भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

था और फिर उसको संयोजित किया था जो कि एक गज के शिर से ही जोड़ दिया गया था । हे देवि ! इसीलिए यह गजानन नाम वाले हैं ।३५।

चतुर्थ्यामुदितश्चन्द्रो दम्भिणा शप्त आतुरः । अनेन विधृतो भाले भालचन्द्रस्ततः स्मृतः ॥३६ शप्तः पुरा सप्तभिस्तु मुनिभिः संक्षयं गतः । जातवेदा दीपितोऽभूद्येनासौ शूर्पकर्णकः ॥३७ पुरा देवासुरे युद्धे पूजितो दिविषद्गणैः । विघ्नं निवारयामास विघ्ननाशस्ततः स्मृतः ॥३८ अद्यायं देवि रामेण कुठारेण निपात्य च । दशनं दैवतो भद्रे ह्येकदंतः कृतोऽमुना ॥३९ भविष्यत्यथ पर्याये ब्रह्मणो हरवल्लभे । वक्रीभविष्यत्तुण्डत्वाद्वक्रतुण्डः स्मृतोः बुधैः ॥४० एवं तवास्य पुत्रस्य संति नामानि पार्वति । स्मरणात्पापहारीणि त्रिकालानुगतान्यपि ॥४१ अस्मात्त्रयोदशीकल्पात्पूर्वस्मिन्दशमीभवे । मयास्मै तु वरो दत्तः सर्वदेवाग्रपूजने ॥४२

चतुर्थी तिथि में चन्द्रमा उदित हुआ था और दम्भी के द्वारा इसको शाप दे दिया गया था तब यह अत्यन्त आतुर हो गया था । उस समय में इन्हीं गणेश ने इसको अपने भाल में धारण कर लिया था । तभी से इसका नाम भाल चन्द्र कहा गया है ।३६। प्राचीन काल में पहिले सात मुनियों ने एक बार इसको शाप दे दिया था । इसी कारण से यह क्षीणता को प्राप्त हो गया था । इनके द्वारा एक बार जातवेदा (अग्नि) दीपित किया गया था । इसी कारण से तभी से इनका शूर्पकर्णक नाम हो गया था ।३७। पहिले समय में देवों और असुरों का महान् भीषण देवासुर संग्राम हुआ था उसमें देवगणों के द्वारा इनकी बड़ी अर्चना हुई थी । उससे परम प्रसन्न होकर इन्होंने सभी विघ्नों का निवारण कर दिया था । फिर तभी से इनका विघ्न नाश—यह शुभ नाम पड़ गया था ।३८। हे देवि ! आज परशुराम के द्वारा इसके ऊपर अपने कुठार का प्रहार किया गया है हे भद्रे ! इससे दैववशात् इनका एक