भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६१

कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ शिवलोकं पुनर्गतः । तत्र तौ तु मया दृष्टौ द्वारे स्कन्दविनायकौ ॥२३ तौ नमस्कृत्य धर्मज्ञ प्रवेष्टुं चोद्यतोऽभवम् । स मामवेक्ष्य गणपो विशन्तं त्वरयान्वितम् ॥२४ वारयामास सहसा नाद्यावसर इत्यथ । मम तेन पितस्तत्र वाग्युद्धं हस्तकर्षणम् ॥२५ सञ्जातपरशुक्षेममतोऽभूद्भृगुनन्दन । तज्ज्ञात्वा समुद्गृह्य मामधश्चोर्ध्वमेव च ॥२६ करेण भ्रामयामास पुनश्चानीतवांस्ततः । तं दृष्ट्वातिक्रुधा क्षिप्तः कुठारो हि मया ततः ॥२७ दंतो निपतितस्तस्य ततो देव उपागतः । पार्वती तत्र रुष्टाऽभूत्तदा कृष्णः समागतः ॥२८

उस कवच की सिद्धि पुष्कर तीर्थ में बतलायी थी अतएव मैंने उस को प्राप्तकर भगवान् शङ्कर को प्रणाम किया और मैं फिर उसकी सिद्धि के लिये पुष्कर में समागत हो गया था। वहाँ पर मैंने उस कवच की सिद्धि प्राप्त कर ली थी । और उसे साधित करके मेरे मन में बड़ी प्रसन्नता हुई थी ।२२। फिर संग्राम भूमि में कार्त्तवीर्य का निपातन करके मैं पुनः शिव-लोक में गया था कि अपनी विजय का सम्वाद प्रभु को सुनादूँ । वहाँ पर मैंने द्वारपर स्कन्द और विनायक को समवस्थित देखा ।२३। हे धर्म के ज्ञान वाले भगवान् ! मैंने उन दोनों की सेवा में प्रणाम किया और मैं अन्दर प्रवेश करने के लिए समुद्यत हो गया था । उस समय में बड़ी शीघ्रता से युक्त होकर अन्दर प्रविष्ट होने वाले मुझ को देखकर गणेश जी ने रोक दिया था ।२४। उन्होंने मुझ से यही कह मुझको अन्दर प्रवेश करने से सहसा रोका था कि आज अन्दर गमन करने का अवसर नहीं है । हे पिताजी ! उस समय में मेरा उन गणेश जी के साथ पहिले तो वाग्युद्ध अर्थात् अच्छी तरह से कहा सुनी हुई थी और फिर हाथों का कर्षण अर्थात् मेरा हाथ पकड़कर खींचातानी हुई थी ।२५। उस समय में गणेश जी ने यह देखा कि भृगु नन्दन अपने परशु का प्रहार करने वाला हो रहा था । उन्होने यह जानकर मुझको पकड़ लिया था और ऊपर उठाकर नीचे की ओर कर दिया था ।२६।