संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३६९
रामोऽपि रथमारुह्य सन्नद्धः सशरं धनुः । गृहीत्वापूरयच्छंखं रुद्रदत्तममित्रजित् ॥१३ ज्याघोषं च चकारोच्चै रोदसी कंपयन्निव । सहसाहोथ सारथ्यं चक्रे सारथिनां वरः ॥१४
माता रेणुका ने अपने पति के वियोग में विलाप करते हुए इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को पीटा था अतः परशुरामजी ने उसी समय में यह प्रतिज्ञा की थी कि मेरे पिता को क्षत्रिय जातीय नृप ने निहत किया है इसलिए मैं भी इक्कीस बार भूमण्डल को संहार करके क्षत्रियों से रहित कर दूँगा—माता के लिए की हुई इस प्रतिज्ञा को सत्यवादी दिया था। ८। ने समस्त क्षत्रियों के वध करने के लिये समुद्यत होकर हृदय में सुदृढ़ कर भार्गवेन्द्र ने ऐसा निश्चय कर लिया था कि क्षत्रियों के वंश में समुत्पन्न सबका निहनन करके उनके शरीरों के रुधिर से मैं अपने माता-पिता का तर्पण करूँगा ।९। अपने समस्त भाइयों से यह अपना समीहित सत्य संकल्प कहकर अपने पिताजी की संस्थित क्रिया को पूर्ण करके भाइयों की आज्ञा प्राप्त करके परशुराम चले गये थे ।१०। फिर अकृतव्रण को साथ में लेकर माहिष्मती नगरी में स्थित होकर उन्होंने महोदर (श्रीगणेश जी) का स्मरण किया था ।११। उन्होंने तुरन्त ही राम के लिए रथ-चाप आदि सभी आयुधों तथा अश्वों आदि को भेज दिया था ।१२। फिर परशुराम प्रभु भी उस रथ पर समारूढ़ होकर सन्नद्ध हो गये थे और शत्रुओं पर विजय पाने वाले ने शरके सहित धनुष का ग्रहण कर लिया था तथा भगवान रुद्र के द्वारा प्रदत्त शंख की ध्वनि करके उससे सम्पूर्ण भाग को पूरित कर दिया था ।१३। अपने धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से अन्तरिक्ष और भूमण्डल को प्रकम्पित करते हुए बड़ा ही उच्च घोष किया था । सारथियों में परम श्रेष्ठ सहसाहु ने उनके रथ का सारथि होने का कार्य ग्रहण किया था ।१४।
रथज्याशंखनादैस्तु वधात्पित्रोर्मषिणः । तस्याभून्नगरी सर्वा संक्षुब्धाश्च नरद्विपाः ॥१५ रामं त्वागतमाज्ञाय सर्वक्षत्रकुलांतकम् । संक्षुब्धाश्चक्रुरुद्योगं संग्रामाय नृपात्मजाः ॥१६ अथ पंचरथाः शूराः शूरसेनादयो नृप ।