संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर विनाश वर्णन ] [ २७
आदेश दिया था। इस अश्व को इस पृथ्वी तल में चारों ओर चारण कराने को गमन करो। ३८। फिर हे पुत्रो ! शीघ्र ही आप लोग घुमाकर इस अश्व को फिर मेरे पास ले आओ। जैमिनि मुनि ने कहा—इसके अनन्तर उन पुत्रों ने अपने पिताश्री की आज्ञा से उस अश्व को वहाँ से अपने साथ में ले लिया था। ३९। उन्होंने उस अश्व को समस्त पृथिवी तल में चारों ओर घुमाया था। विधि की प्रेरणा से ही वह अश्व भूमि में परिवर्तित हो गया था। ४०। उस राजा ने अश्व को दिग्विजय करने के लिये तथा करों का आदान करने के लिये तो छोड़ा ही नहीं था क्योंकि समस्त नृपों को तो नृप सगर ने पहिले ही जीत लिया था। ४१। उदार वीर्य वाले सगर ने सभी नृपों को समर में कर देने वाले बना लिया था। इसके पश्चात् जब वह अश्व दिखाई नहीं दिया था तो फिर उन समस्त राजपुत्रों ने जल से रहित क्षार सागर के पास गमन किया था। ४२। उस अश्व को परिवारित करके उन सबने भूतल के अन्दर प्रसन्न होकर प्रवेश किया था। ४३।
सगर विनाश वर्णन
जैमिनिरुवाच-
तेषु तत्र निविष्टेषु वासवेन प्रचोदितः।
जहार तुरगं वायुस्तत्क्षणेन रसातलम् ॥१॥
अदृष्टमश्वं तैः सर्वैरपहृत्य सदागतिः।
आनयत्तत्पथा राजन्कपिलस्यांतिकं मुनेः ॥२॥
ततः समाकुलाः सर्वे विनष्टेऽश्वे नृपात्मजाः।
परीत्य वसुधां सर्वां प्रमार्गतस्तुरंगमम् ॥३॥
विचित्य पृथिवीं ते तु स पुराचलकाननाम्।
अपश्यंतो यज्ञपशुं दुःखं महदवाप्नुवन् ॥४॥
ततोऽयोध्यां समासाद्य ऋषिभिः परिवारिताम्।
दृष्ट्वा प्रणम्य पितरं तस्मै सर्वं न्यवेदयन् ॥५॥
परीत्य पृथ्वीमस्माभिर्निविष्टे वरुणालये।
रक्ष्यमाणोऽपि पश्यद्भिः केनापि तुरगो हृतः ॥६॥