संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 437, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
त्वं नो धाता विधाता च त्वं गुरुस्त्वं परायणम्।
परित्राता त्वमस्माकं विनिवर्त्तय चापदम् ॥२५
शरणं भव विप्रेन्द्र विप्राणां विशेषतः।
सागरैर्दह्यमानानां लोकत्रयनिवासिनाम् ॥२६
ननु वै सात्विकी चेष्टा भवतीह भवादृशाम्।
त्रातुमर्हसि तस्मात्त्वं लोकानस्मांश्च सुव्रत ॥२७
न चेदकाले भगवन्विनंक्ष्यत्यखिलं जगत्।
जैमिनिरुवाच—
इत्युक्तः सकलैर्देवैरुन्मील्य नयने शनैः ॥२८
आप तो समस्त लोकों की स्थिति और संहार के कारण हैं। आप तो भगवान् विष्णु के अंश से ही अवतीर्ण हुए हैं और इस भूमण्डल में योगीन्द्र के स्वरूप को धारण करके समवस्थित हैं।२२। आप कोई महान् श्रेष्ठ तपस्वी ही नहीं हैं। आपने तो अपने इस देह को अपनी ही इच्छा से धारण किया है और यह भी केवल तीनों तापों से अत्यधिक आर्त्त पुरुषों की आर्त्ति पुरुषों की आर्ति के ही विनाश के लिए धारण किया है।२३। हे ब्रह्मन्! आप तो ऐसे अद्भुत शक्तिशाली हैं कि अपने मन से ही इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन, संस्थिति और संहार अपनी इच्छा के अनुसार बिना किसी संशय के कर सकते है।२४। आप तो हमारे धाता और विधाता हैं तथा आप गुरु हैं और परायण हैं। आप हमारा परित्राण भी करने वाले हैं। अब आप हमारी इस वर्त्तमान आपदा को दूर भगाइए। ।२५। हे विप्रेन्द्र! आप हमारे रक्षक होइए और विशेष रूप से हम विप्रों की रक्षा करने वाले होइए। हम तीनों लोकों में निवासी सगर के पुत्रों के द्वारा दह्यमान हो रहे हैं।२६। हे सुव्रत! इस लोक में आप जैसे महापुरुषों की सात्विकी चेष्टा हुआ करती है। इसलिए आप समस्त लोकों की और हमारी रक्षा करने के योग्य हैं।२७। हे भगवान्! यदि आप ही हम सबकी रक्षा नहीं करेंगे तो यह सम्पूर्ण जगत् अकाल में ही विनष्ट हो जायगा। जैमिनि मुनि ने कहा—जब इस प्रकार से सब देवगणों ने अभ्यर्थना की थी तो कपिल मुनि ने धीरे से अपने दोनों नेत्रों को खोला था।२८।
विलोक्य तानुवाचेदं कपिलः सूनृतं वचः।