भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४७

दाँत टूटकर गिर गया है। इसीलिये इतने इसको एकदन्त कर दिया है ।३६। हे हर ! वल्लभे ! इसके अनन्तर यह ब्रह्मा के पर्याय में होंगे। कुठार के ही प्रहार से इनका मुख कुछ वक्र सा हो गया है तभी से बुधों के द्वारा इनको वक्रतुण्ड कहा गया है ।४०। हे पार्वति ! इसी भाँति से आपके इस पुत्र (गणेश) के अनेक नाम हैं। जिनका तीनों कालों में अर्थात् प्रातः- मध्याह्न और सायंकाल में स्मरण करने वाले होते हैं ।४१। इस त्रयोदशी कल्प से पूर्व कदम्बीभव में मैंने ही इनको यह वरदान दे दिया था कि समस्त देवों के पूजन के पहिले इन्हीं का सर्वप्रथम पूजन हुआ करेगा ।४२।

जातकमादिसंस्कारे गर्भाधानादिकेऽपि च । यात्रायां च वणिज्यादौ युद्धे देवार्चने शुभे ॥४३ संकष्टे काम्यसिद्ध्यर्थं पूजयेद्यो गजाननम् । तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्ध्यंत्येव न संशयः ॥४४ वसिष्ठ उवाच- इत्युक्तं तु समाकर्ण्य कृष्णेन सुमहात्मना । पार्वती जगतां नाथा विस्मिताऽसीच्छुभानना ॥४५ यदा नैवोत्तरं प्रादात्पार्वती शिवसन्निधौ । तदा राधाऽब्रवीद्दे वीं शिवरूपा सनातनी ॥४६ श्री राधोवाच- प्रकृतिः पुरुषश्चोभावप्योन्याश्रयविग्रहौ । द्विधा भिन्नौ प्रकाशेते प्रपंचेस्मिन् यथा तथा ॥४७ त्वं चाहमावयोर्र्देवि भेदो नैवास्ति कश्चन । विष्णुस्त्वमहमेवास्मि शिवो द्विगुणतां गतः ॥४८ शिवस्य हृदये विष्णुर्भवत्या रूपमास्थितः । मम रूपं समास्थाय विष्णोश्च हृदये शिवः ॥४९

जातकर्म आदि षोडश संस्कारों के कराने के समय में तथा गर्म के आधान आदि कर्मों में—यात्रा के करने के समय में वाणिज्य आदि व्यसार्यों के करने के काल में—संग्राम के आरम्भ करने के समय में एवं किसी भी