भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३५३

करें। परम पूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण मेरे ऊपर करुणा से पसीजे हुए हृदय वाले मेरे ऊपर होवें जिसमे मैं सुकृती हो जाऊँ और आनन्द में लीन अन्तःकरण वाला बन जाऊँ ॥१०॥ वसिष्ठजी ने कहा—इस रीति से जमदग्नि महामुनि के पुत्र परशुराम ने भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की स्तुति करके फिर इसके पश्चात् वह विरत होकर चुप हो गए थे। वह सम्पूर्ण तत्वों के अर्थों का ज्ञाता एक सफलता प्राप्त होने वाले के ही समान परम प्रसन्न पुलकोद्गम वाला हो गया था ॥११॥ इसके अनन्तर कमलों के सदृश लोचनों वाले परम प्रसन्न आत्मा से युक्त होते हुए श्रीकृष्ण ने अपने आगे उपस्थित-भक्ति भावना से प्रणत तथा कृपा के पात्र भार्गव से कहा—॥१२॥ श्रीकृष्ण बोले—हे भार्गवेन्द्र ! तुम इस समय मेरे प्रसाद (पूर्ण प्रसन्नता) से सिद्ध हो गये हो। हे वत्स ! तुम आज से लेकर इस लोक में सबसे अधिक श्रेष्ठ हो गए हो ॥१३॥ पहिले समय में विष्णु महाश्रम में मैंने आपको वर दिया था। वह सब कुछ हे विभो ! क्रम से बहुत से वर्षों में पूर्ण होना चाहिए अर्थात् पूर्ण हो ही जायगा ॥१४॥

दया विधेया दीनेषु श्रेय उत्तममिच्छता ।
योगश्च साधनीयो वै शत्रूणां निग्रहस्तथा ॥१५
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिंस्तेजसा च बलेन च ।
ज्ञानेन यशसा वापि सर्वश्रेष्ठतमो भवान् ॥१६
अथ स्वगृहमासाद्य पित्रोः शुश्रूषणं कुरु ।
तपश्चर यथाकालं तेन सिद्धिः करस्थिता ॥१७
राधोत्संगात्समुत्थाप्य गणेशं राधिकेश्वरः ।
आलिंग्य गाढं रामेण मैत्रीं तस्य चकार ह ॥१८
अथोभावपि संप्रीतौ तदा रामगणेश्वरौ ।
कृष्णाज्ञया महाभागौ बभूवतुररिंदम ॥१९
एतस्मिन्नंतरे देवी राधा कृष्णप्रिया सती ।
उभाभ्यां च वरं प्रादात्प्रसन्नास्या मुदान्विता ॥२०
राधोवाच—सर्वस्य जगतो वंद्यौ दुराधर्षौ प्रियावहौ ।
मद्भक्तौ च विशेषेण भवंतौ भवतां सुतौ ॥२१

अब मेरा तुम्हारे लिए यह उपदेश है कि परम श्रेय की अभिलाषा रखने वाले आपको जो विचारे दीन प्राणी हैं उन पर दया करनी चाहिए। और तुमको योग की साधना करनी चाहिए तथा अपने शत्रुओं का निग्रह