संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गणेश जी ने अपने हाथ से उठाकर अच्छी तरह से ऊपर के अनेक लोकों में घुमाया था और फिर नीचे के लोकों में घुमाकर वहीं पर मुझे लाकर रख दिया था। फिर मुझको बड़ा भारी क्रोध आ गया था और मैंने अपना कुठार उनके ऊपर प्रक्षिप्त कर दिया था ।२७। उस प्रहार से गणेशजी का एक बांया दांत टूटकर भूमि पर गिर गया था। उसी समय में महादेवजी वहाँ पर आ गये थे। उस समय में पार्वतीजी ने अपने पुत्र के दाँत के टूट जाने की दुर्घटना देखी तो वे बहुत रुष्ट हो गयी थी। उसी समय में भगवान् श्री कृष्ण भी आ गये थे ।२८।
राधया सहितस्तेन सानुनीता वरं ददौ ।
मह्यं कृष्णो जगामाथ तेन मैत्रीं विधाय च ॥२९
ततः प्रणम्य देवेशौ पार्वतीपरमेश्वरौ ।
आगतस्तव सान्निध्यमकृतव्रणसंयुतः ॥३०
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्तवा भार्गवो रामो विरराम च भूपते ।
जमदग्निरुवाथेदं रामं शत्रुनिबर्हणम् ॥३१
जमदग्निरुवाच-
क्षत्रहत्याभिभूतस्त्वं तावद्दोषोपशांतये ।
प्रायश्चित्तं ततस्तावद्यथावत्कर्तुमर्हसि ॥३२
इत्युक्तः प्राह पितरं रामो मतिमतां वरः ।
प्रायश्चित्तं तु तद्योग्यं त्वं मे निर्देष्टुमर्हसि ॥३३
जमदग्निरुवाच-
व्रतैश्च नियमैश्चैव कर्षयन्देहमात्मनः ।
शाकमूलफलाहारो द्वादशाब्दं तपश्चर ॥३४
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं मातरं च भृगूद्वहः ।
प्रययौ तपसे राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥३५
सं गत्वा पर्वत वरं महेंद्रमरिकर्षणः ।