संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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फिर उन मुनीश्वर को प्रणाम करके परम समाश्वस्त होकर उन सबने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था। इसी बीच में पृथिवी के स्वामी राजा सगर ने एक महान् यज्ञ करने का विचार मन में किया था ।३५।
वाजिमेधं महायज्ञं कर्तुं चक्रे मनोरथम् ।
आहृत्य सर्वसंभारान्वसिष्ठानुमते तदा ॥३६
और्वाद्यैः सहितो विप्रैर्यथावद्दीक्षितोऽभवत् ।
दीक्षां प्रविष्टो नृपतिर्हयंसंचारणाय वै ॥३७
पुत्रान्सर्वान्समाहूय संदिदेश महयशाः ।
संचारयित्वा तुरगं परीत्य पृथिवीतले ॥३८
क्षिप्रं ममांतिकं पुत्राः पुनराहतुंमर्हथ ।
जैमिनिरुवाच-
ततस्ते पितुरादेशात्तमादाय तुरंगमम् ॥३९
परिचक्रमयामासुः सकले क्षितिमंडले ।
विधिचोदनयैवाश्वः स भूमौ परिवर्तितः ॥४०
न तु दिग्विजयार्थाय करादानार्थमेव च ।
पृथिवीभूभुजा तेन पूर्वमेव विनिर्जिता ॥४१
नृपाश्चोदारवीर्येण करदाः समरे कृताः ।
ततस्ते राजतनया निस्तोये लवणांबुधौ ॥४२
भूतले विविशुहृष्टाः परिवार्य तुरंगमम् ॥४३
उस समय में वसिष्ठ मुनि की अनुमति से सगर नृपति ने अश्वमेध नामक एक महान् यज्ञ के करने का मन में मनोरथ किया था और उस यज्ञ कार्य के सम्पादन करने के लिये सभी सम्भारों का समाहरण किया गया था ।३६। उस समय में और्व आदि जो विप्र थे उनके द्वारा राजा विधि-विधान के साथ दीक्षित हुआ था। जब राजा ने दीक्षा लेकर यज्ञ का समाचरण करने के लिये दीक्षा में प्रविष्ट हो गया था तो उसमें जो अश्व छोड़ा जाता है उसके भली भाँति चारण करने के लिये नियुक्ति की थी ।३७। महा यशस्वी सगर ने उन सब सहस्त्र पुत्रों को अपने समीप में बुलाकर उनको