संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
न्याय के अनुरूप उन्होंने ब्रह्माजी से निवेदन किया था कि सगर नृप के पुत्रों की भूमि पर कैसी कुचेष्टायें हो रही हैं ।१०। सब लोकों के पितामह ब्रह्माजी उनके कहे वचनों कर श्रवण करके एक क्षण के अन्दर विचार वाले हुए थे और इसके पश्चात् सुरों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने उनसे कहा—।११। हे देवगणों ! आप सबका कल्याण होवे । अब आप लोग सावधान होकर मेरी वाणी का श्रवण कीजिए जो भी कुछ मैं आपके सामने इस समय में कह रहा हूँ—ये सगर के पुत्र सबके सब विनष्ट हो जायेंगे—यह सर्वथा सत्य है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१२। कुछ काल पर्यन्त प्रतीक्षा करो। समय के ही द्वारा सब नियमित हो जाया करता है । यह काल बड़ा बलवान है । अन्य तो केवल निमित्त ही हुआ करते हैं करने वाला तो वास्तव में काल ही होता है । यह ही सबको खाने वाला होता है। इसके सामने सब बल-वैभव और प्रताप धूल में मिल जाया करते हैं ।१३। हे सुरश्रेष्ठो ! मैं आप सभी के हित-सम्पादन होने के लिए जो भी कुछ कहूँगा वही अब आप सब को अतन्द्रित होकर कर डालना चाहिए ।१४।
विष्णोरंशेन भगवान्कपिलो जयतां वरः । जातो जगद्धितार्थाय योगीन्द्रप्रवरो भुवि ॥१५॥
अगस्त्यपीतसलिले दिव्यवर्षशतावधि । ध्यायन्नास्तेऽधुनाऽम्भोधावेकांते तत्र कुत्रचित् ॥१६॥
गत्वा यूयं ममादेशात्कपिलं मुनिपुंगवम् । ध्यानावसानमिच्छंतस्तिष्ठध्वं तदुपह्वरे ॥१७॥
समाधिविरतौ तस्य स्वाभिप्रायमशेषतः । नत्वा तस्मै वदिष्यध्वं स वः श्रेयो विधास्यति ॥१८॥
समाधिभंगश्च मुनेर्यथा स्यात्सागरैः कृतः । कुरुध्वं च तथा यूयं प्रवृत्तिं विबुधोत्तमाः ॥१९॥
जैमिनिरुवाच— इत्युक्तास्तेन विबुधास्तं प्रणम्य पितामहम् । गत्वा तं विबुधश्रेष्ठं ते कृतांजलयोऽब्रुवन् ॥२०॥
अश्वमोचन वर्णन ] [ २३
देवा ऊचुः- प्रसीद नो मुनिश्रेष्ठ वयं त्वां शरणं गताः । उपद्रुतं जगत्सर्वं सागरैः संप्रणश्यति ॥२१
जयशीलों में श्रेष्ठ भगवान् कपिल मुनि भगवान विष्णु के ही अंश से इस जगत के हित के लिए समतीर्ण हुए है। यह विष्णु भगवान का ही अंशावतार है और भूमण्डल में योगीन्द्रों में परम श्रेष्ठ हैं ।१५। अगस्त्य मुनि के द्वारा इस विशाल सागर का जल पी लेने पर दिव्य सौ वर्षों की अवधि हो गयी है वे इसी अम्भोधि में वहां पर किसी स्थल में इस समय में इस समय में ध्यान करने वाले स्थित हैं ।१६। मेरा यह आदेश है कि आप लोग मुनियों में परम श्रेष्ठ कपिलजी के समीप में चले जाओ। जब उनकी ध्यानावस्था का अन्त होवे तब तक इच्छा रखने वाले आप लोग वहीं उप-गह्वर में संस्थित रहें ।१७। जब उनकी समाधि समाप्त हो जावे तभी आप अपना अभिप्राय पूर्ण रूप से नमस्कार करके उनको बतला देवें । वही ऐसे शक्तिशाली हैं कि वे आप लोगों का कल्याण कर देंगे ।१८। हे देवगणो ! जिस भी रीति से उन मुनिवर की समाधि का भङ्ग सगर के पुत्रों द्वारा किया हुआ होवे आप लोगों को वैसी ही प्रवृत्ति करनी चाहिए। इसी से आप का कार्य सुसम्पन्न हो जायगा ।१९। जैमिनि मुनि ने कहा—पितामह के द्वारा जब देवगणों से इस तरह से कहा था तो वे सब पितामह को प्रणाम करके उन देवों में श्रेष्ठ मुनिवर के समीप में चले गये थे और हाथ जोड़कर उन्होंने उनसे कहा था ।२०। देवों ने कहा—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइए। हम लोग आपकी शरणागति में प्राप्त हुए हैं । राजा सगर के पुत्रों ने जगत् में बड़ा उपद्रव मचा दिया है और ऐसा हो गया है कि यह सम्पूर्ण जगत् विनष्ट ही हो जायगा ।२१।
त्वं किलाखिललोकानां स्थितिसंहारकारणः । विष्णोरंशेन योगींद्रस्वरूपो भुवि संस्थितः ॥२२ पुंसां तापत्रयार्त्तानामार्तिनाशाय केवलम् । स्वेच्छया ते धृतो देहो न तु त्वं तपतां वरः ।२३ ममसेव जगत्सर्वं स्रष्टुं संहर्तुमेव च । विधातुं स्वेच्छया ब्रह्मन्भवाञ्छक्नोत्यसंशयम् ॥२४
२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
त्वं नो धाता विधाता च त्वं गुरुस्त्वं परायणम्।
परित्राता त्वमस्माकं विनिवर्त्तय चापदम् ॥२५
शरणं भव विप्रेन्द्र विप्राणां विशेषतः।
सागरैर्दह्यमानानां लोकत्रयनिवासिनाम् ॥२६
ननु वै सात्विकी चेष्टा भवतीह भवादृशाम्।
त्रातुमर्हसि तस्मात्त्वं लोकानस्मांश्च सुव्रत ॥२७
न चेदकाले भगवन्विनंक्ष्यत्यखिलं जगत्।
जैमिनिरुवाच—
इत्युक्तः सकलैर्देवैरुन्मील्य नयने शनैः ॥२८
आप तो समस्त लोकों की स्थिति और संहार के कारण हैं। आप तो भगवान् विष्णु के अंश से ही अवतीर्ण हुए हैं और इस भूमण्डल में योगीन्द्र के स्वरूप को धारण करके समवस्थित हैं।२२। आप कोई महान् श्रेष्ठ तपस्वी ही नहीं हैं। आपने तो अपने इस देह को अपनी ही इच्छा से धारण किया है और यह भी केवल तीनों तापों से अत्यधिक आर्त्त पुरुषों की आर्त्ति पुरुषों की आर्ति के ही विनाश के लिए धारण किया है।२३। हे ब्रह्मन्! आप तो ऐसे अद्भुत शक्तिशाली हैं कि अपने मन से ही इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन, संस्थिति और संहार अपनी इच्छा के अनुसार बिना किसी संशय के कर सकते है।२४। आप तो हमारे धाता और विधाता हैं तथा आप गुरु हैं और परायण हैं। आप हमारा परित्राण भी करने वाले हैं। अब आप हमारी इस वर्त्तमान आपदा को दूर भगाइए। ।२५। हे विप्रेन्द्र! आप हमारे रक्षक होइए और विशेष रूप से हम विप्रों की रक्षा करने वाले होइए। हम तीनों लोकों में निवासी सगर के पुत्रों के द्वारा दह्यमान हो रहे हैं।२६। हे सुव्रत! इस लोक में आप जैसे महापुरुषों की सात्विकी चेष्टा हुआ करती है। इसलिए आप समस्त लोकों की और हमारी रक्षा करने के योग्य हैं।२७। हे भगवान्! यदि आप ही हम सबकी रक्षा नहीं करेंगे तो यह सम्पूर्ण जगत् अकाल में ही विनष्ट हो जायगा। जैमिनि मुनि ने कहा—जब इस प्रकार से सब देवगणों ने अभ्यर्थना की थी तो कपिल मुनि ने धीरे से अपने दोनों नेत्रों को खोला था।२८।
विलोक्य तानुवाचेदं कपिलः सूनृतं वचः।
अश्वमोचन वर्णन ] [ २५
स्वकर्मणेव निर्दग्धाः प्रविनाङ्क्ष्यंति सागराः ॥२६ काले प्राप्ते तु युष्माभिः स तावत्परिपाल्यताम् । अहं तु कारणं तेषां विनाशाय दुरात्मनाम् ॥३० भविष्यामि सुरश्रेष्ठा भवतामर्थसिद्धये । मम क्रोधाग्निविप्लुष्टाः सागराः पापचेतसः ॥३१ भविष्यंतु चिरेणैव कालोपहतबुद्धयः । तस्माद्गतज्वरा देवा लोकाश्चैवाकुतोभयाः ॥३२ भवंतु ते दुराचाराः क्षिप्रं यास्यंति संक्षयम् । तद्ययं निर्भया भूत्वा व्रजध्वं स्वां पुरीं प्रति ॥३३ कालं कंचित्प्रतीक्षध्वं ततोऽभीष्टमवाप्स्यथ । कपिलेनैवमुक्तास्ते देवाः सर्वे सवासवाः ॥३४ तं प्रणम्य ततो जग्मुः प्रतीतास्त्रिदिवं प्रति । एतस्मिन्नंतरे राजा सगरः पृथिवीपतिः ॥३५
फिर उन सबका अवलोकन करके कपिल भगवान ने यह परम मुनृत वचन कहा था । ये सगर के पुत्र सब अपने ही कर्म से निर्दग्ध होकर विनष्ट होकर विनष्ट हो जायेंगे ।२६। जब भी इनके विनाश का काल प्राप्त होगा तभी नाश होगा । तब तक उस काल की आप सब लोग प्रतीक्षा कीजिए । और मैं तो उन दुष्ट आत्मा वालों के विनाश करने का कारण बनूँगा ।३० हे सुरश्रेष्ठो ! आप लोगों के अर्थ की सिद्धि के लिए केवल मैं कारण स्वरूप बनूँगा । महापापी ये सगर के पुत्र मेरे क्रोध की अग्नि से विप्लुष्ट होकर भस्मीभूत हो जायेंगे ।३१। ऐसा ही काल होगा कि इन सबकी बुद्धि उपहत हो जायगी और चिरकाल में इनका विनाश होगा । इसलिए सभी देवों का दुःख दूर हो जायगा और सभी लोक सभी ओर से भयहीन हो जायेंगे ।३२। वे सभी बुरे आचरण वाले हो जायेंगे । इसलिए अब आप लोग सब निर्भय होकर अपनी पुरी की ओर गमन कीजिए ।३३। आप लोगों को कुछ काल की प्रतीक्षा अवश्य ही करनी होगी । तभी आप अपने अभीप्सित की प्राप्ति करेंगे । जब इस प्रकार से कपिल मुनि के द्वारा देवगणों से कहा गया था तो इन्द्र के सहित सब देवों ने उनका अभिवादन किया था ।३४।
२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
फिर उन मुनीश्वर को प्रणाम करके परम समाश्वस्त होकर उन सबने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था। इसी बीच में पृथिवी के स्वामी राजा सगर ने एक महान् यज्ञ करने का विचार मन में किया था ।३५।
वाजिमेधं महायज्ञं कर्तुं चक्रे मनोरथम् ।
आहृत्य सर्वसंभारान्वसिष्ठानुमते तदा ॥३६
और्वाद्यैः सहितो विप्रैर्यथावद्दीक्षितोऽभवत् ।
दीक्षां प्रविष्टो नृपतिर्हयंसंचारणाय वै ॥३७
पुत्रान्सर्वान्समाहूय संदिदेश महयशाः ।
संचारयित्वा तुरगं परीत्य पृथिवीतले ॥३८
क्षिप्रं ममांतिकं पुत्राः पुनराहतुंमर्हथ ।
जैमिनिरुवाच-
ततस्ते पितुरादेशात्तमादाय तुरंगमम् ॥३९
परिचक्रमयामासुः सकले क्षितिमंडले ।
विधिचोदनयैवाश्वः स भूमौ परिवर्तितः ॥४०
न तु दिग्विजयार्थाय करादानार्थमेव च ।
पृथिवीभूभुजा तेन पूर्वमेव विनिर्जिता ॥४१
नृपाश्चोदारवीर्येण करदाः समरे कृताः ।
ततस्ते राजतनया निस्तोये लवणांबुधौ ॥४२
भूतले विविशुहृष्टाः परिवार्य तुरंगमम् ॥४३
उस समय में वसिष्ठ मुनि की अनुमति से सगर नृपति ने अश्वमेध नामक एक महान् यज्ञ के करने का मन में मनोरथ किया था और उस यज्ञ कार्य के सम्पादन करने के लिये सभी सम्भारों का समाहरण किया गया था ।३६। उस समय में और्व आदि जो विप्र थे उनके द्वारा राजा विधि-विधान के साथ दीक्षित हुआ था। जब राजा ने दीक्षा लेकर यज्ञ का समाचरण करने के लिये दीक्षा में प्रविष्ट हो गया था तो उसमें जो अश्व छोड़ा जाता है उसके भली भाँति चारण करने के लिये नियुक्ति की थी ।३७। महा यशस्वी सगर ने उन सब सहस्त्र पुत्रों को अपने समीप में बुलाकर उनको
सगर विनाश वर्णन ] [ २७
आदेश दिया था। इस अश्व को इस पृथ्वी तल में चारों ओर चारण कराने को गमन करो। ३८। फिर हे पुत्रो ! शीघ्र ही आप लोग घुमाकर इस अश्व को फिर मेरे पास ले आओ। जैमिनि मुनि ने कहा—इसके अनन्तर उन पुत्रों ने अपने पिताश्री की आज्ञा से उस अश्व को वहाँ से अपने साथ में ले लिया था। ३९। उन्होंने उस अश्व को समस्त पृथिवी तल में चारों ओर घुमाया था। विधि की प्रेरणा से ही वह अश्व भूमि में परिवर्तित हो गया था। ४०। उस राजा ने अश्व को दिग्विजय करने के लिये तथा करों का आदान करने के लिये तो छोड़ा ही नहीं था क्योंकि समस्त नृपों को तो नृप सगर ने पहिले ही जीत लिया था। ४१। उदार वीर्य वाले सगर ने सभी नृपों को समर में कर देने वाले बना लिया था। इसके पश्चात् जब वह अश्व दिखाई नहीं दिया था तो फिर उन समस्त राजपुत्रों ने जल से रहित क्षार सागर के पास गमन किया था। ४२। उस अश्व को परिवारित करके उन सबने भूतल के अन्दर प्रसन्न होकर प्रवेश किया था। ४३।
सगर विनाश वर्णन
जैमिनिरुवाच-
तेषु तत्र निविष्टेषु वासवेन प्रचोदितः।
जहार तुरगं वायुस्तत्क्षणेन रसातलम् ॥१॥
अदृष्टमश्वं तैः सर्वैरपहृत्य सदागतिः।
आनयत्तत्पथा राजन्कपिलस्यांतिकं मुनेः ॥२॥
ततः समाकुलाः सर्वे विनष्टेऽश्वे नृपात्मजाः।
परीत्य वसुधां सर्वां प्रमार्गतस्तुरंगमम् ॥३॥
विचित्य पृथिवीं ते तु स पुराचलकाननाम्।
अपश्यंतो यज्ञपशुं दुःखं महदवाप्नुवन् ॥४॥
ततोऽयोध्यां समासाद्य ऋषिभिः परिवारिताम्।
दृष्ट्वा प्रणम्य पितरं तस्मै सर्वं न्यवेदयन् ॥५॥
परीत्य पृथ्वीमस्माभिर्निविष्टे वरुणालये।
रक्ष्यमाणोऽपि पश्यद्भिः केनापि तुरगो हृतः ॥६॥
२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इत्युक्तस्तेरुषाविष्टस्तानुवाच नृपोत्तमः । प्रयास्यध्वमधर्मिष्ठाः सर्वेऽनावृत्तये पुनः ॥७
जैमिनि मुनि ने कहा—वे सगर के पुत्र जब वहाँ प्रविष्ट हो गये थे तो इसके अनन्तर इन्द्रदेव के द्वारा प्रेरणा प्राप्त करके वायु ने उसी क्षण में उस अश्व का हरण करके रसातल में पहुँचा दिया था ।१। जब उन सगर पुत्रों ने वहाँ कहीं पर भी उस अश्व को नहीं देखा था । वायु देव ने उसका अपहरण करके हे राजन् ! उसी मार्ग से कपिल मुनि के समीप में पहुँचा दिया था ।२। उस अश्व के वहाँ पर न दिखलाई देने पर सब नृप के पुत्र बहुत ही अधिक बेचैन हो गये थे और सम्पूर्ण पृथ्वी परिक्रमा लगाकर उस अश्व को खोज कर रहे थे ।३। उन्होंने पहिले सम्पूर्ण भूतल पर उस अश्व को ढूँढ़ा था फिर सब नगर-पर्वत और वनों में उसकी खोज की थी । जब उन्होंने कहीं पर भी उस यज्ञ के पशु अश्व को नहीं देखा था तो उन सबके हृदयों में बड़ा भारी दुःख हुआ था ।४। फिर वे सब अनेक ऋषियों से घिरी हुई अयोध्या पुरी में समागत हो गये थे । अपने पिता सगर का दर्शन कर उन्होंने प्रणाम करके सभी घटित घटना के विषय में अपने पिता से निवेदन किया था ।५। उन्होंने कहा—हम सबने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके फिर वरुणालय (सागर) में प्रवेश किया था । हम उस अश्व को बराबर देखते रहे थे किन्तु हमारे द्वारा रक्षा किया हुआ भी वह अश्व को किसी के द्वारा सहसा हरणकर लिया गया है ।६। जब इस रीति से उनके द्वारा राजा सगर से कहा गया था तो यह सुनकर उसको बड़ा भारी क्रोध हो गया था और उस उत्तम नृप ने उन सबसे यह कहा था—तुम सब बड़े पापी हो, यहाँ से इसी समय निकलकर चले जाओ और फिर लौटकर अपना मुँह मत दिखाना ।७।
कथं भवद्भिर्जीवद्भिर्भावनष्टो वै दुरात्मभिः । तुरगेण विना सत्यं नेहागमनमस्ति वः ॥८ ततः समेत्य तस्मात्ते संप्रयाताः परस्परम् । ऊचुर्न दृश्यतेऽद्यापि तुरगः किं प्रकुर्महे ॥६ वसुधा विचिताऽस्माभिः सशैलवनकानना । न चापि दृश्यते वाजी तद्वार्त्तापि न कुत्रचित् ॥१०
सगर विनाश वर्णन ] [ २६
तस्मादब्धेः समारभ्य पातालंवधि मेदिनीम् ।
विभज्य खात्वा पातालं विविशाम तुरंगमम् ॥११
इति कृत्वा मतिं सर्वे सागराः क्रूरनिश्चयाः ।
निचख्नुर्भूमिमंबोधेस्तटादारभ्य सर्वतः ॥१२
तैः खन्यमाना वसुधा ररास भृशविह्वला ।
चुक्रुशुश्चापि भूतानि दृष्ट्वा तेषां विचेष्टितम् ॥१३
ततस्ते भारतं खंडं खात्वा संक्षिप्य भूतले ।
भूमेर्योजनसाहस्रं योजयामासुरंबुधौ ॥१४
तुम सबने जीवित रहते हुए ही किस तरह से उस अश्व को खो दिया है ! तुम बड़े डरपोक हो । जब वह अश्व ही नहीं है तो उसके बिना आप सबका यहाँ पर आगमन सचमुच नहीं होना चाहिए ।८। इसके अनन्तर वे सब इकट्ठे होकर वहाँ से प्रयाण कर गये थे और परस्पर में कहते थे कि अभी तक भी वह अश्व कहीं पर भी दिखलाई नहीं दे रहा है । हम अब क्या करें ।६। हमने सम्पूर्ण वसुधा तो देख डाली है और पर्वत-वन और कानन भी देख लिये हैं किन्तु वह अश्व कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रहा है । अश्व का दिखाई देना तो दूर रहा, उसकी कहीं पर चर्चा भी नहीं हो रही है कि वह कहाँ पर होकर निकला था ।१०। इसलिए समुद्र से आरम्भ करके पाताल पर्यन्त इस भूमि का विभाजन कर खोद डालें और पाताल में उस अश्व की खोज करें ।११। फिर सगर के पुत्रों ने यही अपना विचार बना लिया था और उन सबका यह बड़ा ही क्रूर निश्चय था । उन सबने समुद्र के तट से आरम्भ करके सब ओर से उस भूमि को खोदना आरम्भ कर दिया था ।१२। उनके द्वारा खोदी जाने वाली भूमि बहुत ही बेचैन होती हुई उत्पीड़ित हुई थी । उन सबके इस महान भीषण कृत्य को देखकर समस्त प्राणी रोने लग गये थे ।१३। इसके पश्चात उन्होंने भूमण्डल में भारतखण्ड को खोदकर संक्षिप्त कर दिया था और भूमि के एक सहस्र योजन भाग को सागर के स्वरूप में योजित कर दिया था जिससे यह भूभाग कम हो गया था ।१४।
आपातालतलं ते तु खनंतो मेदिनीतलम् ।
चरंतमश्वं पाताले ददृशुर्नृपनन्दनाः ॥१५
३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
संप्रहृष्टास्ततः सर्व्वे समेत्य च समंततः । संतोषाज्जहसुः केचिन्ननृतुश्च मुदान्विताः ॥१६ ददृशुश्च महात्मानं कपिलं दीप्ततेजसम् । वृद्धं पद्मासनासीनं नासाग्रन्यस्तलोचनम् ॥१७ ऋज्वायतशिरोग्रीवं पुरोविष्टब्धवक्षसम् । स्वतेजसाऽभिसरता परिपूर्णेन सर्वतः ॥१८ प्रकाशयमानं परितो निवातस्थप्रदीपवत् । स्वांतप्रकाशिताशेषविज्ञानमयविग्रहम् ॥१९ समाधिगतचित्तं तु निभृतांभोधिसन्निभम् । आरूढयोगं विधिवद्धयेयसंलीनसम् ॥२० योगींद्रप्रवरं शांतं ज्वालामालमिवानलम् । विलोक्य तत्र तिष्ठंतं विमृशंतः परस्परम् ॥२१
उन नृप के पुत्रों ने उस समय भूमि को खोदते हुए पाताल लोक के तले तक खोद डाला था और उसके अन्दर पाताल में फिर उस अश्व को देखा था ।१५। फिर जब उनको वह यज्ञ का अश्व वहाँ दिखाई पड़ गया तो सब चारों ओर से एकत्रित होकर बहुत अधिक प्रसन्न हुए थे । उनका बहुत अधिक सन्तोष हो गया था । उनमें कुछ तो बहुत अधिक हँसने लगे थे और कुछ परमानन्दित होते हुए नाचने लग गये थे ।१६। वहाँ पर महान आत्मा वाले कपिल मुनि का दर्शन किया था जो कि परम वृद्ध थे और तेज से देदीप्यमान हो रहे थे । उन्होंने पद्मासन बाँध रक्खा था । इस तरह से बैठकर अपने नेत्रों को नासिका के अग्रभाग लगाकर ध्यान में योग क्रिया के अनुसार मग्न हो रहे थे ।१७। उनका शिर और ग्रीवा एकदम सीधे थे और आगे की ओर उनका वक्षःस्थल विष्टब्ध था । उनका परिपूर्ण तेज सभी ओर से अभिसरण कर रहा था अर्थात् उनका अपना आत्म तेज उनके चारों ओर एक मण्डलाकार में उद्दीप्त होकर दिखाई दे रहा था ।१८। जिस तरह से निर्वात स्थान में एक रस दीपक की लौ प्रकाशित हुआ करती है कि उसी भाँति से सब ओर उनका तेज प्रकाशित होता हुआ दिखाई दे रहा था । उनके अपने अन्तःकरण में प्रकाशित जो विज्ञान था उसी से परिपूर्ण उनका कलेवर था ।१९। समाधि में उनका संलग्न चित्त छिपे हुए समुद्र के ही
सगर विनाश वर्णन ] [ ३१
समान था और वे विधि के साथ योगाभ्यास में समारूढ़ होकर अपने ध्येय परब्रह्म में संलग्न मन वाले थे ।२०। उन्होंने परम शान्त योगीन्द्रों में अधिक श्रेष्ठ मुनि का अवलोकन किया तो ऐसा उस समय में आभास हो रहा था कि यह कोई जलती हुई ज्वालाओं की मालाओं से परिपूर्ण साक्षात् अग्नि का ही स्वरूप है । जब उनको समाधि स्थित सबने देखा था तो सब आपस में विचार करने लगे थे कि यह अत्यधिक तेजस्वी कौन महापुरुष है ।२१।
मुहूर्त्तमिव ते राजन्साध्वसं परमं गताः ।
ततोऽयमश्वहर्त्तेति सागरा कालचोदिताः ॥२२
परिवव्रुर्दुरात्मानः कपिलं मुनिसत्तमम् ।
ततस्तं परिवार्योचुश्चोरोऽयं नात्र संशयः ॥२३
अश्वहर्त्ता ततोह्येष वध्योऽस्माभिर्दुराशयः ।
तं प्राकृतवदासीनं ते सर्वे हतबुद्धयः ॥२४
आसन्नमरणाश्चक्रुर्धर्षितं मुनिमंजसा ।
जैमिनिरुवाच—
ततो मुनिरदीनात्मा ध्यानभंगप्रधर्षितः ॥२५
क्रोधेन महताऽऽविष्टश्चुक्षुभे कपिलस्तदा ।
प्रचचाल दुराधर्षो धर्षितस्तैर्दुरात्मभिः ॥२६
व्यजृम्भत च कल्पांते मरुद्भिरिव चानलः ।
तस्य चार्णवगंभीराद्वपुषः कोपपावकः ॥२७
दिधक्षुरिव पातालाँल्लोकात्सांकर्षणोऽनलः ।
शुशुभे धर्षणक्रोधपरामर्शविदीपितः ॥२८
हे राजन् ! मुहूर्त मात्र समय तक तो दङ्ग से होकर रह गये थे और उनको बड़ा भारी डर लगा था। फिर भावी की प्रबलता से प्रेरित होकर उन सगर के पुत्रों ने यही निश्चय बना लिया कि हो न हो यही इस अश्व के हरण करने वाला है ।२२। उन दुष्ट आत्माओं वालों ने परम श्रेष्ठ मुनि कपिल को चारों ओर घेर लिया था और घेरा डालकर उन्होंने कहा था— यही चोर है—इसमें लेश भर भी संशय नहीं हैं ।२३। क्योंकि इसने अश्व का अपहरण किया है इसलिए इस बुरे विचार वाले का हमको वध कर
३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
डालना चाहिए। उन सब की बुद्धि तो होनहार के वश क्षीण हो गयी थी और उनकी मृत्यु निकट में प्राप्त हो रही थी। उन सबने योगासीन उस मुनि को एक साधारण मनुष्य के ही समान सहसा धर्षित किया था अर्थात् डाट-फटकार लगाना आरम्भ कर दिया था। जैमिनी मुनि ने कहा—इसके पश्चात् यह हुआ था कि जब उन सबने बहुत शोर मचाया तो मुनि का ध्यान टूट गया था और अत्युच्च आत्मा वाले मुनि कपिल प्रधर्षित हो गये थे। २४-२५। उस समय में ध्यान के भङ्ग हो जाने से कपिल मुनि को महान् क्रोध हो गया था और उस समय में विष्ट उनके हृदय में बड़ा भारी क्षोभ हो गया था। वे तो इतने तेजस्वी थे कि उनके ऊपर किसी का भी प्रभाव नहीं पड़ सकता था और उनका दबा देना महान् कठिन था। जब उन दुरात्माओं ने धर्षित करने का प्रयास किया था तो वे संचलित हो गये थे। उस समय में कपिल मुनि ऐसे ही क्रोधवेग में देदीप्यमान दिखाई पड़ रहे थे जैसे कल्प के अन्त में सर्व संहारक वायु से प्रेरित अग्नि होता है। उस समय में समुद्र के समान परम गम्भीर उनके शरीर से कोपाग्नि निकल रही थी। २६-२७। वह सर्वसंहारक क्रोधाग्नि पाताल लोकों को दग्ध करने वाले के ही समान था और धर्षण अर्थात् फटकार से जो क्रोध उत्पन्न हो गया था उसके होने से अत्यधिक प्रदीप्त होकर वह शोभित हो रहा था। २८।
उन्मीलयत्तदा नेत्रे वह्निचक्रसमद्युतिः । तवाऽक्षिणी क्षणं राजन्राजेतां सुभृशारुणे ॥ २६
पूर्वसंध्यासमुदितौ पुष्पवंताविवांबरे । ततोऽप्युद्वर्त्तमानाभ्यां नेत्राभ्यां नृपनंदनान् ॥ ३०
अवेक्षत च गंभीरः कृतांतः कालपर्यये । क्रुद्धस्य तस्य नेत्राभ्यां सहसा पावकार्चिषः ॥ ३१
निश्चेहुरभितो दिक्षु कालाग्नेरिव संतताः । सधूमकवलोद्ग्राः स्फुलिंगौघमुचो मुहुः ॥ ३२
मुनिकोधानलज्वालाः समंताद्व्यानशुर्दिशः । व्यालोदरोग्रकुहरा ज्वालास्तन्नेत्रनिर्गताः ॥ ३३
विरेजुर्गिभृतांभोधेर्वडवाग्नेरिवाचिषः ।
सगर विनाश वर्णन ] [ ३३
क्रोधाग्निः सुमहाराज ज्वालाव्याप्तदिगंतरः ॥३४ दग्धांश्चकार तान्सर्वानावृण्वानो नभस्तलम् ॥३५
उस समय में कपिल मुनि ने अग्नि मण्डल के समान अपने नेत्रों को खोला था । हे राजन् ! उनकी दोनों आँखें क्षण भर तो अत्यधिक अरुण दिखलाई देती हुईं शोभा वाली हुई थीं ।२९। और वे दोनों नेत्र पूर्व सन्ध्या में समुदित अम्बर में दो पुष्पों के ही सदृश प्रतीत हो रहे थे । इसके अनन्तर ही उन्होंने अपने खुले हुए नेत्रों को उन सब नृप सगर के पुत्रों पर डाला था ।३०। संहार के समय में यमराज के ही तुल्य अत्यन्त गम्भीर मुनि ने नृप सुतों की ओर देखा था । अत्यधिक क्रोध तो समाधि के भङ्ग होने से उनको हो ही रहा था । परम क्रुद्ध उनके नेत्रों से अग्नि की ज्वालायें निकल रही थीं ।३१। और वे ज्वालाएँ कालाग्नि के ही समान दिशाओं में सभी ओर फैली हुई थीं । धूम के समूहों से युक्त वे ज्वालाएँ अत्यन्त आगे की ओर बढ़ रही थीं और बारम्बार उनमें से अग्नि के कण छूटकर निकल रहे थे ।३२। क्रोधाग्नि की ज्वालाओं ने सभी ओर दिशाओं को व्याप्त कर दिया था । उनके नेत्रों से निकलने वाली क्रोधाग्नि की ज्वालाएं कालोदर के उग्र कुहरों वाली थीं तात्पर्य यह है कि ज्वालाओं के मण्डल की ऐसी व्याप्ति हो गयी थी । उस समय में कुहरे के समान कुछ भी दिखलाई नहीं दे रहा था ।३३। हे सुमहाराज ! उनके क्रोधाग्नि की ज्वालाएँ छिपे हुए समुद्र की बड़वाग्नि की ज्वालाओं के ही समान शोभित हो रही थीं और उन कपिल मुनि की क्रोधाग्नि ने सभी दिशाओं के अन्तर को व्याप्त कर रक्खा था वह सर्वत्र फैल गया था ।३४। उस क्रोधाग्नि ने पूर्ण नभ-स्थल को आवृत करते हुए उन समस्त सगर के साठ सहस्र पुत्रों को दग्ध करके भस्मीभूत कर दिया था ।३५।
सशब्दमुद्ध्वांतमरुत्प्रकोपविवर्त्तमानानलधूमजालैः । महीरजोभिश्च नितांतमुद्धतैः समावृतं लोकमभूद् भृशातुरम् ॥३६ ततः स वह्निर्विलिखन्निवाभितः समीरवेगाभि रमीभिरंबरम्। शिखाभिरुर्वीशसुतानशेषतो ददाह सद्यः सुर- विद्विषस्तान् ॥३७ मिषतः सर्वलोकस्य क्रोधाग्निस्तमृते हयम् ।
३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सागरांस्तानशेषेण भस्मसादकरोत्स तान् ॥३८ एवं क्रोधाग्निना तेन सागराः पापचेतसः । जज्वलुः सहसा दावे तरवो नीरसा इव ॥३९ दृष्ट्वा तेषां तु निधनं सागराणां दुरात्मनाम् । अन्योन्यमब्रुवन्देवा विस्मिता ऋषिभिः सह ॥४० अहोदारुणपापानां विपाको न चिरायितः । दुरंतः खलु लोकेऽस्मिन्नराणामसदात्मनाम् ॥४१ यदि मे पर्वताकारा नृशंसाः क्रूरबुद्धयः । युगपद्विलयं प्राप्ताः सहसैव तृणाग्निवत् ॥४२
सरर-सरर करती हुई महाध्वनि से परिपूर्ण बड़ी जोरदार हवा के प्रकोप से चारों ओर फैली हुई अग्नि की धुँआ के गुब्बारों से और अत्यधिक ऊपर की ओर उठकर उड़ती हुई भूमि की धूलि के सम्पूर्ण लोक ढक सा गया था और बहुत ही अधिक लोक में विकलता हो गयी थी।३६। इसके पश्चात् वह अग्नि वायु के वेग से समाहृत शिखाओं से जो घूम-घूम करके ऊपर की ओर उठ रहीं थीं नभस्तत में मानों वे कुछ लिख रहीं होवें चारों ओर फैली हुई थी। उन्होंने उन सुरगण के शत्रु नृप के पुत्रों को पूर्णतया तुरन्त ही प्रदग्ध कर दिया था ।३७। समग्र लोक का विनाश करने वाले उन सगर के पुत्रों का पूर्णतया उस कपिल मुनि की क्रोधाग्नि ने दाह करके राख की ढेरियाँ बना दिया था और उस यज्ञ के अश्व को छोड़ दिया था ।३८। नीरस सूखे हुए वृक्ष तुरन्त ही दाव की अग्नि से जल जाया करते हैं उसी भाँति पुण्य रस विहीन पापात्मा के सगर सुत तुरन्त ही जल गये थे ।३९। इस रीति से उन महान् दुष्ट सगर सुतों का निधन का अवलोकन करके सभी देवगण अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हो गये थे और परस्पर में ऋषियों के साथ एक दूसरे से कहने लगे थे ।४०। अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है कि महान् दारुण पाप करने वालों के पापों का विपाक कितनी शीघ्रता से हो गया है। निश्चय ही इस लोक में जो असत् आत्माओं वाले नर होते हैं उनका अन्त बड़ा ही दुःख से पूर्ण हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि नीचों का विनाश तुरन्त ही अवश्यम्भावी होता है। ।४१। यही बात है कि ये महान् क्रूर बुद्धि वाले निर्दयी जिनका कलेवरा-कार पर्वतों के सदृश था और कितनी अधिक संख्या में थे इस समय में तृण
सगर विनाश वर्णन ] [ ३५
में लगी हुई अग्नि के ही समान तुरन्त ही एक ही साथ विलय को प्राप्त हो गये हैं मानों हुए हो नहीं थे। आप उनका नाम मात्र ही रह गया है ॥४२॥
उद्वेजनीया भूतानां सद्भिभरत्यंतगर्हिताः । आजीवांतमिमे हर्तुं दिष्ट्या संक्षयमागताः ॥४३ परोपतापि नितरां सर्वलोकजुगुप्सितम् । इह कृत्वाऽशुभं कर्म कः पुमान्विन्दते सुखम् ॥४४ विक्रोश्य सर्वभूतानि संप्रयाताः स्वकर्मभिः । ब्रह्मदंडहताः पापा निरयं शाश्वतीः समाः ॥४५ तस्मात्सदेव कर्त्तव्यं कर्म पुंसां मनीषिणाम् । दूरतंश्च परित्याज्यमितरल्लोकनिन्दितम् ॥४६ कर्त्तव्यः श्रेयसे यत्नो यावज्जीवं विजानता । नाचरेत्कस्यचिद्द्रोहमनित्यं जीवनं यतः ॥४७ अनित्योऽयं सदा देहः संपदश्चातिचंचलाः । संसारश्चातिनिस्सारस्तत्कथं विश्वसेद्बुधः ॥४८ एवं सुरमुनीन्द्रेषु कथयत्सु परस्परम् । मुनिक्रोधैधनीभूता विनेशुः सगरात्मजाः ॥४९ निर्दग्धदेहाः सहसा भुवं विष्टभ्य भस्मना । अवापुर्निरयं सद्यः सागरास्ते स्वकर्मभिः ॥५० सागरांस्तानशेषेण दग्ध्वा क्रोधजोऽनलः । क्षणेन लोकानखिलानुद्यतो दग्धुमंजसा ॥५१ भयभीतास्ततो देवाः समेत्य दिवि संस्थिताः । तुष्टुवुस्ते महात्मानं क्रोधाग्निशमनार्थिनः ॥५२
ये सभी प्राणियों के लिए उद्वेग करने वाले थे और सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही निन्दित समझे जाया करते थे । ये जीवन जब तक इनका रहा सबका अपहरण ही किया करते थे । अब बहुत ही अच्छा हुआ कि सबके सब विनाश को प्राप्त हो गये हैं । यह तो एक प्रसन्नता की ही बात हुई है ।
३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।४३। जो निरन्तर ही दूसरे प्राणियों को उपताप दिया करता है तथा सदा ही सर्वत्र जिसकी लोग निन्दा किया करते हैं ऐसा इस लोक में परमाशुभ कर्मों को करके कौन सा पुरुष है जो सुख प्राप्त करता है अर्थात् ऐसा कोई भी सुख नहीं प्राप्त करता है ।४४। सब प्राणियों को सता कर अपने ही कुकर्मों के द्वारा इस लोक से विदा होकर चल बसे हैं। ब्राह्मण के अपराध का दण्ड पाकर निहत हो गये हैं। ये महापापी सगर सुत निरन्तर सैकड़ों वर्षों तक नरक में रहेंगे ।४५। इस कारण से मनीषी पुरुषों को सर्वदा सत् कर्म ही करना चाहिए और जो दूसरे लोगों के द्वारा विनिन्दित कर्म हो उसका तो दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए ।४६। मानव का परम कर्त्तव्य है कि जब तक भी उसका जीवन रहे सदा श्रेय के ही यत्न करना चाहिए क्योंकि उसको यह ज्ञान होना चाहिए कि शुभ कर्म ही सफल होता है और सदा बुरे कर्मों का बुरा ही परिणाम हुआ करता है कभी भी किसी के साथ द्रोह का समाचरण नहीं करे क्योंकि जिस जीवन में द्रोह करता है वही जीवन अनित्य है फिर द्रोह का पाप क्यों अर्जित किया जावे ।४७। यह देह तो सदा ही अनित्य है कोई चाहे कैसा भी क्यों न हो यहाँ सदा नहीं रहता है न रहा है और न कभी रहेगा । जिस सम्पदा के लिये मानव बड़े-बड़े कुत्सित कर्म किया करता है वह सम्पदा भी अत्यन्त चञ्चल है और कभी किसी के पास स्थिर नहीं रहा करती है । यह संसार अति निस्सार है अर्थात् सभी सांसारिक कर्मों में पारमार्थिक श्रेय नहीं हैं जो सार कहा जा सके । सभी यहाँ की बातें यहीं समाप्त हो जाया करती हैं फिर भी आश्चर्य यही है कि बुध पुरुष भी कैसे इसमें विश्वास किया करते हैं ।४८। इस रीति से सुरगण और मुनिगण परस्पर में कह रहे थे और नृप सगर के पुत्र सब के सब कपिल मुनि के क्रोध में इन्धन होकर विनष्ट हो गये थे । ।४९। वे सगर के पुत्र अपने ही कर्मों से दग्ध देहों वाले होकर सहसा भस्म के रूप में भूमि में मिल गये थे और तुरन्त ही नरक में पहुँच गये थे ।५०। मुनि के क्रोध की अग्नि ने पूर्ण रूप से उन सगर पुत्रों को दग्ध करके फिर वह अग्नि तुरन्त ही समस्त लोकों को दग्ध करने के लिये उद्यत हो गयी थी ।५१। तब सब देवगण भय से भीत हो गये थे और दिवलोक में ही संस्थित रहते हुए उस क्रोधाग्नि के शमन की इच्छा वालों ने उन महात्मा मुनि का स्तवन किया था ।५२।
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ३७
कपिल आश्रम में अश्वानयन
जैमिनिरुवाच-
क्रोधाग्निमेनं विप्रेन्द्र सद्यः संहत्तुमहंसि ।
नो चेदकाले लोकोऽयं सकलस्तेन दह्यते ॥१
दृष्टस्ते महिमानेन व्याप्तमासीच्चराचरम् ।
क्षमस्व संहर क्रोधं नमस्ते विप्रपुंगव ॥२
एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्कपिलो मुनिः ।
तूर्णमेव क्षयं निन्ये क्रोधाग्निमतिभैरवम् ॥३
ततः प्रशांतमभवज्जगत्सर्वं चराचरम् ।
देवास्तपस्विनश्चैव बभूवुर्विगतज्वराः ॥४
एतस्मिन्नेव काले तु भगवान्नारदो मुनिः ।
अयोध्यामगमद्राजन्देवलोकाद्यदृच्छया ॥५
तमागतमभिप्रेक्ष्य नारदं सगरस्तदा ।
अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयामास शास्त्रतः ॥६
परिगृह्य च तत्पूजामासीनः परमासने ।
नारदो राजशार्दूलमिदं वचनमब्रवीत् ॥७
जैमिनी मुनि ने कहा—देवों ने कपिल मुनि से प्रार्थना की थी—विप्रेन्द्र ! आप इस क्रोध की महान् भीषण अग्नि का तुरन्त ही संहार करने के योग्य हैं । यदि इसका संहरण नहीं किया गया तो उससे अकाल में ही यह सम्पूर्ण लोक दाह को प्राप्त होता जा रहा है ।१। आपकी महिमा तो इसी से देखी जा चुकी है जो कि इस चराचर में व्याप्त थी । हे विप्रों में परम श्रेष्ठ ! अब क्षमा कीजिए और अपने क्रोध का संहरण कीजिए । आपकी सेवा में हम सबका प्रणाम है ।२। इस रीति से जब देवों के द्वारा उनकी स्तुति की गयी थी तो भगवान कपिल मुनि ने उस अत्यधिक भैरव क्रोधाग्नि का क्षय कर दिया था ।३। फिर यह समस्त चराचर जगत् प्रशान्त हो गया था और सब देवगण तथा तपस्वी गण दुःख से रहित हो गये थे अर्थात् इन सबका सन्ताप दूर हो गया था ।४। इसी समय में देवर्षि भगवान्
३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नारद मुनि स्वेच्छा से ही देवलोक से विचरण करते हुए अयोध्या पुरी में समागत हो गये थे ।५। राजा सगर ने जब भगवान् नारदजी को वहाँ पर प्राप्त हुए देखा। तो शास्त्रानुसार अर्घ्य-पाद्य आदि से भली भाँति उनका अर्चन किया था ।६। नारदजी ने उसकी पूजा को ग्रहण करके आसन पर संस्थिति की थी और फिर उन्होंने उस नृप शार्दूल से यह वचन कहा था ।७।
नारद उवाच-
हयसंचारणार्याय संप्रयातास्तवात्मजाः ।
ब्रह्मदंडहताः सर्वे विनष्टा नृपसत्तम ॥८
संरक्ष्यमाणस्तैः सर्वैर्हयस्ते यज्ञियो नृप ।
केनाप्यलक्षितः क्वापि नीतो विधिवशाद्दिवि ॥६
ततो विनष्टं तुरंगं विचिन्वंतो महीतले ।
प्रालभंत न ते क्वापि तत्प्रवृत्तिं चिरान्नृप ॥१०
ततोऽवनेरधस्तेऽश्वं विचेतुं कृतनिश्चयाः ।
सागरास्ते समारभ्य प्रचखनुर्वसुधातलम ॥११
खनंतो वसुधामश्वं पाताले ददृशुर्नृप ।
समीपे तस्य योगींद्रं कपिलं च महामुनिम् ॥१२
तं दृष्ट्वा पापकर्मणिस्ते सर्वे कालचोदिताः ।
कपिलं कोपयामासुरश्वहर्त्ताऽयमित्यलम् ॥१३
ततस्तत्क्रोधसंभूतनेत्राग्नेर्दहतो दिशः ।
इन्धनीभूतदेहास्ते पुत्राः संक्षयमागताः ॥१४
श्री नारदजी ने कहा— हे राजन् ! यज्ञ के अश्व के सञ्चारण के लिए आपके पुत्रों ने संप्रयाण किया था । हे श्रेष्ठ नृप ! वे सब ब्रह्म-दण्ड से हत होकर विनष्ट हो गये हैं ।८। उन सबके द्वारा भली भाँति रक्षा किया भी वह यज्ञिय अश्व किसी के द्वारा अलक्षित कर दिया गया था और भाग्य वश दिव में वह ले जाया गया था ।६। फिर जब वह अश्व विनष्ट अर्थात् खोया हुआ हो गया था उन्होंने महीतल में खोज की थी किन्तु उन्होंने
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ३६
उसको कहीं पर भी प्राप्त नहीं किया था और वह किस ओर गया है—यह भी बहुत समय तक उनको ज्ञात नहीं हुआ था ।१०। इसके पश्चात् उन्होंने इस वसुन्धरा के नीचे उस अश्व की खोज करने निश्चय किया था। उन आपके पुत्रों ने समारम्भ करके इस वसुधा के तल भाग को खोद डाला था ।११। जब वे लगातार पृथ्वी को खोदते ही चले गये तो हे नृप ! उन्होंने पाताल में उस अश्व को देखा था जिस अश्व के ही समीप में योगीन्द्र महा-मुनि कपिल जी समाधि में स्थित हुए उनको दिखाई दिये थे ।१२। उन महामुनि को वहाँ देखकर पापपूर्ण कर्मों वाले उन सबने काल की गति से प्रेरित होकर उन कपिल देव के ही ऊपर बड़ा कोप किया था और यह ही इस अश्व के हरण करने वाला है—यह कहा था ।१३। इसके अनन्तर उन मुनि को क्रोध उत्पन्न हो गया था और उससे संभूत नेत्रों की अग्नि से जो दशों दिशाओं को दग्ध कर रही थी आपके समस्त पुत्र इन्धन हो गये थे और जल भुनकर उसके देह भस्मीभूत हो गये थे तथा सब नष्ट हो गये थे ।१४।
क्रूराः पापसमाचाराः सर्वलोकोपरोधकाः ।
यतस्ते तेन राजेंद्र न शोकं कर्तुमर्हसि ॥१५
स त्वं धैर्यधनो भूत्वा भवितव्यतयात्मनः ।
नष्टः मृतमतीतं च नानुशोचंति पंडिताः ॥१६
तस्मात्पौत्रमिमं बालमंशुमंतं महामतिम् ।
तुरगानयनार्थाय नियुंक्ष्व नृपसत्तम ॥१७
इत्युक्त्वा राजशार्दूलं सदस्यर्त्विक्समन्वितम् ।
क्षणेन पश्यतां तेषां नारदोऽतर्दधे मुनिः ॥१८
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य नृपोत्तमः ।
दुःखशोकपरीतात्मा दध्यौ चिरमुदारधीः ॥१९
तं ध्यानयुक्तं सदसि समासीनमवाङ्मुखम् ।
वसिष्ठः प्राह राजानं सांत्वयन्देशकालवित् ॥२०
किमिदं धैर्यसाराणामवकाशं भवादृशाम् ।
लभते हृदि चेच्छोकः प्राप्तं धीरतया फलम् ॥२१
४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वे सब आपके पुत्र अत्यन्त क्रूर थे—पाप कर्मों का समाचरण करने वाले तथा समस्त लोकों के उपरोधक थे। क्योंकि ऐसे ही जघन्य थे अतः हे राजेन्द्र ! अब आप उनके लिए शोक करने के योग्य नहीं हैं ।१५। आप तो धैर्य को ही धन मानने वाले हैं अतएव आपको धीरज की रक्षा करनी चाहिए। जो भी कुछ भवितव्यता होती है तथा नष्ट हो जाता है और व्यतीत हो जाता है उसको पण्डित लोग नहीं सोचा करते हैं ।१६। इस कारण से अब इस अपने अंशुमान् पौत्र को जो महान् मतिमान् है हे नृप श्रेष्ठ ! उस अश्व को लाने के कार्य में नियुक्त करो ।१७। समस्त सदस्य और ऋत्विजों से युक्त उस नृप शार्दूल से यही कहकर सभी के देखते हुए एक ही क्षण में नारदजी अन्तर्धान हो गये थे ।१८। फिर उस राजा ने नारदजी के कहे हुए उन वचनों का श्रवण करके भी महान् दुःख और शोक से पूर्णतया घिरा हुआ होकर उस उदार बुद्धि वाले ने बहुत काल तक चिन्तन किया था ।१६। उस समय में राजा सभा में नीचे की ओर मुख वाला होकर बैठे हुए थे। उसी समय में देश और काल के ज्ञाता वसिष्ठजी ने आकर राजा को सान्त्वना देते हुए कहा था ।२०। आप तो धैर्य को बहुत महत्त्व देने वाले हैं फिर आप जैसे महान् पुरुषों को यह ऐसा अवसर क्यों प्राप्त हो रहा है। यदि आपके हृदय में भी शोक ने स्थान ग्रहण कर लिया है तो धीरता से क्या फल होता है। अर्थात् फिर तो धैर्य व्यर्थ ही है ।२१।
दौर्मनस्यं शिथिलयन्सर्वं दिष्टवशानुगम् ।
मन्वानोऽनन्तरं कृत्यं कर्तुमर्हस्यसंशयम् ॥२२
वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु राजा कार्यार्थतत्त्ववित् ।
धृतिं सत्त्वं समालंब्य तथेति प्रत्यभाषत ॥२३
अंशुमंतं समाहूय पौत्रं विनयशालिनम् ।
ब्रह्म क्षत्रसभामध्ये शनैरिदमभाषत ॥२४
ब्रह्मदंडहताः सर्वे पितरस्तव पुत्रक ।
पतिताः पापकर्माणो निरये शाश्वतीः समाः ॥२५
त्वमेव संततिर्मह्यं राज्यस्यास्य च रक्षिता ।
त्वदायत्तमशेषं मे श्रेयोऽमुत्र परत्र च ॥२६
स त्वं गच्छ ममादेशात्पाताले कपिलांतिकम् ।
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४१
तुरगानयनार्थाय यत्नेन महतान्वितः ॥२७
तं प्रार्थयित्वा विधिवत्प्रसाद्य च विशेषतः ।
आदाय तुरगं वत्स शीघ्रमागंतुमर्हसि ॥२८
आप इस मन की उदासी को शिथिल करके यह सोच लीजिये कि यह सभी कुछ भाग्य के कारण से ही हुआ है और इसमें अन्य किसी का भी कुछ वश नहीं चलता है। ऐसा ही मानकर बिना किसी संशय के जो भी कुछ पीछे करने का कृत्य है उसको ही करना अब उचित है ।२२। वसिष्ठ जी के द्वारा इस रीति से कहा जाने पर कार्यों के अर्थ के तत्त्वों के ज्ञाता राजा सगर ने धैर्य का सहारा लिया था और मुनि से वही सब कुछ करने के लिये प्रार्थना की थी ।२३। फिर नृप सगर ने अपने विनय शाली पौत्र अंशुमान् को अपने पास बुलाकर विप्रों और क्षत्रियों की सभा के मध्य में धीरे से उससे कहा था ।२४। हे बेटा ! तुम्हारे सभी पितृगण ब्रह्मदण्ड से निहत हो गये हैं और वे पाप कर्मों के करने वाले सैकड़ों वर्षों के लिए नरक में पतित हो गये हैं ।२५। इस समय में तो मेरे अन्य सभी पुत्रों का विनाश हो गया है मेरी केवल एक तुम ही सन्तति शेष रहे हो जो कि इस मेरे विशाल राज्य के रक्षा करने वाले हो । अब तो इस लोक में और परलोक में मेरे पूर्ण श्रेय को करना तुम्हारे ही अधीन है ।२६। वह आप ही अब मेरी आज्ञा से पाताल लोक में कपिल मुनि के समीप में गमन करो । और महान् यत्न से उस यज्ञ के अश्व को यहाँ पर ले आओ ।२७। आप वहाँ पर पहुँच कर उन मुनिवर से विधि के साथ प्रार्थना करना और विशेष रूप से उनको प्रसन्न कर लेना । फिर उस अश्व को अपने साथ लेकर हे वत्स ! तुम बहुत ही शीघ्रता से यहाँ पर वापिस आ जाओ ।२८।
जैमिनिरुवाच-
एवमुक्तोऽशुमांस्तेन प्रणम्य पितरं पितुः ।
तथेत्युक्त्वा महाबुद्धिः प्रययौ कपिलांतिकम् ॥२६
तमुपागम्य विधिवन्नमस्कृत्य यथामति ।
प्रश्रयावनतो भूत्वा शनैरिदमुवाच ह ॥३०
प्रसीद विप्रशार्दूल त्वामहं शरणं गतः ।
कोपं च संहर क्षिप्रं लोकप्रक्षयकारकम् ॥३१