भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

न्याय के अनुरूप उन्होंने ब्रह्माजी से निवेदन किया था कि सगर नृप के पुत्रों की भूमि पर कैसी कुचेष्टायें हो रही हैं ।१०। सब लोकों के पितामह ब्रह्माजी उनके कहे वचनों कर श्रवण करके एक क्षण के अन्दर विचार वाले हुए थे और इसके पश्चात् सुरों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने उनसे कहा—।११। हे देवगणों ! आप सबका कल्याण होवे । अब आप लोग सावधान होकर मेरी वाणी का श्रवण कीजिए जो भी कुछ मैं आपके सामने इस समय में कह रहा हूँ—ये सगर के पुत्र सबके सब विनष्ट हो जायेंगे—यह सर्वथा सत्य है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१२। कुछ काल पर्यन्त प्रतीक्षा करो। समय के ही द्वारा सब नियमित हो जाया करता है । यह काल बड़ा बलवान है । अन्य तो केवल निमित्त ही हुआ करते हैं करने वाला तो वास्तव में काल ही होता है । यह ही सबको खाने वाला होता है। इसके सामने सब बल-वैभव और प्रताप धूल में मिल जाया करते हैं ।१३। हे सुरश्रेष्ठो ! मैं आप सभी के हित-सम्पादन होने के लिए जो भी कुछ कहूँगा वही अब आप सब को अतन्द्रित होकर कर डालना चाहिए ।१४।

विष्णोरंशेन भगवान्कपिलो जयतां वरः । जातो जगद्धितार्थाय योगीन्द्रप्रवरो भुवि ॥१५॥

अगस्त्यपीतसलिले दिव्यवर्षशतावधि । ध्यायन्नास्तेऽधुनाऽम्भोधावेकांते तत्र कुत्रचित् ॥१६॥

गत्वा यूयं ममादेशात्कपिलं मुनिपुंगवम् । ध्यानावसानमिच्छंतस्तिष्ठध्वं तदुपह्वरे ॥१७॥

समाधिविरतौ तस्य स्वाभिप्रायमशेषतः । नत्वा तस्मै वदिष्यध्वं स वः श्रेयो विधास्यति ॥१८॥

समाधिभंगश्च मुनेर्यथा स्यात्सागरैः कृतः । कुरुध्वं च तथा यूयं प्रवृत्तिं विबुधोत्तमाः ॥१९॥

जैमिनिरुवाच— इत्युक्तास्तेन विबुधास्तं प्रणम्य पितामहम् । गत्वा तं विबुधश्रेष्ठं ते कृतांजलयोऽब्रुवन् ॥२०॥