भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६३

कृत्वाऽऽश्रमपदं तस्मिंस्तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥३६ व्रतैस्तपोभिर्नियमैर्देवताराधनैरपि । निन्ये वर्षाणि कति चिद्रामस्तस्मिन्महात्मनाः ॥३७

भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधा जी को साथ में लेकर ही पधारे थे। उनके द्वारा पार्वतीजी का अनुभव किया था और पार्वती जगज्जननी ने मुझे वरदान प्रदान किया था। और भगवान् कृष्ण ने हम दोनों की मित्रता कराकर प्रणाम किया था और वहाँ से वे चले गये थे ।२६। इसके अनन्तर देवेश्वर पार्वती और परमेश्वर दोनोंको सादर प्रणिपात करके मैं अकृत व्रण के ही साथ में उनके समीप में उपस्थित हो गया था ।३०। वसिष्ठजी ने कहा—हे भूपते ! इतना ही सम्पूर्ण अपना वृत्तान्त कहकर फिर परशुराम चुप हो गये थे। इसके अनन्तर महामुनि जमदग्नि ने उन शत्रुओं के विनाश कर देने वाले राम से बोले ।३१। जमदग्नि ने कहा—हे राम ! आप तो अब समस्त क्षत्रियों की हत्या से अभिभूत हो गये हैं अर्थात् क्षत्रियों के वध की हत्या आपके ऊपर छायी हुई है। अतएव अब आप उस की हुई हत्या के निवारण करने के लिये यथाविधि प्रायश्चित्त करने के योग्य हैं अर्थात् उसके शोधन के वास्ते शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करना ही चाहिए ।३२। इस तरह से कथन करने वाले अपने पिताजी से मतिमानों में श्रेष्ठ राम ने यह प्रार्थना की थी कि उस विशाल वध के शोधन के योग्य जो भी कोई प्रायश्चित्त हो उसको आप ही मुझे निर्देश करने के लिए परम योग्य हैं ।३३। महामुनीन्द्र जमदग्नि जी ने कहा—बहुत-से व्रतों और नियमों के द्वारा अपने शरीर का कर्षण करते हुए केवल वन्य शाकों और मूलों का आहार करने वाले होकर बारह वर्षों तक निरन्तर तपश्चर्या का समाचरण करो ।३४। जब इस प्रकार से आत्म-शोधन के लिये पिताश्री के द्वारा कहा गया था तो परशुराम जी ने अपने माता-पिता के चरणों में प्रणिपात किया और अकृतव्रण को अपने साथ में लेकर हे राजन् ! वह तपस्या करने के लिये वहाँ से चले गये थे ।३५। वे परशुराम जिन्होंने अपने समस्त शत्रुओं का विनाश करके पूर्णतया कर्षणकार दिया था वे अब अपने देह की शुद्धि के लिए कर्षण करने के वास्ते महेन्द्र नामक पर्वत पर गये थे। उस गिरि पर अपना एक आश्रम बनाकर उन्होंने वहाँ पर परम दुश्चर तप किया था ।३६। वहाँ पर राम ने अनेक व्रत-तप-नियम और देवता के समाराधन के द्वारा उस आश्रम में महान् मन वाले भार्गव ने कुछ वर्ष व्यतीत कर दिये थे अर्थात् ऐसे ही अनेक साधनों को करके बहुत से वर्ष बिता दिये थे ।३७।