संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शुभ कार्य के करने के समय में तथा सङ्कट के आ पड़ने पर और किसी भी कामना से युक्त कार्य की सिद्धि के लिए जो भी कोई इन गजानन प्रभु का पूजन करेगा उस पुरुष के समस्त कार्य अवश्यमेव सिद्ध हो जाया करते हैं— इनमें कुछ भी संशय नहीं है ।४३-४४। श्री वसिष्ठजी ने कहा—परम शुभ मुख वाली जगतों की स्वामिनी पार्वती श्रीकृष्ण महान् आत्मा वाले प्रभु के द्वारा इस प्रकार से कहे हुए वचन का श्रवण करके अत्यन्त विस्मित हो गयी थीं ।४५। जब भगवान् शिव की सन्निधि में पार्वतीजी ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था उस समय में सनातनी शिव के स्वरूप वाली राधा जी ने देवी से कहा था ।४६। श्री राधाजी ने कहा—जिस रीति से इस प्रपञ्च में पुरुष और प्रकृति दोनों परस्पर में एक दूसरे के आश्रम में विग्रहों (स्वरूपों) को रखने वाले हैं और दो रूपों में भिन्न प्रकाशित हुआ करते हैं उसी रीति से हे देवि ! तुम और मैं दोनों में दो रूप तो हैं किन्तु वस्तुत कोई भी भेद नहीं है । तुम विष्णु और मैं ही शिव हूँ और द्विगुणता को प्राप्त हुआ है ।४७-४८। भगवान् शिव के हृदय में विष्णु आपके रूप में समास्थित हैं और मेरे रूप में समास्थित होकर भगवान् विष्णु के हृदय में शिव है ।४६।
एष रामो महाभागे वैष्णवः शैवतां गतः । गणेशोऽयं शिवः साक्षाद्वैष्णवत्वं समास्थितः ॥५० एतयोरावयोः प्रभ्वोश्चापि भेदो न दृश्यते । एवमुक्त्वा तु सा राधा क्रोडे कृत्वा गजाननम् ॥५१ मूर्द्धन्यु पाघ्राय पस्पर्श स्वहस्तेन कपोलके । स्पृष्टमात्रे कपोले तु क्षतं पूर्त्तिमुदागतम् ॥५२ पार्वतीसुप्रसन्नाभूदनुनीताऽथ राधया । पादयोः पतितं राममुत्थाप्य निजपाणिना ॥५३ क्रोडीचकार सुप्रीता मूर्द्धन्यु पाघ्राय पार्वती । एवं तयोस्तु सत्कारं दृष्ट्वा रामगणेशयोः ॥५४ कृष्णः स्कन्दमुपाकृष्य स्वांके प्रेम्णा न्यवेशयत् । अथ शम्भुरपि प्रीतः श्रीदामानमुपस्थितम् ॥५५ स्वोत्संगे स्थापयामास प्रेम्णा सत्कृत्य मानदः ॥५६