संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअश्वमोचन वर्णन ] [ २५
स्वकर्मणेव निर्दग्धाः प्रविनाङ्क्ष्यंति सागराः ॥२६ काले प्राप्ते तु युष्माभिः स तावत्परिपाल्यताम् । अहं तु कारणं तेषां विनाशाय दुरात्मनाम् ॥३० भविष्यामि सुरश्रेष्ठा भवतामर्थसिद्धये । मम क्रोधाग्निविप्लुष्टाः सागराः पापचेतसः ॥३१ भविष्यंतु चिरेणैव कालोपहतबुद्धयः । तस्माद्गतज्वरा देवा लोकाश्चैवाकुतोभयाः ॥३२ भवंतु ते दुराचाराः क्षिप्रं यास्यंति संक्षयम् । तद्ययं निर्भया भूत्वा व्रजध्वं स्वां पुरीं प्रति ॥३३ कालं कंचित्प्रतीक्षध्वं ततोऽभीष्टमवाप्स्यथ । कपिलेनैवमुक्तास्ते देवाः सर्वे सवासवाः ॥३४ तं प्रणम्य ततो जग्मुः प्रतीतास्त्रिदिवं प्रति । एतस्मिन्नंतरे राजा सगरः पृथिवीपतिः ॥३५
फिर उन सबका अवलोकन करके कपिल भगवान ने यह परम मुनृत वचन कहा था । ये सगर के पुत्र सब अपने ही कर्म से निर्दग्ध होकर विनष्ट होकर विनष्ट हो जायेंगे ।२६। जब भी इनके विनाश का काल प्राप्त होगा तभी नाश होगा । तब तक उस काल की आप सब लोग प्रतीक्षा कीजिए । और मैं तो उन दुष्ट आत्मा वालों के विनाश करने का कारण बनूँगा ।३० हे सुरश्रेष्ठो ! आप लोगों के अर्थ की सिद्धि के लिए केवल मैं कारण स्वरूप बनूँगा । महापापी ये सगर के पुत्र मेरे क्रोध की अग्नि से विप्लुष्ट होकर भस्मीभूत हो जायेंगे ।३१। ऐसा ही काल होगा कि इन सबकी बुद्धि उपहत हो जायगी और चिरकाल में इनका विनाश होगा । इसलिए सभी देवों का दुःख दूर हो जायगा और सभी लोक सभी ओर से भयहीन हो जायेंगे ।३२। वे सभी बुरे आचरण वाले हो जायेंगे । इसलिए अब आप लोग सब निर्भय होकर अपनी पुरी की ओर गमन कीजिए ।३३। आप लोगों को कुछ काल की प्रतीक्षा अवश्य ही करनी होगी । तभी आप अपने अभीप्सित की प्राप्ति करेंगे । जब इस प्रकार से कपिल मुनि के द्वारा देवगणों से कहा गया था तो इन्द्र के सहित सब देवों ने उनका अभिवादन किया था ।३४।