संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३७१
ततस्ते भग्नसंकल्पा हतस्वबलवाहनाः ।
हतशिष्टा नृपतयो दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ॥२२
एवं विद्राव्य सैन्यानि हत्वा जित्वाथ संयुगे ।
जघान शतशो राज्ञः शूराञ्छरवराग्निना ॥२३
ततः क्रोधपरीतात्मा दग्धुकामोऽखिलां पुरीम् ।
उदैरयद्भार्गवोऽस्त्रं कालाग्निसदृशप्रभम् ॥२४
ज्वालाकवलिताशेषपुरप्राकारमालिनीम् ।
पुरीं सहस्त्यश्वनरां स ददाहास्त्रपावकः ॥२५
दह्यमानां पुरीं दृष्ट्वा प्राणत्राणपरायणः ।
जीवनाय जगामाशु वीतिहोत्रो भयातुरः ॥२६
अस्त्राग्निना पुरीं सर्वां दग्ध्वा हत्वा च शात्रवान् ।
प्राश्यानोऽखिलान् लोकान् साक्षात्काल इवांतकः ॥२७
अकृतव्रणसंयुक्तः सहसाहेन चान्वितः ।
जगाम रथघोषेण कंपयन्निव मेदिनीम् ॥२८
इसके अनन्तर वे समस्त नृप भग्न सङ्कल्प वाले हो गये थे और उनके सैनिक तथा सब वाहन हाथी घोड़े आदि नष्ट हो गये थे। जो भी नृप हनन करने से बच गये थे वे भय से भीत होकर सब दिशाओं की ओर इधर-उधर भाग गये ।२२। इस रीति से सम्पूर्ण सेना के सैनिकों को खदेड़ कर तथा हनन करके भार्गवेन्द्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की थी और अपने वाणों की अग्नि के द्वारा सैकड़ों शूर नृपों का वध कर दिया था ।२३। फिर महान् क्रोध से भरी हुई आत्मा वाले परशुराम ने उस पुरी को दग्ध करने की इच्छा की थी तथा भार्गव ने कालाग्नि अपने अस्त्र को छोड़ दिया था ।२४। उस अस्त्र की अग्नि ने उस नगरी को जिसमें सभी हाथी-घोड़े और मनुष्य थे जला दिया था और वह पुरी अस्त्राग्नि के जल कर ज्वालाओं से उसके पुरप्राकार आदि की माला से कवलित हो गयी थी अर्थात् उस महान् प्रदीप्त अग्नि ने सबको स्वाहा कर दिया था और वहां पर कुछ भी शेष नहीं रहा था ।२५। उस समस्त पुरी को जलती हुई देखकर अपने प्राणों की रक्षा में तत्पर वीतिहोत्र भय से आतुर होकर वहाँ से जीवन के परित्राण