भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 368

३७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करने के लिये शीघ्र ही चला गया था ।२६। अपनी अस्त्र की अग्नि से उस सम्पूर्ण नगरी को जलाकर तथा सब शत्रुओं का हनन करके उस समय में भार्गवेन्द्र राम समस्त लोकों का विनाश करते हुए साक्षात् अन्त कर देने वाले काल की ही भाँति हो गये थे ।२७। फिर अकृतव्रण के सहित और सहसाहु से समन्वित होकर अपने रथ के महान् घोष से सम्पूर्ण पृथ्वी को कम्पित करते हुए वहाँ से गये थे ।२८।

विनिघ्नन् क्षत्रियान्सर्वान् संशाम्य पृथिवीतले ।
महेंद्राद्रिं ययौ रामस्तपसे धृतमानसः ॥२६
तस्मिन्नष्टचतुष्कं च यावत्क्षत्रसमुद्गमम् ।
प्रत्येत्य भूयस्यद्धत्यै बद्धदीक्षो धृतव्रतः ॥३०
क्षत्रक्षेत्रेषु भूयश्च क्षत्रमुत्पादितं द्विजैः ।
निजघान पुनर्भू'मो राज्ञः शतसहस्रशः ॥३१
वर्षद्वयेन भूयोऽपि कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् ।
षट्चतुष्टयवर्षान्तं तपस्तेपे पुनश्च सः ॥३२
भूयोऽपि राजन् संबुद्ध' क्षत्रमुत्पादितं द्विजैः ।
जघान भूमौ निःशेषं साक्षात्काल इवांतकः ॥३३
कालेन तावता भूयः समुत्पन्नं नृपान्वयम् ।
निघ्नंश्चचार पृथिवीं वर्षद्वयमनारतम् ॥३४
अलं रामेण राजेंद्र स्मरता निधनं पितुः ।
त्रि सप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥३५

इस पृथ्वी तल पर क्षत्रियों का निहनन करते हुए पूर्णतया इस भूमि पर शान्ति स्थापित करके फिर भार्गव राम तपश्चर्या करने के लिये मन में निश्चय करके महेन्द्र पर्वत पर वहाँ से चले गये थे ।२६। उसमें जितना भी क्षत्रियों का समुद्रय था बारह थे उनके प्रति भी आकर फिर उनके हनन करने के वास्ते व्रत धारण करने वाले परशुराम बद्ध दीक्षा वाले हुए थे ।३०। और द्विजों ने क्षत्रियों के क्षेत्रों में फिर क्षत्रियों का उत्पादन कर दिया था। जब परशुरामजी को क्षत्रियों की उत्पत्ति का ज्ञान हुआ था कि अभी और भी क्षत्रिय समुत्पन्न हो गये हैं तो पुनः उन्होंने सैकड़ों और