भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सगरोपाख्यान (२)

वसिष्ठ उवाच— ततः कदाचिद्विपिने चतुरंगबलान्वितः । मृगयामगमच्छूरः शूरसेनादिभिः सह ॥१ ते प्रविश्य महारण्यं हत्वा बहुविधान्मृगान् । जग्मुस्तृषार्त्ता मध्याह्ने सरितं नर्मदामनु ॥२ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वारि नद्या गतश्रमाः । गच्छंतो ददृशुर्मार्गे जमदग्नेरथाश्रमम् ॥३ दृष्ट्वाश्रमपदं रम्यं मुनीनागच्छतः पथि । कस्येदमिति पप्रच्छुर्भाविकर्मप्रचोदिताः ॥४ ते प्रोचुरतिशांतात्मा जमदग्नेर्महातपाः । वसंत्यस्मिन्सुतो यस्य रामः शस्त्रभृतां वरः ॥५ तच्छ्रुत्वा भीरभूत्तेषां रामनामानुकीर्तनात् । क्रोधं प्रसङ्ख्यानृशंस्य पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥६ अथ ते प्रोचुरन्योन्यं पितृहंतुर्वधात्पितुः । वैर निर्यातनं किं तु करिष्यामो दिशाधुना ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इसके उपरान्त यह हुआ था कि किसी समय में शूर शूरसेन आदि के साथ चतुरङ्गिणी सेना लेकर उसी वन में मृगया (शिकार) के लिये गया था। जिसमें पैदल-अश्व-हाथी और रथ ये सभी चारों साधन होते हैं वही चतुरङ्गिणी सेना कही जाती है ।१। उन्होंने उस महान् विशाल अरण्य में प्रवेश करके बहुत-से मृगों का हनन किया था । जब मध्याह्न काल हो गया तो वे सब पिपासा बेचैन होकर नर्मदा नदी की ओर पहुँच गये थे ।२। वहाँ पर उनने जल मान किया और स्नान किया था और अपने श्रम को दूर किया था। जब वहाँ से वे जा रहे थे तो भृगुवर जमदग्नि मुनि का आश्रम उनने देखा था ।३। वह आश्रम का स्थान बहुत ही सुरम्य था। उसका अवलोकन करके उन्होंने मार्ग में आगमन करते हुए मुनिगणों से पूछा था कि यह किसका ऐसा परम सुन्दर आश्रम है। उस समय में हानहार ऐसा ही था और भविष्य में होने वाले कर्मों से वे प्रेरित

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