संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंसगरोपाख्यान (१) ] [ ३५७
निलिल्युः क्षत्रियाः सर्वे यत्र तत्र निरीक्ष्य तम् । व्रजंतं भार्गवं मार्गे प्राणरक्षणतत्पराः ॥२ अथाससाद राजेंद्र रामः स्वपितुराश्रमम् । शांतसत्त्वसमाकीर्णं वेदध्वनिनिनादितम् ॥३ यत्र सिंहा मृगा गावो नागमाञ्जारमूषकाः । समं चरंति संहृष्टा भयं त्यक्त्वा सुदूरतः ॥४ यत्र धूमं समीक्ष्यैव ह्यग्निहोत्रसमुद्भवम् । उन्नदंति मयूराश्च नृत्यंति च महीपते ॥५ यत्र सायंतने काले सूर्यस्याभिमुखं द्विजैः । जलांजलीन्प्रक्षिपद्भिः क्रियते भूर्जलाविला ॥६ यत्रांतेवासिभिर्नित्यं वेदाः शास्त्राणि संहिताः । अभ्यस्यंते मुदा युक्तैर्ब्रह्मचर्यव्रते स्थितैः ॥७
श्री वसिष्ठ महामुनि ने कहा— हे राजन् ! इस प्रकार से विद्वान् भृगु बहुत-से जन पदों का अवलोकन करते हुए वे धर्मात्मा राम अकृत व्रण से समन्वित होकर समागत हो गये थे ।१। मार्ग में जहाँ पर भी क्षत्रिय मिले थे वे सब उन परशुराम को देखकर छिप गये थे क्योंकि मार्ग में राम गमन करते हुए उन्हें दिखलाई पड़े थे और वे विचारे अपने प्राणों की रक्षा में परायण होकर इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे थे ।२। हे राजेन्द्र ! इसके पश्चात् परशुराम अपने पिता के आश्रम में पहुँच गए थे जो आश्रम परम शान्त जीवों से घिरा हुआ था और जिसमें वेद मन्त्रों की ध्वनि गूंज रही थी ।३। उस आश्रम में स्वभाव जनित वैर भाव भी नाम मात्र को भी नहीं था और परस्पर में निसर्ग शत्रु जीव भी जैसे सिंह और मृग तथा गौ-सर्प-मार्जार और मूषक भी सब मिले-जुले एक साथ सञ्चरण करते थे और अपने स्वाभाविक शत्रुओं का भी भय दूर करके त्याग दिया था ।४। हे महीपते ! जिस आश्रम में निरन्तर अग्नि होत्र के होते रहने से समुत्पन्न हुए धूम (धूँआ) को देखकर ही मेघावरण की भ्रान्ति से अर्थात् घने धूम के द्वारा समावृत अन्तरिक्ष को मेघाच्छन्न समझकर मयूर बहुत प्रसन्न हो रहे थे और अपने चित्रविचित्र पिच्छों को फैला कर नृत्य कर रहे थे जहाँ पर सायंकाल के समय में द्विजगण सूर्यदेव के सम्मुख में जल की अञ्जलियों