संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पायाद्यः स चराचरस्य जगतो व्यापी विभुः सच्चिदा-
नंदाब्धिः प्रकटस्थितो विलसति प्रेमांधया राधया ।
कृष्णः पूर्णतमो ममोपरि दयाक्लिन्नांतरः स्यात्सदा
येनाहं सुकृती भवामि च भवाम्यानंदलीनांतरः ॥१०
वसिष्ठ उवाच-
स्तुत्वैवं जामदग्न्यस्तु विरराम ह तत्परम् ।
विज्ञाताखिलतत्त्वार्थो हृष्टरोमा कृतार्थवत् ॥११
अथोवाच प्रसन्नात्मा कृष्णः कमललोचनः ।
भार्गवं प्रणतं भक्त्या कृपापात्रं पुरःस्थितम् ॥१२
कृष्ण उवाच-
सिद्धोऽसि भार्गवेंद्र त्वं प्रसादान्मम सांप्रतम् ।
अद्य प्रभृति वत्सास्मिँल्लोके श्रेष्ठतमो भव ॥१३
तुभ्यं वरो मया दत्तः पुरा विष्णुपदाश्रमे ।
तत्सर्वं क्रमतो भाव्यं समा बह्वीस्त्वया विभो ॥१४
जो श्री राधा इस जगत् के लय-उद्भव और स्थिति काल में भी जनों के द्वारा समाराधित होती हैं-स्वामी के मुख से विगलित प्रेमरूपी अमृत के रसास्वाद का शब्द से ज्ञान कराती हैं-जो रास लीला की स्वामिनी हैं-रसिकों की ईश्वरी है अपने रमण कराने वाले के हृदय में निष्ठा वाली तथा अपने आपको आनन्द पाने वाली वह नेत्री अर्थात् गोपीगणाधीश्वरी जिनका शुभ नाम श्री राधा कीर्तित किया जाया करता है वह अवनत मेरी की रक्षा करें ।८। जिसके गर्भ से अति विराट् स्वरूप का उद्भव हुआ था और जिसका वह विराट् स्वरूप एक अंशभूत ही था-जिसकी नाभि से समुत्पन्न कमल से समुत्पन्न हुए विधाता ने जिसको एकान्त में उपदेश दिया गया था-इस स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण विश्व की रचना की है और जिसके रोमों में ये समस्त ब्रह्माण्ड शोभित हो रहे हैं उस पूर्ण परमेश्वर को जन्म देने वाली जननी मेरे ऊपर निरन्तर प्रसन्न होवे ।९। जो इस चराचर जगत् में व्यापक विभु है और जो सत्-चित् और आनन्द का सागर प्रकट स्वरूप में स्थित होकर प्रेमान्ध श्रीराधा के साथ शोभा प्राप्त करता है वह मेरी रक्षा