भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३५५

चिरंजीवी भवाशु त्वं प्रसादान्मम सुव्रत ॥२५ अथोवाच धराधीशः प्रसन्नस्तमुमापतिः । प्रणतं भार्गवेन्द्रं तु वरार्हं जगदीश्वरः ॥२६ शिव उवाच- रामभक्तोऽसि मे वत्स यस्ते दत्तो वरो मया । स भविष्यति कार्त्स्न्येन सत्यमुक्तं न चान्यथा ॥२७ अद्यप्रभृति लोकेऽस्मिन् भवतो वलवत्तरः । न कोऽपि भवताद्वत्स तेजस्वी च भवत्परः ॥२८

जो कोई पुरुष आपके शुभ नाम का उच्चारण करके जो भी कुछ कार्य का समारम्भ किया करता है उसका वह कार्य मेरे प्रसाद से निश्चित रूप से सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।२२। इसके उपरान्त भगवान भव (शिव) की वल्लभा भवानी देवी जो इस समस्त जगत को जन्म देने वाली माता हैं, बोली थीं । हे राम, हे वत्स ! मैं तुम से बहुत प्रसन्न हूँ, मुझे तुम यह बतला दो कि तुम्हारे लिए मैं क्या वरदान दे दूँ । हे महान भाग वाले ! उसी वरदान को जो तुमको अभिलाषित हो मुझे स्पष्ट बतलादो और इसमें सर्वथा भय मत करो तथा भय को तो एकदम बहुत दूर हटा दो । परशुराम जी ने कहा—मैं अपने सहस्रों जन्मों में भी जिन जिन देहों में गमन करके समुत्पन्न होऊँ ।२३। श्री राधा कृष्ण और भवानी-भव का अनन्य भक्त होऊँ यही वरदान आप मुझे प्रदान कीजिए । श्री राधा कृष्ण और भव-भवानी—इन दोनों युगलों का मैं कोई भेद भी नहीं देखूँ अर्थात् इनका एक ही स्वरूप मेरी दृष्टि में बना रहे ।२४। जगदम्बा पार्वतीजी ने कहा—हे महाभाग ! इसी प्रकार से होगा । तुम तो भगवान शंकर और श्रीकृष्ण-चन्द्र के परम भक्त हो । हे सुव्रत ! अर्थात् परम सुन्दर व्रत वाले ! मेरी कृपा के प्रसाद से तुम बहुत शीघ्र चिरकाल पर्यन्त जीवित रहने वाले हो जाओ ।२५। इसके पश्चात् इस वसुन्धरा के स्वामी भगवान उमापति परमाधिक प्रसन्न होकर उस राम से बोले और जगत के स्वामी ने जब देखा था कि वह भार्गवेन्द्र परशुराम उनके चरणों में प्रणत हो रहा है तथा वरदान प्राप्त करने का परम योग्य पात्र है तो उन्होंने कहा—।२६। भगवान शिव ने कहा—हे वत्स ! तुम मेरे राम के भक्त हो—यह वरदान मैंने तुमको दिया था । वह वरदान सम्पूर्णतया कहा हुआ सत्य ही होगा और इस वरमें