बड़ा बलवान् है जिसके वशीभूत होकर प्राणी कार्य करने को प्रेरित होता है ।३१। आपने जो क्षत्रियों के वध करने का क्रोध किया है उसको अब त्याग दो यदि आपके मन में हमारे प्रिय करने की अभिलाषा है। अब आप शम को ग्रहण करो। इस भूमण्डल में इसी शम से आपका श्रेय होगा। यह शम तो हमारा बड़ा भारी बल हैं ।३२। वसिष्ठजी ने कहा—उन भृगुनन्दन जी से इतना ही कहकर सब पितृ-गण अन्तर्हित हो गये थे। फिर उन परशुरामजी ने भी बहुत ही आदर के साथ उनके उस वचन का ग्रहण किया था ।३३। अकृतव्रण को अपने साथ में लेकर परमाधिक प्रसन्नता से संयुत होकर उसी समय में परशुराम वहाँ से सिद्धों के वन में स्थित आश्रम को चले गये थे ।३४। महान् विशाल मन वाले राम उस आश्रम में समवस्थित होकर जहाँ कि बहुत से ब्राह्मण भी उनके साथ में थे हे नृप ! फिर वे तप करने के लिए मन में सङ्कल्प धारण करने वाले हो गये थे ।३५।

सरथं सहसाहं च धनुः संहननानि च । पुनरागमसंकेतं कृत्वा प्रास्थापयत्तदा ॥३६॥ ततः स सर्वतीर्थेषु चक्रे स्नानमतंद्रितः । परीत्य पृथिवीं सर्वां पितृदेवादिपूजकः ॥३७॥ एवं क्रमेण पृथिवीं त्रिवारं भृगुनन्दनः । परिचक्राम राजेंद्र लोकवृत्तमनुव्रतः ॥३८॥ ततः स पर्वतश्रेष्ठं महेंद्रं पुनरप्यथ । जगाम तपसे राजन्ब्राह्मणैरभिसंवृतः ॥३९॥ स तस्मिंश्चिररात्राय मुनिसिद्धनिषेविते । निवासमात्मनो राजन्कल्पयामास धर्मवित् ॥४०॥ मुनयस्तं तपस्यंतं सर्वक्षेत्रनिवासिनः ।

३८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्रष्टुकामाः समाजग्मुर्नियता ब्रह्मवादिनः॥ ४१
ददृशुस्ते मुनिगणास्तपस्यासक्तमानसम् ।
क्षात्रं कक्षमशेषेण दग्ध्वा शांतमिवानलम् ॥४२

उस समय में परशुरामजी ने रथ के सहित सहसाह को और धनुष तथा समस्त आयुधों को पुनः आवश्यकता पड़ने पर आगमन का संकेत करके वहाँ से प्रस्थापित कर दिया था। ३६। इसके पश्चात् उन्होंने सभी तीर्थों में अतन्द्रित होकर स्नान किया था और पितृगण तथा देवों का पूजन रीति से हे राजेन्द्र ! भृगुनन्दन ने लोक व्रत का अनुवर्त्तन करते हुए तीन बार सम्पूर्ण पृथ्वी का परिक्रमण किया था ।३८। हे राजन् ! इसके अनन्तर उन्होंने ब्राह्मणों से अभिसंवृत होकर फिर तपस्या करने के लिए महेन्द्र पर्वत पर जो कि पर्वतोंमें परमश्रेष्ठ था आगमन किया था ।३९। हे राजन् ! धर्म के ज्ञाता उन्होंने मुनिगण और सिद्ध-समुदायों के द्वारा सेवित उस पर्वत पर अधिक समय तक अपने निवास करने का विचार कर लिया था ।४०। फिर वहाँ पर समस्त क्षेत्रों के निवासी नियत और ब्रह्मवादी मुनियों ने तपश्चर्या करने वाले उन भार्गवेन्द्र के दर्शन करने की कामना रखकर वहाँ पर समागमन किया था ।४१। उन मुनिगणों ने तपश्चर्या में समासक्त उनका पूर्ण रूप से क्षत्रियों के कक्ष को दग्ध करके परम शान्त अग्नि की भाँति दर्शन किया था ।४२।

अथ तानागतान्दृष्ट्वा मुनीन्दिव्यांस्तपोमयान् ।
अर्घ्यादिसमुदाचारैः पूजयामास भार्गवः ॥४३
कृतकौशलसंप्रश्नपूर्वकाः सुमहोदयाः ।
तेषां तस्य च संवृत्ताः कथाः पुण्या मनोहराः ॥४४
ततस्तेषामनुमते मुनीनां भावितात्मनाम् ।
हयमेधं महायज्ञमाहर्तुमुपचक्रमे ॥४५
संभृत्य सर्वसंभारानौर्वाद्यैः सहितो नृप ।
विश्वामित्रभरद्वाजमार्कण्डेयादिभिस्तथा ॥४६
तेषामनुमते कृत्वा काश्यपं गुरुमात्मनः ।
वाजिमेधं ततो राजन्नाजहार महाक्रतुम् ॥४७

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८१

तस्याभूत्काश्यपोऽध्वर्यु रुद्गाता गौतमो मुनिः । विश्वामित्रोऽभवद्धोता रामस्य विदितात्मनः ॥४८ ब्रह्मत्वमकरोत्त्तस्य मार्कण्डेयो महामुनिः । भरद्वाजाग्निवेश्याद्या वेदवेदांगपारगाः ॥४६

भार्गवेन्द्र मुनि ने जिस समय में उन समस्त परम दिव्य तप से परि- पूर्ण मुनियों को वहां पर समागत हुए देखा था तो उन्होंने अर्घ्य आदि सब उपचारों के द्वारा सहर्ष उनका अर्चन किया था ॥४३॥ उन समस्त महोदयों ने सर्व प्रथम तो क्षेम-कुशल का प्रश्नोत्तर किया था फिर उन सबकी और भार्गवेन्द्र की परस्पर में परम पुण्यमय मनोहर कथाएं हुई थीं ॥४४॥ इसको उपरान्त भावित आत्मा वाले उन्हें मुनियों की अनुमति से भृगुनन्दन ने महायज्ञ के आहरण करने का उपक्रम दिया था ॥४५॥ इसके अनन्तर हे नृप ! और्वादि तथा विश्वामित्र—भरद्वाज और मार्कण्डेय आदि के सहित यज्ञ के उपयुक्त समस्त संभारों का संग्रह किया गया था ॥४६॥ फिर उन्हीं सबकी अनुमति हो जाने पर भृगुनन्दन ने काश्यप को अपना गुरु बनाकर हे राजन् ! फिर वाजिमेध महान ऋतु का समाहरण किया था ॥४७॥ विदित आत्मा वाले भृगुनन्दन के गुरु तो काश्यप हुए थे और उद्गाता गौतम मुनि हुए थे और उस यज्ञ में विश्वामित्र ऋषि होता हुए थे ॥४८॥ महामुनि मार्कण्डेय ने वहां पर ब्रह्मा के पद को ग्रहण किया था । भरद्वाज-अग्निवेश्य आदि जो भी वेदों तथा वेदों के अङ्ग शास्त्रों के पारगामी प्रकाण्ड पण्डित थे ॥४६॥

मुनयश्चक्रुरन्यानि कर्माण्यन्ये यथाक्रमम् । पुत्रैः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च सहितो भगवान्भृगुः ॥५० सादस्यमकरोद्राजन्नन्यैश्च मुनिभिः सह । स तैः सहाखिलं कर्म समाप्य भृगुपुंगवः ॥५१ ब्रह्माणं पूजयामास यथावद्गुरुणा सह । अलंकृत्य यथान्यायं कन्यां रूपवतीं महीम् ॥५२ पुरनामशतोपेतां समुद्रांबरमालिनीम् । आहूय भृगुशार्दूलः सशैलवनकाननाम् ॥५३

३८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

काश्यपाय ददौ सर्वामृते तं शैलमुत्तमम् । आत्मनः सन्निवासाथं तं रामः पर्यकल्पयत् ॥५४॥ ततः प्रभृति राजेंद्र पूजयामास शास्त्रतः । हिरण्यरत्नवस्त्राश्वगोगजान्नादिभिस्तथा ॥५५॥ पुरा समाप्य यज्ञांते तथा चावभृथाप्लुतः । चक्रे द्रव्यपरित्यागं तेषामनुमते तदा ॥५६॥

इन समस्त मुनियों ने तथा अन्यों ने क्रम के अनुसार अन्यान्य जो भी कर्म उस यज्ञशाला में थे उनको किया था । उस यज्ञ में भगवान् भृगु भी अपने पुत्रों-शिष्यों और प्रशिष्यों के सहित पधारे थे । उन्होंने अन्यान्य मुनियों के साथ हे राजन् ! यज्ञ की सदस्यता की थी अर्थात् सब सदस्य बन गये थे और उन सबके साथ मिलकर भृगुपुङ्गव परशुरामजी ने उस सम्पूर्ण कर्म को सुसम्पन्न किया था ।५०-५१। जब सम्पूर्ण कर्म समाप्त हो गया था यथा रीति अपने गुरुदेव के ही साथ ब्रह्माजी का पूजन किया था । फिर रूप लावण्य वाली मही कन्या को महामूल्यवान् आभूषणों से समलंकृत किया था ।५२। फिर उस मही कन्या को जो सहस्रों पुरों और ग्रामों से समन्वित एवं सागरों और अम्बर की माला वाली थी तथा उसमें अनेकों शैल-वन और कानन भी थे । उन मुनि शार्दूल ने उसको अपने समीप में बुला लिया था ।५३। फिर सम्पूर्ण उसको काश्यप मुनि को दे दिया था केवल उस उत्तम महेन्द्र पर्वत को नहीं दिया था जिस पर वे स्वयं निवास किया करते थे क्यों कि परशुरामजी ने उस पर्वत को अपने ही निवास करने के लिए कल्पित कर लिया था ।५४। तभी से लेकर हे राजेन्द्र ! शास्त्रानुसार सुवर्ण-रत्न-वस्त्र-अश्व-गौ-गज आदि के द्वारा उसका पूजन किया था । पहिले इस सब कर्म को समाप्त करके फिर यज्ञ के अवसान समय में वे यज्ञान्त अवभृथ स्नान से आप्लुत हुए थे और उसी अवसर पर उन समस्त महा मुनियों के के अनुमति से फिर द्रव्य का परित्याग कर दिया था ।५५-५६।

दत्त्वा च सर्वभूतानामभयं भृगुनन्दनः । तत्रापि पर्वतवरे तपश्चतुं समारभत् ॥५७॥ ततस्तं समनुज्ञाय सदस्या ऋत्विजस्तथा । ययुर्यथागतं सर्वे मुनयः शंसितव्रताः ॥५८॥

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८३

गतेषु तेषु भगवानकृतव्रणसंयुतः।
तपो महत्तसमास्थाय तत्रैव न्यवसत्सुखी ॥५६॥
काश्यपी तु ततो भूमिर्जननाथा ह्यनेकंशः ।
सर्वदुःखप्रशांत्यर्थं मारीचानुमतेन तु ॥६०॥
तत्र दीपप्रतिष्ठाख्यव्रतं विष्णुमुखोदितम् ।
चचार धरणीं सम्यक् दुःखैःर्मुक्ताऽभवच्च सा ॥६१॥
इत्येष जामदग्न्यस्य प्रादुर्भाव उदाहृतः ।
यस्मिञ्श्रुते नरः सर्वपातकैर्विप्रमुच्यते ॥६२॥
प्रभावः कार्त्तवीर्यस्य लोके प्रथिततेजसः ।
प्रसंगात्कथितः सम्यङ्नातिसंक्षेपविस्तरः ॥६३॥

इसके पश्चात् भृगुनन्दन ने समस्त प्राणियों के लिए अभय का दान दे दिया था और वहाँ ही उस पर्वत पर तपस्या करने का आरम्भ कर दिया था ।५७। इसके अनन्तर जो भी यज्ञ में समागत सदस्य तथा ऋत्विज थे उन्होंने एवं शंसित व्रतों वाले मुनियों ने सभी ने जैसे-जैसे जहाँ से वहाँ आगमन किया वैसे ही विदा होकर चले गये थे ।५८। उन सबके चले जाने पर भगवान ने अकृतव्रण से संयुत होकर महान तप में समास्थित होकर सुख से सम्पन्न उसी स्थान पर निवास किया करते थे ।५६। इसके पश्चात् जानना था काश्यपी भूमि ने अनेक प्रकार के समस्त दुःखों की प्रशान्ति के लिए मारीच की अनुमति से एक व्रत किया था ।६०। वहाँ पर दीप प्रतिष्ठा नाम वाला व्रत जो कि भगवान विष्णु के मुख से कहा गया था उसको धरणी ने भली भाँति किया था और फिर समस्त दुःखों से मुक्त हो गयी थी ।६१। वह भगवान जामदग्न्य का प्रादुर्भाव सब बता दिया गया है जिसके श्रवण करने पर मनुष्य समस्त पातकों से मुक्त हो जाया करता है ।६२। अपरिमित तेज वाले कार्त्तवीर्य का लोक में जो प्रबल प्रभाव था वह भी प्रसङ्ग से दिया गया था जो न तो अति संक्षिप्त था और न विशेष विस्तृत ही था ।६३।

एवंप्रभावः स नृपः कार्त्तवीर्योऽभवद्भुवि ।
न तादृशः पुमान्कश्चिद्भावी भूतोऽथवा श्रुतः ॥६४॥

३८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दत्तात्रेयाद्वरं वव्रे मृतिमुत्तमपूरुषात् । यत्पुरा सोऽगमन्मुक्तिं रणे रामेण घातितः ॥६५॥ तस्यासीत्पंचमः पुत्रः प्रख्यातो यो जयध्वजः । पुत्रस्तस्य महाबाहुस्तालजंघोऽभवन्नृप ॥६६॥ अभूत्तस्यापि पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् । तालजंघाभिधा येषां वीतिहोत्रोऽग्रजोऽभवत् ॥६७॥ पुत्रैः सवीतिहोत्राद्यैर्हैहयाद्यैश्च राजभिः । कालं महांत्तमवसद्धिमाद्रिवनगह्वरे ॥६८॥ यः पूर्वं रामबाणेन द्रवन्पृष्ठेऽभिताडितः । तालजंघोऽपतद्भूमौ मूर्च्छितो गाढवेदनः ॥६९॥ ददर्श वीतिहोत्रस्तं द्रवन्दैववशादिव । रथमारोप्य वेगेन पलायनपरोऽभवत् ॥७०॥

वह नृप कार्त्तवीर्य इस भूमण्डल में इस प्रकार के प्रभाव वाला हुआ था कि उस प्रकार का कोई भी पुरुष न कभी हुआ और न भविष्य में भी होगा तथा न कभी सुना ही गया है ।६४। उसने दत्तात्रेय मुनीन्द्र से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु किसी महान उत्तम पुरुष से होवे । रण से वह परशुरामजी के द्वारा निहत होकर पहिले मुक्ति को प्राप्त हो गया था ।६५। उस राजा का पाँचवां पुत्र प्रख्यात था जिसका नाम जयध्वज था । हे नृप ! उसका पुत्र महाबाहु तालजङ्घ हुआ था ।६६। उसके भी उत्तम धनुर्धारी सौ पुत्र हुए थे । उन सबके नाम तालजङ्घ था उनमें वीतिहोत्र सबमें बड़ा भाई था ।६७। वह वीतिहोत्र प्रभृति पुत्रों के तथा हैहय वंशश नृपों के सहित उस हिमाद्रि पर्वत के वन गह्वर में बहुत लम्बे समय तक उसने निवास किया था ।६८। जो पहिले राम के बाण के द्वारा भागता हुआ भी पृष्ठ भाग में प्रताड़ित हो गया था । फिर वह तालजङ्घ गहरी वेदना से युक्त होकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गया था और भूमि पर गिर गया था ।६९। भाग्यवश उसको भागते हुए वीतिहोत्र ने देखा था । बड़े ही वेग से उसको रथ पर समारोपित करके वह भाग जाने में तत्पर हो गया था ।७०।

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८५

ते तत्र न्यवसन्सर्वे हिमाद्रौ भयपीडिताः । कृच्छ्रं महांतामासाद्य शाकमूलफलाशनः ॥७१ ततः शांतिं गते रामे तपस्यासक्तमानसे । तालजंघः स्वकं राज्यं सपुत्रः प्रत्यपद्यत ॥७२ सन्निवेश्य पुरीं भूयः पूर्ववन्नृपसत्तमः । वसंस्तदा निजं राज्यमपालयदरिंदमः ॥७३ सुपुत्रः सानुगबलः पूर्ववैरमनुस्मरन् । अभ्याययौ महाराज तालजंघः पुरं तव ॥७४ चतुरंगबलोपेतः कंपयन्निव मेदिनीम् । रुरोदाभ्येत्य नगरीमयोध्यां स महीपतिः ॥७५ ततो निष्क्रम्य नगरात्फल्गुतंत्रोऽपि ते पिता । युयुधे तैर्नृपैः सर्वैर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥७६ निहतानेकमातंगतुरंगरथसैनिकः । शत्रुभिर्निर्जितो वृद्धः पलायनपरोऽभवत् ॥७७

वे सभी भागते हुए आकर भय से बहुत पीड़ित हो गये थे और हिमाद्रि पर्वत में बस गये थे । उन सबको महान कष्ट प्राप्त हुआ था और वहाँ पर वे सब शाक-मूल और फलों का अशन करने वाले हुए थे ।७१। जब वहाँ पर परशुराम परत शान्ति को प्राप्त हो जाने पर केवल तपस्या में ही आसक्त मन वाले हो गये थे और फिर उनका कोई भी भय नहीं रहा था तो तालजङ्घ ने अपने पुत्रों के सहित अपना राज्य कर लिया था ।७२। उस श्रेष्ठ राजा ने फिर पूर्व की ही भाँति अपनी नगरी को सन्निवेशित करके उस समय में वहीं पर निवास करते हुए उस अरिन्दम ने अपने राज्य का परिपालन किया था ।७३। हे महाराज ! सुन्दर पुत्र वाले और अपने अनुचरों तथा सेना से युक्त होकर उस तालजङ्घ ने पूर्व वैर का अनुस्मर करके वह तालजङ्घ आपके पुर में अभ्यागत हो गया था ।७४। वह चतुरङ्गिणी सेना से संयुत होकर भूमि को कँपाता हुआ जैसे हो चला था। जब वह अयोध्या नगरी में पहुँचा तो वह राजा रोने लग गया था ।७५। इसके पश्चात् आपके पिता के पास बहुत कम साधन थे तो भी वह नगर से निकल

३८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आये थे और उन समस्त नृपों के साथ वृद्ध होते हुए भी तरुण पुरुष के ही समान उसने घोर युद्ध किया था ।७६। उसके बहुत से हाथी-अश्व-रथ और सैनिक जब निहत हो गये थे तो वह शत्रुओं के द्वारा निर्जित हो गया था और फिर वह वृद्ध वहां से भागने लग गया ।७७।

त्यक्त्वा स नगरं राज्यं सकोशबलवाहनम् । अन्तर्वत्न्या च ते मात्रा सहितो वनमाविशत् ।।७८ तत्र चौर्वाश्रमोपांते निवसन्त्तचिरादिव । शोकामर्षसमाविष्टो वृद्धभावेन च स्वयम् ।।७६ विलोक्यमानो मात्रा ते बाष्पगद्गदकंठया । अनाथ इव राजेन्द्र स्वर्गलोकमितो गतः ।।८० ततस्ते जननी राजन्दुःखशोकसमन्विता । चितामारोपयद्भर्तू रुदती सा कलेवरम् ।।८१ अनशनादिदुःखेन भर्तुर्व्यसनकर्शिता । चकाराग्निप्रवेशाय सुदृढां मतिमात्मनः ।।८२ और्वरुतदखिलं श्रुत्वा स्वयमेव महामुनि । निर्गत्य चाश्रमात्तां च वारयन्निदमब्रवीत् ।।८३ न मर्तव्यं त्वया राज्ञि सांप्रतं जठरे तव । पुत्रस्तिष्ठति सर्वेषां प्रवरश्चक्रवर्तिनाम् ।।८४

उस वृद्ध नृप ने अपना सम्पूर्ण राज्य-नगर-कोश-बल समस्त वाहनों को छोड़कर गर्भवती तुम्हारी माता को साथ में लेकर वन में प्रवेश कर कर लिया था ।७८। वहाँ वन में और्व मुनि के आश्रम के समीप में अल्प समय तक ही उसने निवास किया था और वह स्वयं वृद्धता के कारण से बहुत ही अधिक शोक तथा अमर्ष से समाविष्ट हो गया था। तुम्हारी माता उसको देख रही थी और उसके नेत्रों से अश्रुपात हो रहा था उसका कण्ठ गद्गद हो गया था । हे राजेन्द्र ! वह वृद्ध नृप एक अनाथ के ही समान यहाँ से स्वर्गलोक में चल बसा था ।७६-८०। इसके अनन्तर हे राजन् ! तुम्हारी माता विचारी पति वियोग के महा दुःख और शोक से समन्वित हो गयी थी । फिर करुण क्रन्दन करती हुई उसने स्वामी के मृत शरीर को चिता

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८७

पर समारोपित कर दिया था ॥८१॥ पति के मृत हो जाने पर उसने कुछ भी खाया नहीं था—शोक हृदय में बैठा ही था—ऐसे दुःखों से अपने स्वामी से वियोग के दुःख से वह बहुत कशित हो गयी थी। अतः उसने भी अपने आपको भी अग्नि में पति के ही शव के साथ प्रवेश कर सती हो जाने का सुदृढ़ निश्चय कर लिया था ॥८२॥ और्व महामुनि ने यह सम्पूर्ण समाचार सुना तो वे महामुनि स्वयं ही अपने आश्रम से बाहिर निकलकर आ गये थे और उससे यह वचन कहा था ॥८३॥ हे राज्ञि ! तुमको इस समय में पति के साथ प्राणत्याग नहीं करना चाहिए कारण यह है कि तुम्हारे उदर में पुत्र स्थित है जो कि समस्त चक्रवर्त्तियों में परम श्रेष्ठ होगा ॥८४॥

इति तद्वचनं श्रुत्वा माता तव मनस्विनी । विरराम मृतेस्तां तु मुनिः स्वाश्रममानयत् । ततः सा सर्वदुःखानि नियम्य त्वन्मुखांबुजम् ॥८५॥ दिदृक्षुराश्रमोपांते तस्यैव न्यवसत्सुखम् । सुषाव च ततः काले सा त्वामौर्वाश्रमे तदा ॥८६॥ जातकर्मादिकं सर्वं भवतः सोऽकरोन्मुनिः । और्वाश्रमे विवृद्धश्च भवांस्तेनानुकंपितः ॥८७॥ त्वयैव विदितं सर्वमतः परमरिंदम । एवं प्रभावो नृपतिः कार्त्तवीर्योऽभवद्भुवि ॥८८॥ व्रतस्यास्य प्रभावेण सर्वलोकेषु विश्रुतः । यद्धर्णौर्जितो युद्धे पिता ते वनमाविशत् ॥८९॥ तद्वृत्तांतमशेषेण मया ते समुदीरितम् । एतच्च सर्वमाख्यातं व्रतानामुत्तमं तव ॥६०॥ समन्त्रतन्त्रं लोकेषु सर्वलोकफलप्रदम् । न ह्यस्य कर्तुर्नृपतेः पुरुषार्थचतुष्टये ॥६१॥

तुम्हारी मनस्विनी माता ने इस उस मुनि के वचन का श्रवण किया था तो फिर वह सती होकर दग्ध होने से कार्य से विरत हो गयी थी और फिर उसको वह मुनि अपने आश्रम में ले आये थे। इसके पश्चात् उसने सब दुःखों की ओर से अपने मन को नियमित कर लिया था तथा उस गर्भस्थ

३८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अपने बालक के मुख कमल को देखने की इच्छा वाली होकर उसी आश्रम के समीप में सुख पूर्वक निवास कर रही थी ।८५। जब प्रसव काल उपस्थित हुआ तो उसने उसी और्व मुनि के आश्रम में प्रसव किया था ।८६। उसी मुनि ने आपका समस्त जातकर्म आदि संस्कार किया था और आप उसी मुनि की कृपा के भाजन होते हुए और्वाश्रय में ही पालित होकर बड़े हुए हैं ।८७। हे अरिन्दम ! इसके पश्चात् जो भी कुछ हुआ है वह आपको सब ज्ञात ही है । इस प्रकार के प्रभाव वाला राजा कार्त्तवीर्य इस भूमण्डल पर हुआ था ।८८। इसी व्रत के प्रभाव से वह लोकों में प्रख्यात हुआ है । जिसके वंश में समुत्पन्न होने वालों के द्वारा आपके पिता को युद्ध में जीत लिया गया है और वन में चले गये थे ।८९। उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने आपको कहकर सुना दिया है और यह सब व्रतों में उत्तम व्रत मैंने आपको बतला दिया है ।९०। यह ऐसा व्रत है कि लोकों में मन्त्रों और तन्त्रों के सहित सब ही लौकिक फल को प्रदान कर देने वाला है । जो इस व्रत को राजा किया करता है उसको चारों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) पुरुषार्थों की प्राप्ति हो जाया करती है ।९१।

भवत्यभीप्सितं किञ्चिद्दुर्लभं भुवनत्रये ।
संक्षेपेण मयाख्यातं व्रतं हैहयभूभुजः ।
जामदग्न्यस्य च मुने किमन्यत्कथयामि ते ॥६२॥

जैमिनिरुवाच-

ततः स सगरो राजा कृतांजलिपुटो मुनिम् ॥६३॥
उवाच भगवन्नेतत्कर्तुमिच्छाम्यहं व्रतम् ।
सम्यक्त्वमुपदेशेन तत्रानुज्ञां प्रयच्छ मे ॥६४॥
कर्मणानेन विप्रर्षे कृतार्थोऽस्मि न संशयः ।
इत्युक्तस्तेन राज्ञा तु तथेत्युक्त्वा महामुनिः ॥६५॥
दीक्षयामास राजानं शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
स दीक्षितो वसिष्ठेन सगरो राजसत्तमः ॥६६॥
द्रव्याण्यानीय विधिवत्प्रचचार शुभव्रतम् ।
पूजयित्वा जगन्नाथं विधिना तेन पार्थिवः ॥६७॥

सद्घ गमन वर्णन ] [ ३८६

समाप्य च यथायोग्यमनुज्ञाय गुरुं ततः । प्रतिज्ञामकरोद्राजा व्रतमेतदनुत्तमम् ॥६८॥ आजीवांतं धरिष्यामि यत्नेनेति महामतिः । अथानुज्ञाप्य राजानं वसिष्ठो भगवानृषिः ॥६६॥ सन्निवर्त्यानुगच्छंतं प्रजगाम निजाश्रमम् ॥१००॥

फिर इन तीनों भुवनों में कुछ भी ऐसी अभीप्सित वस्तु नहीं है जिसका प्राप्त करना दुर्लभ हो अर्थात् सभी कुछ प्राप्त हो जाया करता है । यह हैहय राजा का व्रत मैंने संक्षेप से कह दिया है और अब जमदग्नि के पुत्र परशुराम मुनि के विषय में मैं आपको क्या बतलाऊँ ? ।६२। जैमिनि ने कहा—इसके अनन्तर राजा सगर अपने हाथों की अञ्जलि को जोड़कर मुनिवर से कहने लगा था ।६३। उसने कहा—हे भगवन् ! मैं इस व्रत के करने की इच्छा करता हूँ सो आप भली भाँति उपदेश के द्वारा इसके करने में मुझे अपनी अनुज्ञा प्रदान कीजिए ।६४। हे विप्रर्षे ! इस कर्म से मैं कृतार्थ हो गया हूँ—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । जब राजा के द्वारा इस रीति से प्रार्थना की गयी तो उस मुनि ने भी ऐसा ही होगा—यह कह दिया था । फिर उस मुनि ने शास्त्रोक्त मार्ग के द्वारा उस राजा को दीक्षा दी थी और श्रेष्ठ राजा सगर वसिष्ठ मुनि के द्वारा दीक्षित होगया था ।६५-६६। फिर समस्त द्रव्यों को मंगा कर विधि-विधान के साथ उस शुभ व्रतका समाचरण किया था । राजा ने उसी विधि से भगवान् जगन्नाथ का पूजन किया ।६७। यथा योग्य उसको सङ्ग समाप्त करके फिर अपने गुरुदेव की आज्ञा प्राप्त की थी और उस राजा ने उस सर्वोत्तम व्रत के करने की दृढ़ प्रतिज्ञा की थी ।६८। महामति उस नृप ने यही प्रतिज्ञा की थी कि मैं इस व्रत को जब तक मेरा जीवन रहेगा तब तक धारण करूँगा और यत्न पूर्वक करता रहूँगा । फिर भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने उस राजा को अपनी आज्ञा प्रदान कर दी थी ।६६। फिर अपने पीछे अनुगमन करने वाले राजा को वापिस लौटाकर वसिष्ठ जी अपने आश्रम को चले गये थे ।१००।

३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सगर-प्रतिज्ञा पालन

जैमिनिरुवाच- गते तस्मिन्मुनिवरे सगरो राजसत्तमः । अयोध्यायामधिवसन्पालयामास मेदिनीम् ॥१ सर्वसंपद्गणोपेतः सर्वधर्मार्थतत्त्ववित् । वयसैव स बालोऽभूत्कर्मणा वृद्धसंमतः ॥२ तथापि न दिवा भुङ्क्ते शेते वा निशि संस्मरन् । सुदीर्घं निःश्वसित्युष्णमुद्विग्नहृदयोऽनिशम् ॥३ श्रुत्वा राजा स्वराज्यं निजगुरुमवजित्यारिभिः संगृहीतं मात्रा सार्द्धं प्रयांतं वनमतिगहनं स्वर्गंतं तं च तस्मिन् । शोकाविष्टः सरोषं सकलरिपुकुलोच्छित्तये सत्प्रतिज्ञश्चक्रे सद्यः प्रतिज्ञां परिभवमनलं सोढुमिक्ष्वाकुवंश्यः ॥४ स कदाचिन्महीपालः कृतकौतुकमंगलः । रिपुं जेतुं मनश्चक्रे दिशश्च सकलाः क्रमात् ॥५ अनेकरथसाहस्रैर्गजाश्वरथसैनिकैः । सर्वतः संवृतो राजा निश्चक्राम पुरोत्तमात् ॥६ शत्रून्हंतुं प्रतस्थे निजबलनिवहेनोत्पतद्भिस्तुरंगै- र्नासित्वोर्मिजालाकुलजलनिधिनिभेनाथ षाडंगिकेन । मत्तैर्मातंगयूथैः सकुलगिरिकुलेनैव भूमंडलेन । श्वेतच्छत्रध्वजौघैरपि शशिसुकराभातखेनैव सार्द्धम् ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—उस मुनिवर के चले जाने पर श्रेष्ठ नृप सगर ने अयोध्या पुरी में अधिवास करते हुए इस मेदिनी का परिपालन किया था ।१। वह सभी प्रकार की सम्पदाओं से संयुत था और सम्पूर्ण धर्म के तात्त्विक अर्थ का ज्ञाता था। वह अवस्था से ही बालक था किन्तु उसके

सगर-प्रतिज्ञा पालन ] [ ३६१

कर्म ऐसे थे कि वह वृद्धों के सम्मत थे ।२। वह दिन में भोजन नहीं करता है अथवा रात्रि में शयन भी नहीं किया करता है और स्मरण करता हुआ बहुत लम्बी श्वास लिया करता है जो कि बहुत गर्म होती हैं तथा उसका हृदय रात दिन अत्यन्त ही उद्विग्न रहता है ।३। जब राजा ने यह श्रवण किया था कि अपने गुरु को अवजित करके अपना सम्पूर्ण राज्य शत्रुओं ने ले लिया है । वह पिता पराजित होकर मेरी माता के सहित बहुत ही गहन वन में प्रयाण कर गये हैं और वहाँ पर ही स्वर्गलोक के प्रवासी हो गये हैं । उस पर इक्ष्वाकु के वंश में समुत्पन्न उसने महान् क्रोध से युक्त होकर तथा शोक से संविष्ट होते हुए सत्प्रतिज्ञा वाले ने समस्त शत्रुओं के कुल का उच्छेदन करने के लिये तुरन्त ही प्रतिज्ञा की थी और इस परिभव की थी और इस परिभव की अग्नि को कठिनाई से सहन किया था ।४। फिर किसी समय में उस महीपाल ने मङ्गल कौतुक करके सब दिशाओं में क्रम से जाकर शत्रु के जीतने का मन में विचार किया था ।५। वह राजा अनेकों सहस्र रथ-अश्व-गज और सैनिकों से सब ओर से संवृत होकर अपने उत्तम- पुर से निकल दिया था ।६। उस राजाने शत्रुओं को जीतने के लिए प्रस्थान कर दिया था । जिस समय में वहाँ से चला है उस समय में उसकी सेनाओं का ऐसा विशाल समुदाय उसके साथ में था कि उसमें जो अश्व थे वे ऊपर की ओर उछालें मार रहे थे कि ऐसा प्रतीत होता था मानों अत्युच्च तरङ्गों से समाकुल जलनिधि ही होवे । वह सेना छहों अङ्गों से युक्त थी । मत्त हाथियों के समूह ऐसे थे मानों भूमण्डल कुलगिरियों के समुदाय से संयुत है । उसकी सेनामें श्वेत ध्वजाओं के समूह आकाश में फहरा रहे थे जो ऐसा आभास हो रहा था कि पूर्ण अन्तरिक्ष चन्द्रमा की किरणों से श्वेत चमक रहा हो । ऐसी महान् विशाल सेना को साथ लेकर ही वह चला था ।७।

तस्याग्रेसरसैन्ययूथचरणप्रक्षुण्णशैलोच्चयः क्षोदापूरितनिम्नभागमवनीपालस्य संयास्यतः । प्रत्येकं चतुरङ्गसैन्यनिकरप्रक्षोदसंभूतरेणुप्रावृतिरुत्स्थली समभवद्भूमिस्तु तत्रानिशम् ॥८

निघ्नन्दृप्ताननेकान्द्विपतुरगरथव्यूहसंभिन्नवीरान्सद्यः शोभां दधानोऽसुरनिकरचमूनिघ्नतश्चन्द्रमौलिः । दूरादेवाभिशंसन्नरिनगरनिरोधेषु कर्माभिषंगे तेषां शीघ्रापयानक्षणमभिदिशति प्राणिधेयं विधत्ते ॥६

३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विजिगीषुर्दिशो राजा राज्ञो यस्याभियास्यति ॥१० विषयं स नृपस्तस्य सद्यः प्रणतिमेष्यति । विजित्य नृपतीन्सर्वान्कृत्वा च स्वपदानुगान् ॥११ संकेतगामिनः कांश्चित्कृत्वा राज्ये न्यवर्त्तत । एवं स विसरन्दिक्षु दक्षिणाभिमुखो नृपः ॥१२ स्मरन्पूर्वकृतं वैरं हैहयानभ्यवर्त्तत । ततस्तस्य नृपैः सार्द्धं समग्ररथकुंजरैः ॥१३ बभूव हैहयैर्वीरैः संग्रामो रोमहर्षणः । राज्ञां यत्र सहस्राणि स बलानि महाहवे ॥१४

जिस समय में वह राजा सम्प्रयाण कर रहा था उस समय में उसकी जो सबसे आगे चलने वाली सेना के समुदायों के चरणों से शैलों के उच्च-भाग क्षुण्ण हुए थे उनके क्षोदों से निम्न भाग जो भूमि में थे वे भर गये थे और चतुरङ्गिणी सेना के हाथी-अश्व-रथ और पैदल सैनिकों के हर एक के एक के चरणों से जो भूमि खुदकर प्रक्षोद रेणु उठी थी उससे ऊँचे स्थल ढक गये थे । इस तरह से वह भूमि निरन्तर ऐसी ही होगयी थी ।८। अनेक दृप्त अर्थात् दर्प से परिपूर्ण हाथी-घोड़े और रथों के व्यूह से संभिन्न वीरों को निहनन करने वाले उसकी शोभा तुरन्त ही असुरों के समूहों की सेनाओं का हनन करने वाले भगवान् शिव की शोभा को धारण वह नृप कर रहा था । उनके कर्मों के अभिषङ्ग होने पर दूर से ही शत्रुओं के नगर के विरोधों में ऐसा अभिशंसन करते हुए कि यहाँ से शीघ्र ही कहीं से भाग जाने के क्षणों का निर्देश करता है और प्राणियों के धैर्य का किया करता है ।६। वह राजा जिसको सब दिशाओं में विजय प्राप्त करने की इच्छा है जिस राजा के ऊपर अभिमान करेगा ।१०। वह राजा उसके देश की प्रणति को प्राप्त करा देगा । उस नृप ने सभी नृपतियों को जीतकर उनको अपने चरणों का अनुचर बना लिया था ।११। उसे महान् वीर राजा ने कुछ नृपों की सङ्केत पर गमन करने वाले बनाकर उनको अपने ही राज्य पर भेज दिया था अर्थात् अपनी आज्ञा के इशारे वाले होना उन्होंने स्वीकार कर लिया था तो उनको राज्य पर बिठा दिया था । इस रीति से विसरण सब दिशाओं में करके फिर राजा दक्षिण की ओर अभिमुख हुआ था ।१२। उस राजा ने अपने साथ पूर्व में की हुई शत्रुता स्मरण करके हैहय राजाओं के ऊपर