संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अन्यथा कुछ भी नहीं होगा अर्थात् इसमें कुछ भी अन्तर न होगा ।२७। हे वत्स ! इस समस्त लोक में आज ही से आरम्भ करके आपसे अधिक बल- वान कोई भी नहीं होगा और न कोई आपसे अधिक तेज के धारण करने वाला तेजस्वी ही होगा ।२८।
वसिष्ठ उवाच- अथ कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य शिवं च नगनंदिनीम् । गोलोकं प्रययौ युक्तः श्रीदाम्ना चापि राधया ।।२६ अथ रामोऽपि धर्मात्मा भवानीं च भवं तथा । संपूज्य चाभिवाद्याथ प्रदक्षिणमुपाक्रमीत् ।।३० गणेशं कार्त्तिकेय च नत्वापृच्छद्य च भूपते । अकृतव्रणसंयुक्तो निश्चक्राम गृहांतरात् ।।३१ निष्क्रम्यमाणो रामस्तु नंदीश्वरमुखैर्गणैः । नमस्कृतो ययौ राजन्स्वगृहं परया मुदा ।।३२
वसिष्ठजी ने कहा—इसके अनन्तर भगवान श्रीकृष्ण शिव और नग- राज की पुत्री को अनुज्ञापित करके श्रीराधा और श्री दामा के साथ अपने गोलोक धाम को चले गये थे ।२६। इसके पश्चात् धर्मात्मा राम ने भी भग- वान शिव और जगदम्बा का भली-भाँति अर्चन करके और अभिवादन करके इसके अनन्तर उन्होंने प्रदक्षिणा करने का उपक्रम किया था ।३०। हे भूपते ! फिर राम ने गणेशजी और स्वामी कार्त्तिकेय की सेवा में प्रणिपात करके तथा उनसे पूछकर उस गृह के मध्य भाग से बाहिर निष्क्रमण किया था ।३१। हे राजन् ! जिस बेला में राम वहाँ से बाहर निकल कर जा रहे थे उस अवसर पर नन्दीश्वर प्रभृति शिव के मुख्य गणों के द्वारा उनको प्रणाम किया गया था और फिर वह राम बड़ी ही प्रसन्नता से अपने गृह को चले गये थे ।३२।
सगरोपाख्यान (१)
वसिष्ठ उवाच- राजन्नेवं भृगुविद्वानपश्यञ्जनपदान्बहून् । समाजगाम धर्मात्माऽकृतव्रणसमन्वितः ॥१॥