भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अश्वमोचन वर्णन ] [ २३

देवा ऊचुः- प्रसीद नो मुनिश्रेष्ठ वयं त्वां शरणं गताः । उपद्रुतं जगत्सर्वं सागरैः संप्रणश्यति ॥२१

जयशीलों में श्रेष्ठ भगवान् कपिल मुनि भगवान विष्णु के ही अंश से इस जगत के हित के लिए समतीर्ण हुए है। यह विष्णु भगवान का ही अंशावतार है और भूमण्डल में योगीन्द्रों में परम श्रेष्ठ हैं ।१५। अगस्त्य मुनि के द्वारा इस विशाल सागर का जल पी लेने पर दिव्य सौ वर्षों की अवधि हो गयी है वे इसी अम्भोधि में वहां पर किसी स्थल में इस समय में इस समय में ध्यान करने वाले स्थित हैं ।१६। मेरा यह आदेश है कि आप लोग मुनियों में परम श्रेष्ठ कपिलजी के समीप में चले जाओ। जब उनकी ध्यानावस्था का अन्त होवे तब तक इच्छा रखने वाले आप लोग वहीं उप-गह्वर में संस्थित रहें ।१७। जब उनकी समाधि समाप्त हो जावे तभी आप अपना अभिप्राय पूर्ण रूप से नमस्कार करके उनको बतला देवें । वही ऐसे शक्तिशाली हैं कि वे आप लोगों का कल्याण कर देंगे ।१८। हे देवगणो ! जिस भी रीति से उन मुनिवर की समाधि का भङ्ग सगर के पुत्रों द्वारा किया हुआ होवे आप लोगों को वैसी ही प्रवृत्ति करनी चाहिए। इसी से आप का कार्य सुसम्पन्न हो जायगा ।१९। जैमिनि मुनि ने कहा—पितामह के द्वारा जब देवगणों से इस तरह से कहा था तो वे सब पितामह को प्रणाम करके उन देवों में श्रेष्ठ मुनिवर के समीप में चले गये थे और हाथ जोड़कर उन्होंने उनसे कहा था ।२०। देवों ने कहा—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइए। हम लोग आपकी शरणागति में प्राप्त हुए हैं । राजा सगर के पुत्रों ने जगत् में बड़ा उपद्रव मचा दिया है और ऐसा हो गया है कि यह सम्पूर्ण जगत् विनष्ट ही हो जायगा ।२१।

त्वं किलाखिललोकानां स्थितिसंहारकारणः । विष्णोरंशेन योगींद्रस्वरूपो भुवि संस्थितः ॥२२ पुंसां तापत्रयार्त्तानामार्तिनाशाय केवलम् । स्वेच्छया ते धृतो देहो न तु त्वं तपतां वरः ।२३ ममसेव जगत्सर्वं स्रष्टुं संहर्तुमेव च । विधातुं स्वेच्छया ब्रह्मन्भवाञ्छक्नोत्यसंशयम् ॥२४