भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तदग्रे निखिलः स्वीयो वृत्तांतो विनिवेदितः । मया समाहितधिया स सर्वं श्रुतवानपि ॥२० श्रुत्वा विचार्य तत्सर्वं ददौ मह्यं कृपान्वितः । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ॥२१

यह वही अधम राजा था। जिसने अपने परम दुष्ट मन्त्री की प्रेरणा से प्रेरित होकर आपका महान् अपराध किया था। उस अपराध का दण्ड मेरे द्वारा उसको दे दिया गया है। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैंने बलपूर्वक उसको दण्डित किया है। मैंने जिस रीति से अब तक जो कुछ भी किया है उसका पूर्ण विवरण क्रमानुसार मैं आपकी सन्निधि में निवेदित करता हूँ ।१५। मैंने आपको नमस्कार करके सर्वप्रथम ब्रह्माजी के समीप में गमन किया था क्योंकि समस्त सृष्टि ब्रह्मा जी के ही द्वारा हुई हैं। अतः उनको उसके निपातन से कुछ बुरा प्रतीत न हो, उनकी आज्ञा प्राप्त करना न्यायोचित एवं आवश्यक था। मैंने वहाँ जाकर उनको विधि के साथ प्रणिपात किया था और अपना सङ्कल्पित कार्य उनसे निवेदित कर दिया था ।१६। ब्रह्माजी ने आरम्भ से लेकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना था और मुझसे कहा था। समस्त क्षत्रियगण भगवान् शिव के परम भक्त हैं अतः अपने कार्य की सिद्धि के लिए सनातन शिवलोक में जाना चाहिए ।१७। हे तात ! पितामह के इस वचन का श्रवण करके ब्रह्माजी को नमस्कार करके भगवान् शिव के दर्शन की आकाङ्क्षा से फिर मैं शिवजी के लोक में गया था ।१८। हे भगवन् ! यहां पर शिव लोक में प्रवेश करके उमा देवी के सहित भगवान् शिव को नमस्कार किया था। भगवान् शिव तो ऐसे देव हैं जो सबके लिए वाञ्छित अर्थ का प्रदान कर दिया करते हैं ।१९। उन प्रभु के सामने मैंने अपना पूरा वृत्तान्त आवेदित कर दिया था। जो भी उनकी सेवा में निवेदित किया था उस सबको उन्होंने परम समाहित बुद्धि से उस सबका श्रवण भी किया था। उस सम्पूर्ण वृत्तान्त का श्रवण करके उन्होंने एक क्षण तक विचार किया था और फिर परमाधिक कृपा से समन्वित होकर समस्त सिद्धियों के देने वाले त्रैलोक्य विजय नाम वाला कवच मुझे उन्होंने प्रदान किया था ।२०-२१।

तल्लब्ध्वा तं नमस्कृत्य पुष्करं समुपागतः । तत्राहं साधयित्वा तु कवचं हृष्टमानसः ॥२२