संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अविदिततनुनामाऽनोष्टवस्त्वेकधामाऽभवदथ भव- भामा पातु मां पूर्णकामा ॥३
प्रकटितगुणमानं कालसंख्याविधानं सकलभवनिदानं कीर्त्यते यत्प्रधानम् । तदिह निखिलतातः संबभूवोक्षपातः कृतकृतकनिपातः पातु मामद्य मातः ॥४
दनुजकुलविनाशी लेखपाताविनाशी प्रथम- कुलविकाशी सर्वविद्याप्रकाशी । प्रसभरचितकाशी भक्तदत्ताखिलाशीरवतु विजितपाशी मां सदा षण्मुखाशी ॥५
हरनिकटनिवासी कृष्णसेवाविलासी प्रणतजनविभासी गोपकन्याप्रहासी । हरकृतबहुमानो गोपिकेशैकतानो विदितबहुविधानो जायतां कीर्तिहा नो ॥६
प्रभुनियतमना यो नुन्नभक्तांतरायो हृतदुरितनिकायो ज्ञानदातापरायोः । सकलगुणगरिष्ठो राधिकांके निविष्टो मम कृतमपराधं क्षंतुमर्हत्यगाधम् ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—हे भूपते ! इस रीति से उन सबके परमा- धिक स्नेह से युक्त चित्त वाले हो जाने पर समवस्थित हुए देखा था तो परशुराम भवानी की गोद से उतर कर दोनों हाथों को जोड़कर पूर्णतया प्रणत हो गये थे ।१। फिर परम प्रयत्नशील होकर विशेषता से रहित की भी विशेष की भाँति स्तुति की थी । आप द्वैत से रहित होते हुए भी अर्थात् एक ही स्वरूप वाले होकर भी इस समय में द्वैत भाव को प्राप्त हो रहे हैं अर्थात् दो स्वरूपों में दर्शन दे रहे हैं । वास्तव में आप गुणों से रहित हैं तो भी अब सगुण स्वरूप से संयुत हैं ।२। परशुराम ने कहा—यह सम्पूर्ण विश्व प्रकृति के विकारों से ही समुत्पन्न हुआ है । इसकी रचना करने के लिए जो