भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३५३

करें। परम पूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण मेरे ऊपर करुणा से पसीजे हुए हृदय वाले मेरे ऊपर होवें जिसमे मैं सुकृती हो जाऊँ और आनन्द में लीन अन्तःकरण वाला बन जाऊँ ॥१०॥ वसिष्ठजी ने कहा—इस रीति से जमदग्नि महामुनि के पुत्र परशुराम ने भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की स्तुति करके फिर इसके पश्चात् वह विरत होकर चुप हो गए थे। वह सम्पूर्ण तत्वों के अर्थों का ज्ञाता एक सफलता प्राप्त होने वाले के ही समान परम प्रसन्न पुलकोद्गम वाला हो गया था ॥११॥ इसके अनन्तर कमलों के सदृश लोचनों वाले परम प्रसन्न आत्मा से युक्त होते हुए श्रीकृष्ण ने अपने आगे उपस्थित-भक्ति भावना से प्रणत तथा कृपा के पात्र भार्गव से कहा—॥१२॥ श्रीकृष्ण बोले—हे भार्गवेन्द्र ! तुम इस समय मेरे प्रसाद (पूर्ण प्रसन्नता) से सिद्ध हो गये हो। हे वत्स ! तुम आज से लेकर इस लोक में सबसे अधिक श्रेष्ठ हो गए हो ॥१३॥ पहिले समय में विष्णु महाश्रम में मैंने आपको वर दिया था। वह सब कुछ हे विभो ! क्रम से बहुत से वर्षों में पूर्ण होना चाहिए अर्थात् पूर्ण हो ही जायगा ॥१४॥

दया विधेया दीनेषु श्रेय उत्तममिच्छता ।
योगश्च साधनीयो वै शत्रूणां निग्रहस्तथा ॥१५
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिंस्तेजसा च बलेन च ।
ज्ञानेन यशसा वापि सर्वश्रेष्ठतमो भवान् ॥१६
अथ स्वगृहमासाद्य पित्रोः शुश्रूषणं कुरु ।
तपश्चर यथाकालं तेन सिद्धिः करस्थिता ॥१७
राधोत्संगात्समुत्थाप्य गणेशं राधिकेश्वरः ।
आलिंग्य गाढं रामेण मैत्रीं तस्य चकार ह ॥१८
अथोभावपि संप्रीतौ तदा रामगणेश्वरौ ।
कृष्णाज्ञया महाभागौ बभूवतुररिंदम ॥१९
एतस्मिन्नंतरे देवी राधा कृष्णप्रिया सती ।
उभाभ्यां च वरं प्रादात्प्रसन्नास्या मुदान्विता ॥२०
राधोवाच—सर्वस्य जगतो वंद्यौ दुराधर्षौ प्रियावहौ ।
मद्भक्तौ च विशेषेण भवंतौ भवतां सुतौ ॥२१

अब मेरा तुम्हारे लिए यह उपदेश है कि परम श्रेय की अभिलाषा रखने वाले आपको जो विचारे दीन प्राणी हैं उन पर दया करनी चाहिए। और तुमको योग की साधना करनी चाहिए तथा अपने शत्रुओं का निग्रह

३५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भी करना चाहिए । १५। इस लोक में आपके समान अन्य कोई भी तेज-बल-ज्ञान और यश में समानता रखने वाला नहीं है और आप सबमें परम श्रेष्ठतम हैं । १६। उसके अनन्तर आप अपने निवास गृह में पहुँचकर अपने माता-पिता की शुश्रूषा करो । और जब भी समय प्राप्त हो तब तपश्चर्या करो । इससे सिद्धि आपके करतल में स्थित हो जायगी । १७। फिर श्रीराधिका के ईश्वर ने भी राधाजी की गोद से गणेशजी को अपनी बाहुओं से स्वयं उठाकर अपने वक्ष स्थल से लगा लिया था और भली-भाँति स्नेहालिङ्गन करके फिर उनकी मित्रता परशुराम के साथ करादी थी । १८। हे शत्रुओं दमन करने वाले ! इसके उपरान्त उस समय में भगवान् श्रीकृष्ण की आज्ञा से महान भाग वाले वे दोनों ही परशुराम और गणेश बहुत प्रीति वाले हो गये थे अर्थात् उन दोनों की बहुत ही गहरी प्रीतिमयी मित्रता हो गयी थी और पहिले हुआ द्वेष भाव बिल्कुल ही उनके हृदयों से निकल गया था । १९। इसी बीच में परम सती-साध्वी श्रीकृष्ण चन्द्र की प्रिया श्रीराधा देवी अधिक आनन्द से समन्वित होकर प्रसन्न मुख कमल वाली ने उन दोनों के लिए वर दिया था । २०। श्रीराधाजी ने कहा-हे पुत्रो ! इस सम्पूर्ण जगत के द्वारा वन्दना करने के योग्य—असह्य तेज वाले और प्रिय कार्य का आवाहन करने वाले तथा आप दोनों ही विशेष रूप से मेरे भक्त हो जावें । २१।

भवतोर्नाम चोच्चार्य यत्कार्यं यः समारभेत् ।
सिद्धिं प्रयातु तत्सर्वं मत्प्रसादाद्धि तस्य तु ॥२२
अथोवाच जगन्माता भवानी भववल्लभा ।
वत्स राम प्रसन्नाऽहं तुभ्यं कं प्रददे वरम् ।
तं प्रब्रूहि महाभाग भयं त्यक्त्वा सुदूरतः ।

राम उवाच—

जन्मांतरसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम् ॥२३
कृष्णयोर्भवयोर्भक्तो भविष्यामीति देहि मे ।
अभेदेन च पश्यामि कृष्णौ चापि भवौ तथा ॥२४

पार्वत्युवाच—

एवमस्तु महाभाग भक्तोऽसि भवकृष्णयोः ।

भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३५५

चिरंजीवी भवाशु त्वं प्रसादान्मम सुव्रत ॥२५ अथोवाच धराधीशः प्रसन्नस्तमुमापतिः । प्रणतं भार्गवेन्द्रं तु वरार्हं जगदीश्वरः ॥२६ शिव उवाच- रामभक्तोऽसि मे वत्स यस्ते दत्तो वरो मया । स भविष्यति कार्त्स्न्येन सत्यमुक्तं न चान्यथा ॥२७ अद्यप्रभृति लोकेऽस्मिन् भवतो वलवत्तरः । न कोऽपि भवताद्वत्स तेजस्वी च भवत्परः ॥२८

जो कोई पुरुष आपके शुभ नाम का उच्चारण करके जो भी कुछ कार्य का समारम्भ किया करता है उसका वह कार्य मेरे प्रसाद से निश्चित रूप से सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।२२। इसके उपरान्त भगवान भव (शिव) की वल्लभा भवानी देवी जो इस समस्त जगत को जन्म देने वाली माता हैं, बोली थीं । हे राम, हे वत्स ! मैं तुम से बहुत प्रसन्न हूँ, मुझे तुम यह बतला दो कि तुम्हारे लिए मैं क्या वरदान दे दूँ । हे महान भाग वाले ! उसी वरदान को जो तुमको अभिलाषित हो मुझे स्पष्ट बतलादो और इसमें सर्वथा भय मत करो तथा भय को तो एकदम बहुत दूर हटा दो । परशुराम जी ने कहा—मैं अपने सहस्रों जन्मों में भी जिन जिन देहों में गमन करके समुत्पन्न होऊँ ।२३। श्री राधा कृष्ण और भवानी-भव का अनन्य भक्त होऊँ यही वरदान आप मुझे प्रदान कीजिए । श्री राधा कृष्ण और भव-भवानी—इन दोनों युगलों का मैं कोई भेद भी नहीं देखूँ अर्थात् इनका एक ही स्वरूप मेरी दृष्टि में बना रहे ।२४। जगदम्बा पार्वतीजी ने कहा—हे महाभाग ! इसी प्रकार से होगा । तुम तो भगवान शंकर और श्रीकृष्ण-चन्द्र के परम भक्त हो । हे सुव्रत ! अर्थात् परम सुन्दर व्रत वाले ! मेरी कृपा के प्रसाद से तुम बहुत शीघ्र चिरकाल पर्यन्त जीवित रहने वाले हो जाओ ।२५। इसके पश्चात् इस वसुन्धरा के स्वामी भगवान उमापति परमाधिक प्रसन्न होकर उस राम से बोले और जगत के स्वामी ने जब देखा था कि वह भार्गवेन्द्र परशुराम उनके चरणों में प्रणत हो रहा है तथा वरदान प्राप्त करने का परम योग्य पात्र है तो उन्होंने कहा—।२६। भगवान शिव ने कहा—हे वत्स ! तुम मेरे राम के भक्त हो—यह वरदान मैंने तुमको दिया था । वह वरदान सम्पूर्णतया कहा हुआ सत्य ही होगा और इस वरमें

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अन्यथा कुछ भी नहीं होगा अर्थात् इसमें कुछ भी अन्तर न होगा ।२७। हे वत्स ! इस समस्त लोक में आज ही से आरम्भ करके आपसे अधिक बल- वान कोई भी नहीं होगा और न कोई आपसे अधिक तेज के धारण करने वाला तेजस्वी ही होगा ।२८।

वसिष्ठ उवाच- अथ कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य शिवं च नगनंदिनीम् । गोलोकं प्रययौ युक्तः श्रीदाम्ना चापि राधया ।।२६ अथ रामोऽपि धर्मात्मा भवानीं च भवं तथा । संपूज्य चाभिवाद्याथ प्रदक्षिणमुपाक्रमीत् ।।३० गणेशं कार्त्तिकेय च नत्वापृच्छद्य च भूपते । अकृतव्रणसंयुक्तो निश्चक्राम गृहांतरात् ।।३१ निष्क्रम्यमाणो रामस्तु नंदीश्वरमुखैर्गणैः । नमस्कृतो ययौ राजन्स्वगृहं परया मुदा ।।३२

वसिष्ठजी ने कहा—इसके अनन्तर भगवान श्रीकृष्ण शिव और नग- राज की पुत्री को अनुज्ञापित करके श्रीराधा और श्री दामा के साथ अपने गोलोक धाम को चले गये थे ।२६। इसके पश्चात् धर्मात्मा राम ने भी भग- वान शिव और जगदम्बा का भली-भाँति अर्चन करके और अभिवादन करके इसके अनन्तर उन्होंने प्रदक्षिणा करने का उपक्रम किया था ।३०। हे भूपते ! फिर राम ने गणेशजी और स्वामी कार्त्तिकेय की सेवा में प्रणिपात करके तथा उनसे पूछकर उस गृह के मध्य भाग से बाहिर निष्क्रमण किया था ।३१। हे राजन् ! जिस बेला में राम वहाँ से बाहर निकल कर जा रहे थे उस अवसर पर नन्दीश्वर प्रभृति शिव के मुख्य गणों के द्वारा उनको प्रणाम किया गया था और फिर वह राम बड़ी ही प्रसन्नता से अपने गृह को चले गये थे ।३२।

सगरोपाख्यान (१)

वसिष्ठ उवाच- राजन्नेवं भृगुविद्वानपश्यञ्जनपदान्बहून् । समाजगाम धर्मात्माऽकृतव्रणसमन्वितः ॥१॥

सगरोपाख्यान (१) ] [ ३५७

निलिल्युः क्षत्रियाः सर्वे यत्र तत्र निरीक्ष्य तम् । व्रजंतं भार्गवं मार्गे प्राणरक्षणतत्पराः ॥२ अथाससाद राजेंद्र रामः स्वपितुराश्रमम् । शांतसत्त्वसमाकीर्णं वेदध्वनिनिनादितम् ॥३ यत्र सिंहा मृगा गावो नागमाञ्जारमूषकाः । समं चरंति संहृष्टा भयं त्यक्त्वा सुदूरतः ॥४ यत्र धूमं समीक्ष्यैव ह्यग्निहोत्रसमुद्भवम् । उन्नदंति मयूराश्च नृत्यंति च महीपते ॥५ यत्र सायंतने काले सूर्यस्याभिमुखं द्विजैः । जलांजलीन्प्रक्षिपद्भिः क्रियते भूर्जलाविला ॥६ यत्रांतेवासिभिर्नित्यं वेदाः शास्त्राणि संहिताः । अभ्यस्यंते मुदा युक्तैर्ब्रह्मचर्यव्रते स्थितैः ॥७

श्री वसिष्ठ महामुनि ने कहा— हे राजन् ! इस प्रकार से विद्वान् भृगु बहुत-से जन पदों का अवलोकन करते हुए वे धर्मात्मा राम अकृत व्रण से समन्वित होकर समागत हो गये थे ।१। मार्ग में जहाँ पर भी क्षत्रिय मिले थे वे सब उन परशुराम को देखकर छिप गये थे क्योंकि मार्ग में राम गमन करते हुए उन्हें दिखलाई पड़े थे और वे विचारे अपने प्राणों की रक्षा में परायण होकर इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे थे ।२। हे राजेन्द्र ! इसके पश्चात् परशुराम अपने पिता के आश्रम में पहुँच गए थे जो आश्रम परम शान्त जीवों से घिरा हुआ था और जिसमें वेद मन्त्रों की ध्वनि गूंज रही थी ।३। उस आश्रम में स्वभाव जनित वैर भाव भी नाम मात्र को भी नहीं था और परस्पर में निसर्ग शत्रु जीव भी जैसे सिंह और मृग तथा गौ-सर्प-मार्जार और मूषक भी सब मिले-जुले एक साथ सञ्चरण करते थे और अपने स्वाभाविक शत्रुओं का भी भय दूर करके त्याग दिया था ।४। हे महीपते ! जिस आश्रम में निरन्तर अग्नि होत्र के होते रहने से समुत्पन्न हुए धूम (धूँआ) को देखकर ही मेघावरण की भ्रान्ति से अर्थात् घने धूम के द्वारा समावृत अन्तरिक्ष को मेघाच्छन्न समझकर मयूर बहुत प्रसन्न हो रहे थे और अपने चित्रविचित्र पिच्छों को फैला कर नृत्य कर रहे थे जहाँ पर सायंकाल के समय में द्विजगण सूर्यदेव के सम्मुख में जल की अञ्जलियों

३५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

का प्रक्षेप कर रहे थे जिस जल से सारी भूमि आविल हो गई थी अर्थात् भीगकर मटमैले रङ्ग की हो रही थी ।६। जहाँ पर अध्ययन शील बटु ब्रह्म-चारियों के द्वारा नित्य ही वेदों-शास्त्रों और संहिताओं का अभ्यास किया जाता था । ये सभी छात्र परमाधिक हर्ष से समन्वित तथा ब्रह्मचर्य व्रत में समास्थित रहा करते थे ।७।

अथ रामः प्रसन्नात्मा पश्यन्नाश्रमसंपदम् । प्रविवेश शनै राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥८ जयशब्दं नमः शब्दं प्रोच्चरद्भिद्विजात्मजैः । द्विजैश्च सत्कृतो रामः परं हर्षमुपागतः ॥६ आश्रमाभ्यंतरे तत्र संप्रविश्य निजं गृहम् । ददर्श पितरं रामो जमदग्निं तपोनिधिम् ॥१० साक्षाद्भृगुमित्रासीनं निग्रहानुग्रहक्षमम् । पपात चरणोपान्ते ह्यष्टांगालिंगितावनिः ॥११ रामोऽहं तव दासोऽस्मि प्रोच्चरन्निति भूपते । जग्राह चरणौ चापि विधिवत्सज्जनाग्रणीः ॥१२ अथ मातुश्च चरणावभिवाद्य कृतांजलिः । उवाच प्रणतो वाक्यं तयोः संहर्षकारणम् ॥१३ राम उवाच- पितस्तव प्रभावेण तपसोऽतिदुरासदः । कार्त्तवीर्यो हतो युद्धे सपुत्रबलवाहनः ॥१४

इसके अनन्तर उस परम पुनीत आश्रम की अनिर्वचनीय विशाल विभूति का अवलोकन करने से प्रसन्न आत्मा वाले राम ने हे राजन् ! अपने पालित अकृत व्रण के सहित मन्दगति से उस आश्रम में प्रवेश किया था ।८। जैसे ही राम ने भीतर अपना पदार्पण किया था वैसे ही उनका दर्शन करके वहाँ पर स्थित द्विजों के बालकों ने जय-जयकार और नमस्कार की ध्वनियों को प्रोच्चारण किया था और विप्रों के द्वारा भार्गवेन्द्र राम का बड़ा ही अधिक सम्मान-सत्कार किया गया था । इस रीति से अपने स्वागत-समादर को देखते हुए राम को परमाधिक हर्ष हुआ था ।६। उस आश्रम के

सगरोपाख्यान (१) ] [ ३५६

अन्दर अपने गृह में जब राम ने प्रवेश किया था तो वहाँ पर परशुराम जी ने तपस्या के परम निधि अपने पिताश्री जमदग्नि महामुनि का दर्शन किया था।१०। वे जमदग्नि मुनि साक्षात् अपने पूर्व पुरुष भृगु मुनि के समान वहाँ पर विराजमान थे जो अपने तपोबल से विग्रह और अनुग्रह करने की विशाल सामर्थ्य धारण करने वाले थे। उनके समीप में पहुँचकर राम ने उनके चरण कमलों के निकट में अपने आठों अङ्गों से भूमि का आलिङ्गन करते हुए गिर गये थे अर्थात् भूमि पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम किया था।११। हे भूपते ! परशुराम ने प्रणिपात करते हुए—मैं आपका दासानुदास राम हूँ—आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित है—ऐसा मुख से उच्चारण करते हुए उस सज्जनों में प्रमुख राम ने प्रणाम करने की विधि से साथ पिताश्री के दोनों चरणों का ग्रहण किया था।१२। इसके अनन्तर उन्होंने अपनी माता श्री के चरणों में करबद्ध होते हुए अभिवादन किया था। फिर परम प्रणत होकर उन दोनों माता-पिता के अतीव हर्ष का कारण स्वरूप वाक्य कहा था।१३। राम ने कहा—हे पिताजी, आपके परम दुरासद तप के प्रभाव से ही मैंने बड़े बलवान कार्त्तवीर्य राजा का पुत्रों-सैनिकों और वाहनों के सहित हनन कर दिया है। इस निवेदन का तात्पर्य यही है कि उस इतने बलशाली शत्रू के निपातन करने में मेरा पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है यह सब कुछ आपके ही तप का प्रभाव है जिस से मेरे द्वारा वह दुष्ट मारा गया है।१४।

यस्तेऽपराधं कृतवान्दुष्टमंत्रिप्रचोदितः ।
तस्य दण्डो मया दत्तः प्रसह्य मुनिपुंगव ॥१५॥
भवन्तं तु नमस्कृत्य गतोऽहं ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।
तं नमस्कृत्य विधिवत्स्वकार्यं प्रत्यवेदयम् ॥१६॥
स मामुवाच भगवाञ्छ्रुत्वा वृत्तांतमादितः ।
व्रज स्वकार्यसिद्धयर्थं शिवलोकं सनातनम् ॥१७॥
श्रुत्वाऽहं तद्वचस्तात नमस्कृत्य पितामहम् ।
गतवाञ्छिवलोकं वै हरदर्शनकांक्षया ॥१८॥
प्रविश्य तत्र भगवन्नुमया सहितः शिवः ।
नमस्कृतो मया देवो वांछितार्थप्रदायकः ॥१९॥

३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तदग्रे निखिलः स्वीयो वृत्तांतो विनिवेदितः । मया समाहितधिया स सर्वं श्रुतवानपि ॥२० श्रुत्वा विचार्य तत्सर्वं ददौ मह्यं कृपान्वितः । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ॥२१

यह वही अधम राजा था। जिसने अपने परम दुष्ट मन्त्री की प्रेरणा से प्रेरित होकर आपका महान् अपराध किया था। उस अपराध का दण्ड मेरे द्वारा उसको दे दिया गया है। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैंने बलपूर्वक उसको दण्डित किया है। मैंने जिस रीति से अब तक जो कुछ भी किया है उसका पूर्ण विवरण क्रमानुसार मैं आपकी सन्निधि में निवेदित करता हूँ ।१५। मैंने आपको नमस्कार करके सर्वप्रथम ब्रह्माजी के समीप में गमन किया था क्योंकि समस्त सृष्टि ब्रह्मा जी के ही द्वारा हुई हैं। अतः उनको उसके निपातन से कुछ बुरा प्रतीत न हो, उनकी आज्ञा प्राप्त करना न्यायोचित एवं आवश्यक था। मैंने वहाँ जाकर उनको विधि के साथ प्रणिपात किया था और अपना सङ्कल्पित कार्य उनसे निवेदित कर दिया था ।१६। ब्रह्माजी ने आरम्भ से लेकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना था और मुझसे कहा था। समस्त क्षत्रियगण भगवान् शिव के परम भक्त हैं अतः अपने कार्य की सिद्धि के लिए सनातन शिवलोक में जाना चाहिए ।१७। हे तात ! पितामह के इस वचन का श्रवण करके ब्रह्माजी को नमस्कार करके भगवान् शिव के दर्शन की आकाङ्क्षा से फिर मैं शिवजी के लोक में गया था ।१८। हे भगवन् ! यहां पर शिव लोक में प्रवेश करके उमा देवी के सहित भगवान् शिव को नमस्कार किया था। भगवान् शिव तो ऐसे देव हैं जो सबके लिए वाञ्छित अर्थ का प्रदान कर दिया करते हैं ।१९। उन प्रभु के सामने मैंने अपना पूरा वृत्तान्त आवेदित कर दिया था। जो भी उनकी सेवा में निवेदित किया था उस सबको उन्होंने परम समाहित बुद्धि से उस सबका श्रवण भी किया था। उस सम्पूर्ण वृत्तान्त का श्रवण करके उन्होंने एक क्षण तक विचार किया था और फिर परमाधिक कृपा से समन्वित होकर समस्त सिद्धियों के देने वाले त्रैलोक्य विजय नाम वाला कवच मुझे उन्होंने प्रदान किया था ।२०-२१।

तल्लब्ध्वा तं नमस्कृत्य पुष्करं समुपागतः । तत्राहं साधयित्वा तु कवचं हृष्टमानसः ॥२२

सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६१

कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ शिवलोकं पुनर्गतः । तत्र तौ तु मया दृष्टौ द्वारे स्कन्दविनायकौ ॥२३ तौ नमस्कृत्य धर्मज्ञ प्रवेष्टुं चोद्यतोऽभवम् । स मामवेक्ष्य गणपो विशन्तं त्वरयान्वितम् ॥२४ वारयामास सहसा नाद्यावसर इत्यथ । मम तेन पितस्तत्र वाग्युद्धं हस्तकर्षणम् ॥२५ सञ्जातपरशुक्षेममतोऽभूद्भृगुनन्दन । तज्ज्ञात्वा समुद्गृह्य मामधश्चोर्ध्वमेव च ॥२६ करेण भ्रामयामास पुनश्चानीतवांस्ततः । तं दृष्ट्वातिक्रुधा क्षिप्तः कुठारो हि मया ततः ॥२७ दंतो निपतितस्तस्य ततो देव उपागतः । पार्वती तत्र रुष्टाऽभूत्तदा कृष्णः समागतः ॥२८

उस कवच की सिद्धि पुष्कर तीर्थ में बतलायी थी अतएव मैंने उस को प्राप्तकर भगवान् शङ्कर को प्रणाम किया और मैं फिर उसकी सिद्धि के लिये पुष्कर में समागत हो गया था। वहाँ पर मैंने उस कवच की सिद्धि प्राप्त कर ली थी । और उसे साधित करके मेरे मन में बड़ी प्रसन्नता हुई थी ।२२। फिर संग्राम भूमि में कार्त्तवीर्य का निपातन करके मैं पुनः शिव-लोक में गया था कि अपनी विजय का सम्वाद प्रभु को सुनादूँ । वहाँ पर मैंने द्वारपर स्कन्द और विनायक को समवस्थित देखा ।२३। हे धर्म के ज्ञान वाले भगवान् ! मैंने उन दोनों की सेवा में प्रणाम किया और मैं अन्दर प्रवेश करने के लिए समुद्यत हो गया था । उस समय में बड़ी शीघ्रता से युक्त होकर अन्दर प्रविष्ट होने वाले मुझ को देखकर गणेश जी ने रोक दिया था ।२४। उन्होंने मुझ से यही कह मुझको अन्दर प्रवेश करने से सहसा रोका था कि आज अन्दर गमन करने का अवसर नहीं है । हे पिताजी ! उस समय में मेरा उन गणेश जी के साथ पहिले तो वाग्युद्ध अर्थात् अच्छी तरह से कहा सुनी हुई थी और फिर हाथों का कर्षण अर्थात् मेरा हाथ पकड़कर खींचातानी हुई थी ।२५। उस समय में गणेश जी ने यह देखा कि भृगु नन्दन अपने परशु का प्रहार करने वाला हो रहा था । उन्होने यह जानकर मुझको पकड़ लिया था और ऊपर उठाकर नीचे की ओर कर दिया था ।२६।

३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गणेश जी ने अपने हाथ से उठाकर अच्छी तरह से ऊपर के अनेक लोकों में घुमाया था और फिर नीचे के लोकों में घुमाकर वहीं पर मुझे लाकर रख दिया था। फिर मुझको बड़ा भारी क्रोध आ गया था और मैंने अपना कुठार उनके ऊपर प्रक्षिप्त कर दिया था ।२७। उस प्रहार से गणेशजी का एक बांया दांत टूटकर भूमि पर गिर गया था। उसी समय में महादेवजी वहाँ पर आ गये थे। उस समय में पार्वतीजी ने अपने पुत्र के दाँत के टूट जाने की दुर्घटना देखी तो वे बहुत रुष्ट हो गयी थी। उसी समय में भगवान् श्री कृष्ण भी आ गये थे ।२८।

राधया सहितस्तेन सानुनीता वरं ददौ ।
मह्यं कृष्णो जगामाथ तेन मैत्रीं विधाय च ॥२९
ततः प्रणम्य देवेशौ पार्वतीपरमेश्वरौ ।
आगतस्तव सान्निध्यमकृतव्रणसंयुतः ॥३०
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्तवा भार्गवो रामो विरराम च भूपते ।
जमदग्निरुवाथेदं रामं शत्रुनिबर्हणम् ॥३१
जमदग्निरुवाच-
क्षत्रहत्याभिभूतस्त्वं तावद्दोषोपशांतये ।
प्रायश्चित्तं ततस्तावद्यथावत्कर्तुमर्हसि ॥३२
इत्युक्तः प्राह पितरं रामो मतिमतां वरः ।
प्रायश्चित्तं तु तद्योग्यं त्वं मे निर्देष्टुमर्हसि ॥३३
जमदग्निरुवाच-
व्रतैश्च नियमैश्चैव कर्षयन्देहमात्मनः ।
शाकमूलफलाहारो द्वादशाब्दं तपश्चर ॥३४
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं मातरं च भृगूद्वहः ।
प्रययौ तपसे राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥३५
सं गत्वा पर्वत वरं महेंद्रमरिकर्षणः ।

सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६३

कृत्वाऽऽश्रमपदं तस्मिंस्तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥३६ व्रतैस्तपोभिर्नियमैर्देवताराधनैरपि । निन्ये वर्षाणि कति चिद्रामस्तस्मिन्महात्मनाः ॥३७

भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधा जी को साथ में लेकर ही पधारे थे। उनके द्वारा पार्वतीजी का अनुभव किया था और पार्वती जगज्जननी ने मुझे वरदान प्रदान किया था। और भगवान् कृष्ण ने हम दोनों की मित्रता कराकर प्रणाम किया था और वहाँ से वे चले गये थे ।२६। इसके अनन्तर देवेश्वर पार्वती और परमेश्वर दोनोंको सादर प्रणिपात करके मैं अकृत व्रण के ही साथ में उनके समीप में उपस्थित हो गया था ।३०। वसिष्ठजी ने कहा—हे भूपते ! इतना ही सम्पूर्ण अपना वृत्तान्त कहकर फिर परशुराम चुप हो गये थे। इसके अनन्तर महामुनि जमदग्नि ने उन शत्रुओं के विनाश कर देने वाले राम से बोले ।३१। जमदग्नि ने कहा—हे राम ! आप तो अब समस्त क्षत्रियों की हत्या से अभिभूत हो गये हैं अर्थात् क्षत्रियों के वध की हत्या आपके ऊपर छायी हुई है। अतएव अब आप उस की हुई हत्या के निवारण करने के लिये यथाविधि प्रायश्चित्त करने के योग्य हैं अर्थात् उसके शोधन के वास्ते शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करना ही चाहिए ।३२। इस तरह से कथन करने वाले अपने पिताजी से मतिमानों में श्रेष्ठ राम ने यह प्रार्थना की थी कि उस विशाल वध के शोधन के योग्य जो भी कोई प्रायश्चित्त हो उसको आप ही मुझे निर्देश करने के लिए परम योग्य हैं ।३३। महामुनीन्द्र जमदग्नि जी ने कहा—बहुत-से व्रतों और नियमों के द्वारा अपने शरीर का कर्षण करते हुए केवल वन्य शाकों और मूलों का आहार करने वाले होकर बारह वर्षों तक निरन्तर तपश्चर्या का समाचरण करो ।३४। जब इस प्रकार से आत्म-शोधन के लिये पिताश्री के द्वारा कहा गया था तो परशुराम जी ने अपने माता-पिता के चरणों में प्रणिपात किया और अकृतव्रण को अपने साथ में लेकर हे राजन् ! वह तपस्या करने के लिये वहाँ से चले गये थे ।३५। वे परशुराम जिन्होंने अपने समस्त शत्रुओं का विनाश करके पूर्णतया कर्षणकार दिया था वे अब अपने देह की शुद्धि के लिए कर्षण करने के वास्ते महेन्द्र नामक पर्वत पर गये थे। उस गिरि पर अपना एक आश्रम बनाकर उन्होंने वहाँ पर परम दुश्चर तप किया था ।३६। वहाँ पर राम ने अनेक व्रत-तप-नियम और देवता के समाराधन के द्वारा उस आश्रम में महान् मन वाले भार्गव ने कुछ वर्ष व्यतीत कर दिये थे अर्थात् ऐसे ही अनेक साधनों को करके बहुत से वर्ष बिता दिये थे ।३७।

३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सगरोपाख्यान (२)

वसिष्ठ उवाच— ततः कदाचिद्विपिने चतुरंगबलान्वितः । मृगयामगमच्छूरः शूरसेनादिभिः सह ॥१ ते प्रविश्य महारण्यं हत्वा बहुविधान्मृगान् । जग्मुस्तृषार्त्ता मध्याह्ने सरितं नर्मदामनु ॥२ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वारि नद्या गतश्रमाः । गच्छंतो ददृशुर्मार्गे जमदग्नेरथाश्रमम् ॥३ दृष्ट्वाश्रमपदं रम्यं मुनीनागच्छतः पथि । कस्येदमिति पप्रच्छुर्भाविकर्मप्रचोदिताः ॥४ ते प्रोचुरतिशांतात्मा जमदग्नेर्महातपाः । वसंत्यस्मिन्सुतो यस्य रामः शस्त्रभृतां वरः ॥५ तच्छ्रुत्वा भीरभूत्तेषां रामनामानुकीर्तनात् । क्रोधं प्रसङ्ख्यानृशंस्य पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥६ अथ ते प्रोचुरन्योन्यं पितृहंतुर्वधात्पितुः । वैर निर्यातनं किं तु करिष्यामो दिशाधुना ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इसके उपरान्त यह हुआ था कि किसी समय में शूर शूरसेन आदि के साथ चतुरङ्गिणी सेना लेकर उसी वन में मृगया (शिकार) के लिये गया था। जिसमें पैदल-अश्व-हाथी और रथ ये सभी चारों साधन होते हैं वही चतुरङ्गिणी सेना कही जाती है ।१। उन्होंने उस महान् विशाल अरण्य में प्रवेश करके बहुत-से मृगों का हनन किया था । जब मध्याह्न काल हो गया तो वे सब पिपासा बेचैन होकर नर्मदा नदी की ओर पहुँच गये थे ।२। वहाँ पर उनने जल मान किया और स्नान किया था और अपने श्रम को दूर किया था। जब वहाँ से वे जा रहे थे तो भृगुवर जमदग्नि मुनि का आश्रम उनने देखा था ।३। वह आश्रम का स्थान बहुत ही सुरम्य था। उसका अवलोकन करके उन्होंने मार्ग में आगमन करते हुए मुनिगणों से पूछा था कि यह किसका ऐसा परम सुन्दर आश्रम है। उस समय में हानहार ऐसा ही था और भविष्य में होने वाले कर्मों से वे प्रेरित

सगरोपाख्यान (२) ] [ ३६५

हो गये थे ।४। उन मुनिगणों ने उस नृप से कहा था कि इस आश्रम में अत्यन्त ही प्रशान्त आत्मा वाले और महान् तपस्वी जमदग्नि मुनि निवास किया करते हैं जिनके पुत्र शस्त्र धारियों में परम श्रेष्ठ परशुराम हैं ।५। यह श्रवण करके परशुराम जी के नाम के अनुकीर्त्तन से पहिले तो सुनने के साथ ही उनके हृदय में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया था किन्तु फिर क्रोध को सहन करके उनको परशुराम की बड़ी भारी क्रूरता के साथ किये हुए पूर्व वैर का अनुस्मरण हो गया था ।६। इसके अनन्तर उन्होंने एक दूसरे से आपस में कहा था कि इन्होंने तो हमारे पिता का वध किया था तो ऐसे पिता के हनन करने वाले के पिता का अब इस समय में वध करके हम सब इस रीति से अपने वैर का बदला अवश्य निकालेंगे ।७।

इत्युक्त्वा खड्गहस्तास्ते संप्रविश्य तदाश्रमम् । प्रजघ्निरे प्रयातेषु मुनिवीरेषु सर्वतः ॥८ तं हत्वाऽस्य शिरो हृत्वा निषादा इव निर्दयाः । प्रययुस्ते दुरात्मानः सबलाः स्वपुरीं प्रति ॥९ पुत्रास्तस्य महात्मानो दृष्ट्वा स्वपितरं हतम् । परिवार्य महाराज रुरुदुः शोककर्शिताः ॥१० भर्त्तारं निहतं भूमौ पतितं वीक्ष्य रेणुका । पपात मूर्च्छिता सद्यो लतेवाशनिताडिता ॥११ सा स्वचेतसि संमूर्च्छद्य शोकपावकदीपितान् । दूरप्रनष्टसंज्ञेव सद्यः प्राणैर्व्ययुज्यत ॥१२ अनालपंत्यां तस्यां तु संज्ञां याता हि ते पुनः । न्यपतन्मूर्च्छिता भूमौ निमग्नाः शोकसागरे ॥१३ ततस्तपोधना येऽन्ये तत्तपोवनवासिनः । समेत्याश्वासयामासुस्तुल्यदुःखाः सुतान्मुने ॥१४

इतना कहकर वे सब करों में खड्ग लेकर उस आश्रम के अन्दर प्रविष्ट हो गये थे और सभी ओर से गमनागमन करने वाले मुनियों का हनन किया था ।८। फिर उनने जमदग्नि मुनि का हनन कर दिया था और दया से रहित निषादों के ही समान उस जमदग्नि का मस्तक काटकर हरण कर लिया था । वे महान् दुष्ट आत्मा वाले अपनी सेना के सहित

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अपनी नगरी की ओर चले गये थे ।९। हे महाराज ! उस महामुनि जमदग्नि के जो अन्य पुत्र थे वे परम साधु प्रकृति से सुसम्पन्न महान् आत्मा वाले तापस ही थे जब उन्होंने देखा कि उनके पिता का बड़ी निर्दयता से हनन कर दिया गया है तो उस मृत पिता के शव के चारों बैठकर महान शोक से उत्पीड़ित होते हुए रुदन करने लग गये थे ।१०। अपने प्राणनाथ स्वामी को निहत और भूमि पर पड़े हुए देखकर मुनि पत्नी रेणुका देवी तुरन्त ही भूमि पर पछाड़ खाकर वज्राघात से गिरी हुई कोमल लता के ही समान मूर्च्छित होकर गिर गयी थी ।११। उसके मन में मूर्च्छा आ गयी थी और उसको अपने देह का अनुसन्धान नहीं रहा था । वह शोक की अग्नि से दीपित हो गयी थी । वह बहुत अधिक संज्ञा से हीन के समान ही होकर तुरन्त ही अपने प्रिय प्राणों से वियुक्त हो गयी थी अर्थात् उसके प्राण पखेरू तुरन्त ही उड़ गए थे ।१२। जब उसके पुत्रों ने देखा कि वह कुछ भी नहीं बोल रही है तो फिर उनको होश आया था और अपनी माता का मृत शरीर देखकर वे सभी शोक के अगाध सागर में निमग्न होते हुए मूर्च्छित होकर भूमि में पछाड़ खाकर गिर गये थे ।१३। जब ऐसा शोक से वहाँ बड़ा हाहाकार मच गया तो जो अन्य तप के ही धन वाले तपस्वी गण थे जो कि उसी तपोवन में निवास करने वाले थे हे मुने ! उन सबको भी उन मुनि पति-पत्नियों के वियोग से समान ही दुःख हो रहा था और वे सब वहीं पर इकट्ठे हो गये थे तथा रेणुका के पुत्रों को समाश्वासन दिया था ।१४।

सान्त्व्यमाना मुनिगणैर्जामदग्न्या यथाविधि ।
आधुक्षुर्वचसा तेषामग्नौ पित्रोः कलेवरे ॥१५
चक्रुरेव तदूर्ध्वं वै यत्कर्त्तव्यमनंतरम् ।
पित्रोर्मरणदुःखेन पीड्यमाना दिवानिशम् ॥१६
तत काले गते रामः समानां द्वादशावधौ ।
निवृत्तस्तपसः सख्या सहागादाश्रमं पितुः ॥१७

समस्त समागत मुनिगणों के द्वारा अब अच्छी तरह से उन पुत्रों को सान्त्वना दी गयी थी तो जमदग्नि के उन मुनियों के कहने से अपने माता-पिता के शवों का कर्मकाण्ड के अनुसार अग्नि में दाह कर दिया था ।१५। अन्त्येष्टि के अनन्तर फिर जो भी करने के योग्य ऊर्ध्व क्रिया कलाप था उस

क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३६७

सबको भी पूर्णतया सम्पन्न किया था । वे सभी जमदग्नि के आत्मज अपने दोनों ही माता-पिता के मरण के असह्य दुःख से रात दिन पीड़ित होते हुए रहा करते थे ।१६। इसके अनन्तर कुछ काल के व्यतीत हो जाने पर जबकि बारह वर्षों की अवधि पूर्ण हो गयी थी तो अपनी तपश्चर्या से निवृत्त होकर राम अकृत व्रण के साथ अपने पिता श्री में आये थे ।१७।


क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा

वसिष्ठ उवाच—

स गच्छन्पथि शुश्राव मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।
राजपुत्रव्यवसितं पित्रोः स्वर्गतिमेव च ॥१॥

पितुस्तु जीवहरणं शिरोहरणमेव च ।
तन्मृतेरेव मरणं श्रुत्वा मातुश्च केवलम् ॥२॥

विललाप महाबाहुर्दुःखशोकसमन्वितः ।
तमथाश्वासयामास तुल्यदुःखोऽकृतव्रणः ॥३॥

हेतुभिः शास्त्रनिर्दिष्टैर्वीर्यसामर्थ्यसूचकैः ।
युक्तिलौकिकदृष्टान्तैस्तच्छोकं संव्यशामयत् ॥४॥

सान्त्वितस्तेन मेधावी धृतिमालंब्य भार्गवः ।
प्रययौ सहितः सख्या भ्रातॄणां तु दिदृक्षया ॥५॥

स तान् दृष्ट्वाभिवाद्यैतान् भार्गवो दुःखकर्षितः ।
शोकामर्षयुतस्तैश्च सह तस्थौ दिनत्रयम् ॥६॥

ततोऽस्य सुमहान्क्रोधः स्मरतो निधनं पितुः ।
बभूव सहसा सर्वलोकसंहरणक्षमः ॥७॥

श्री महामुनीन्द्र वसिष्ठजी ने कहा—परशुराम ने मार्ग में गमन करते हुए मुनि मण्डल से आरम्भ से सब तत्त्व सुन लिया था अर्थात् वहाँ पर किस तरह से सब घटनाएं हुईं थीं यह श्रवण कर लिया था । उनको यह भी ज्ञात हो गया था कि उन महान दुष्ट राज पुत्रों ने यह कुचेष्टाएं की थीं और उनके द्वारा पिता की मृत्यु तथा शोक में माता का देहान्त हो गया है

३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।१। अपने पिताजी के जीवन का हरण और उनके शिर को काटकर ले जाने का समाचार भी उन्होंने जानकर यह भी उनको ज्ञात हो गया था कि उनकी माताश्री का मरण पिताजी की मृत्यु हो जाने ही से शोकोद्रेक वश हो गयी थी ।२। वह महाबाहु को बड़ा भारी शोक और असह्य दुःख हुआ था । इससे वे राम बहुत अधिक विलाप करने लग गये थे । यद्यपि अकृत व्रण को भी परशुराम के ही समान दुःख हुआ था किन्तु फिर भी उसने राम को बहुत कुछ समाश्वासन दिया था ।३। वीर्य की सामर्थ्य के सूचक शास्त्रों में निविष्ट किये गए हेतुओं के द्वारा और युक्तियों से तथा लोक में होने वाले अनेक दृष्टान्तों के द्वारा परशुराम जी के उस महान शोक को अकृत व्रण ने शमित कर दिया था ।४। उस अकृत व्रण के द्वारा सान्त्वना दिए गए परशुराम ने धैर्य का अवलम्बन लिया था क्योंकि वह बहुत अधिक मेधावी थे । इसके अनन्तर परशुरामजी अपने सखा अकृत व्रण के साथ अपने भाइयों के देखने की इच्छा से अपने गृह की ओर चल दिये थे ।५। वहाँ पर भार्गव ने जाकर अभिवादन किया था और इन सबको परम दुःखित देखकर परशुरामजी को भी अत्यधिक दुःख हुआ था । उन सबके साथ में पुनः उस शोक का नवीनीकरण हो गया था और परम शोक में मग्न होकर वह वहाँ तीन दिन तक स्थित रहे थे ।६। इसके अनन्तर अपने पिता श्री के निधन का स्मरण करते हुए उनको महान क्रोध उत्पन्न हो गया था और तुरन्त ही वह सम्पूर्ण लोक के संहार कर देने में समर्थ हो गये थे ।७।

मातुरर्थे कृतां पूर्वं प्रतिज्ञां सत्यसंगरः ।
दृढीचकार हृदये सर्वक्षत्रवधोद्यतः ॥८
क्षत्रवंश्यानशेषेण हत्वा तद्दे हलोहितैः ।
करिष्ये तर्पणं पित्रोरिति निश्चित्य भार्गवः ॥९
भ्रातॄणां चैव सर्वेषामाख्यायात्मसमीहितम् ।
प्रययौ तदनुज्ञातः कृत्वां संस्थां पितुः क्रियाम् ॥१०
अकृतव्रणसंयुक्तः प्राप्य माहिष्मतीं ततः ।
तद्बाह्योपवने स्थित्वा सस्मार स महोदरम् ॥११
स तस्मै रथचापाद्यं सहसा श्वसमन्वितम् ।
प्रेषयामास रामाय सर्वसंहननानि च ॥१२

क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३६९

रामोऽपि रथमारुह्य सन्नद्धः सशरं धनुः । गृहीत्वापूरयच्छंखं रुद्रदत्तममित्रजित् ॥१३ ज्याघोषं च चकारोच्चै रोदसी कंपयन्निव । सहसाहोथ सारथ्यं चक्रे सारथिनां वरः ॥१४

माता रेणुका ने अपने पति के वियोग में विलाप करते हुए इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को पीटा था अतः परशुरामजी ने उसी समय में यह प्रतिज्ञा की थी कि मेरे पिता को क्षत्रिय जातीय नृप ने निहत किया है इसलिए मैं भी इक्कीस बार भूमण्डल को संहार करके क्षत्रियों से रहित कर दूँगा—माता के लिए की हुई इस प्रतिज्ञा को सत्यवादी दिया था। ८। ने समस्त क्षत्रियों के वध करने के लिये समुद्यत होकर हृदय में सुदृढ़ कर भार्गवेन्द्र ने ऐसा निश्चय कर लिया था कि क्षत्रियों के वंश में समुत्पन्न सबका निहनन करके उनके शरीरों के रुधिर से मैं अपने माता-पिता का तर्पण करूँगा ।९। अपने समस्त भाइयों से यह अपना समीहित सत्य संकल्प कहकर अपने पिताजी की संस्थित क्रिया को पूर्ण करके भाइयों की आज्ञा प्राप्त करके परशुराम चले गये थे ।१०। फिर अकृतव्रण को साथ में लेकर माहिष्मती नगरी में स्थित होकर उन्होंने महोदर (श्रीगणेश जी) का स्मरण किया था ।११। उन्होंने तुरन्त ही राम के लिए रथ-चाप आदि सभी आयुधों तथा अश्वों आदि को भेज दिया था ।१२। फिर परशुराम प्रभु भी उस रथ पर समारूढ़ होकर सन्नद्ध हो गये थे और शत्रुओं पर विजय पाने वाले ने शरके सहित धनुष का ग्रहण कर लिया था तथा भगवान रुद्र के द्वारा प्रदत्त शंख की ध्वनि करके उससे सम्पूर्ण भाग को पूरित कर दिया था ।१३। अपने धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से अन्तरिक्ष और भूमण्डल को प्रकम्पित करते हुए बड़ा ही उच्च घोष किया था । सारथियों में परम श्रेष्ठ सहसाहु ने उनके रथ का सारथि होने का कार्य ग्रहण किया था ।१४।

रथज्याशंखनादैस्तु वधात्पित्रोर्मषिणः । तस्याभून्नगरी सर्वा संक्षुब्धाश्च नरद्विपाः ॥१५ रामं त्वागतमाज्ञाय सर्वक्षत्रकुलांतकम् । संक्षुब्धाश्चक्रुरुद्योगं संग्रामाय नृपात्मजाः ॥१६ अथ पंचरथाः शूराः शूरसेनादयो नृप ।

३७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

रामेण योद्धुं सहिता राजभिश्चक्रुरुद्यमम् ॥१७ चतुरङ्गबलोपेतास्ततस्ते क्षत्रियर्षभाः । राममासादयामासुः पतंगा इव पावकम् ॥१८ निवार्य तानापतितो रथेनैकेन भार्गवः । युयुधे पार्थिवैः सर्वैः समरेऽमितविक्रमः ॥१९ ततः पुनरभूद्युद्धं रामस्य सह राजभिः । जघान यत्र संक्रुद्धो राज्ञां शतमुदारधीः ॥२० ततः स सूरसेनादीन्हत्वा सबलवाहनान् । क्षणेन पातयामास क्षितौ क्षत्रियमंडलम् ॥२१

अपने माता और पिता दोनों के वध हो जाने से परशुरामजी को बड़ा भारी क्रोध हो गया था। जब परम क्रुद्ध भार्गव के रथ प्रत्यञ्चा और शंख के नाद हुए तो इनसे उस नृप की समस्त नगरी और नर तथा द्विप सभी अत्यन्त संक्षुब्ध हो गये थे। १५। उन नृप के पुत्रों ने जब यह समझ लिया था कि सब क्षत्रियों के कुलों का अन्त कर देने वाले परशुराम समा-गत हो गये हैं तो वे बहुत ही क्षुब्ध हुए थे और फिर उन्होंने राम के साथ संग्राम करने के लिए उद्योग किया था। १६। इसके अनन्तर हे नृप ! पञ्च-रथ शूरसेन प्रभृति शूरों ने अनेक अन्य राजाओं के साथ परशुरामजी युद्ध करने के लिए उद्यम किया था। १७। इसके उपरान्त वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी चतुरङ्गिणी सेनाओं से समन्वित हुए थे और सब राम के पास प्राप्त हो गये थे। जिस तरह पावक पर गिरने वाले पतङ्गों को अग्नि भस्मसात् करके निवारित कर दिया करता है उसी भाँति भार्गवेन्द्र ने अपने एक ही रथ के द्वारा उस पर संस्थित होकर अपने ऊपर चारों ओर से आक्रमण करके आपतन करने वालों को निवारित कर दिया था। अपरिमित बल-विक्रम से सुसम्पन्न राम ने समराङ्गण में उन सभी नृपों के साथ घोर युद्ध किया था। १८-१९। इसके अनन्तर फिर भार्गव का युद्ध राजाओं के साथ हुआ था और उस उदार बुद्धि वाले परशुराम ने उन सौ राजाओं का वध कर दिया था। २०। फिर शूरसेन आदि नृपों का सेना और वाहनों के सहित हनन करके एक ही क्षण में उस पूर्ण क्षत्रियों के मण्डल को भूमि पर गिरा दिया था। २१।

क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३७१

ततस्ते भग्नसंकल्पा हतस्वबलवाहनाः ।
हतशिष्टा नृपतयो दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ॥२२
एवं विद्राव्य सैन्यानि हत्वा जित्वाथ संयुगे ।
जघान शतशो राज्ञः शूराञ्छरवराग्निना ॥२३
ततः क्रोधपरीतात्मा दग्धुकामोऽखिलां पुरीम् ।
उदैरयद्‌भार्गवोऽस्त्रं कालाग्निसदृशप्रभम् ॥२४
ज्वालाकवलिताशेषपुरप्राकारमालिनीम् ।
पुरीं सहस्त्यश्वनरां स ददाहास्त्रपावकः ॥२५
दह्यमानां पुरीं दृष्ट्वा प्राणत्राणपरायणः ।
जीवनाय जगामाशु वीतिहोत्रो भयातुरः ॥२६
अस्त्राग्निना पुरीं सर्वां दग्ध्वा हत्वा च शात्रवान् ।
प्राश्यानोऽखिलान् लोकान् साक्षात्काल इवांतकः ॥२७
अकृतव्रणसंयुक्तः सहसाहेन चान्वितः ।
जगाम रथघोषेण कंपयन्निव मेदिनीम् ॥२८

इसके अनन्तर वे समस्त नृप भग्न सङ्कल्प वाले हो गये थे और उनके सैनिक तथा सब वाहन हाथी घोड़े आदि नष्ट हो गये थे। जो भी नृप हनन करने से बच गये थे वे भय से भीत होकर सब दिशाओं की ओर इधर-उधर भाग गये ।२२। इस रीति से सम्पूर्ण सेना के सैनिकों को खदेड़ कर तथा हनन करके भार्गवेन्द्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की थी और अपने वाणों की अग्नि के द्वारा सैकड़ों शूर नृपों का वध कर दिया था ।२३। फिर महान् क्रोध से भरी हुई आत्मा वाले परशुराम ने उस पुरी को दग्ध करने की इच्छा की थी तथा भार्गव ने कालाग्नि अपने अस्त्र को छोड़ दिया था ।२४। उस अस्त्र की अग्नि ने उस नगरी को जिसमें सभी हाथी-घोड़े और मनुष्य थे जला दिया था और वह पुरी अस्त्राग्नि के जल कर ज्वालाओं से उसके पुरप्राकार आदि की माला से कवलित हो गयी थी अर्थात् उस महान् प्रदीप्त अग्नि ने सबको स्वाहा कर दिया था और वहां पर कुछ भी शेष नहीं रहा था ।२५। उस समस्त पुरी को जलती हुई देखकर अपने प्राणों की रक्षा में तत्पर वीतिहोत्र भय से आतुर होकर वहाँ से जीवन के परित्राण

३७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करने के लिये शीघ्र ही चला गया था ।२६। अपनी अस्त्र की अग्नि से उस सम्पूर्ण नगरी को जलाकर तथा सब शत्रुओं का हनन करके उस समय में भार्गवेन्द्र राम समस्त लोकों का विनाश करते हुए साक्षात् अन्त कर देने वाले काल की ही भाँति हो गये थे ।२७। फिर अकृतव्रण के सहित और सहसाहु से समन्वित होकर अपने रथ के महान् घोष से सम्पूर्ण पृथ्वी को कम्पित करते हुए वहाँ से गये थे ।२८।

विनिघ्नन् क्षत्रियान्सर्वान् संशाम्य पृथिवीतले ।
महेंद्राद्रिं ययौ रामस्तपसे धृतमानसः ॥२६
तस्मिन्नष्टचतुष्कं च यावत्क्षत्रसमुद्गमम् ।
प्रत्येत्य भूयस्यद्धत्यै बद्धदीक्षो धृतव्रतः ॥३०
क्षत्रक्षेत्रेषु भूयश्च क्षत्रमुत्पादितं द्विजैः ।
निजघान पुनर्भू'मो राज्ञः शतसहस्रशः ॥३१
वर्षद्वयेन भूयोऽपि कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् ।
षट्चतुष्टयवर्षान्तं तपस्तेपे पुनश्च सः ॥३२
भूयोऽपि राजन् संबुद्ध' क्षत्रमुत्पादितं द्विजैः ।
जघान भूमौ निःशेषं साक्षात्काल इवांतकः ॥३३
कालेन तावता भूयः समुत्पन्नं नृपान्वयम् ।
निघ्नंश्चचार पृथिवीं वर्षद्वयमनारतम् ॥३४
अलं रामेण राजेंद्र स्मरता निधनं पितुः ।
त्रि सप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥३५

इस पृथ्वी तल पर क्षत्रियों का निहनन करते हुए पूर्णतया इस भूमि पर शान्ति स्थापित करके फिर भार्गव राम तपश्चर्या करने के लिये मन में निश्चय करके महेन्द्र पर्वत पर वहाँ से चले गये थे ।२६। उसमें जितना भी क्षत्रियों का समुद्रय था बारह थे उनके प्रति भी आकर फिर उनके हनन करने के वास्ते व्रत धारण करने वाले परशुराम बद्ध दीक्षा वाले हुए थे ।३०। और द्विजों ने क्षत्रियों के क्षेत्रों में फिर क्षत्रियों का उत्पादन कर दिया था। जब परशुरामजी को क्षत्रियों की उत्पत्ति का ज्ञान हुआ था कि अभी और भी क्षत्रिय समुत्पन्न हो गये हैं तो पुनः उन्होंने सैकड़ों और