संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर विनाश वर्णन ] [ ३३
क्रोधाग्निः सुमहाराज ज्वालाव्याप्तदिगंतरः ॥३४ दग्धांश्चकार तान्सर्वानावृण्वानो नभस्तलम् ॥३५
उस समय में कपिल मुनि ने अग्नि मण्डल के समान अपने नेत्रों को खोला था । हे राजन् ! उनकी दोनों आँखें क्षण भर तो अत्यधिक अरुण दिखलाई देती हुईं शोभा वाली हुई थीं ।२९। और वे दोनों नेत्र पूर्व सन्ध्या में समुदित अम्बर में दो पुष्पों के ही सदृश प्रतीत हो रहे थे । इसके अनन्तर ही उन्होंने अपने खुले हुए नेत्रों को उन सब नृप सगर के पुत्रों पर डाला था ।३०। संहार के समय में यमराज के ही तुल्य अत्यन्त गम्भीर मुनि ने नृप सुतों की ओर देखा था । अत्यधिक क्रोध तो समाधि के भङ्ग होने से उनको हो ही रहा था । परम क्रुद्ध उनके नेत्रों से अग्नि की ज्वालायें निकल रही थीं ।३१। और वे ज्वालाएँ कालाग्नि के ही समान दिशाओं में सभी ओर फैली हुई थीं । धूम के समूहों से युक्त वे ज्वालाएँ अत्यन्त आगे की ओर बढ़ रही थीं और बारम्बार उनमें से अग्नि के कण छूटकर निकल रहे थे ।३२। क्रोधाग्नि की ज्वालाओं ने सभी ओर दिशाओं को व्याप्त कर दिया था । उनके नेत्रों से निकलने वाली क्रोधाग्नि की ज्वालाएं कालोदर के उग्र कुहरों वाली थीं तात्पर्य यह है कि ज्वालाओं के मण्डल की ऐसी व्याप्ति हो गयी थी । उस समय में कुहरे के समान कुछ भी दिखलाई नहीं दे रहा था ।३३। हे सुमहाराज ! उनके क्रोधाग्नि की ज्वालाएँ छिपे हुए समुद्र की बड़वाग्नि की ज्वालाओं के ही समान शोभित हो रही थीं और उन कपिल मुनि की क्रोधाग्नि ने सभी दिशाओं के अन्तर को व्याप्त कर रक्खा था वह सर्वत्र फैल गया था ।३४। उस क्रोधाग्नि ने पूर्ण नभ-स्थल को आवृत करते हुए उन समस्त सगर के साठ सहस्र पुत्रों को दग्ध करके भस्मीभूत कर दिया था ।३५।
सशब्दमुद्ध्वांतमरुत्प्रकोपविवर्त्तमानानलधूमजालैः । महीरजोभिश्च नितांतमुद्धतैः समावृतं लोकमभूद् भृशातुरम् ॥३६ ततः स वह्निर्विलिखन्निवाभितः समीरवेगाभि रमीभिरंबरम्। शिखाभिरुर्वीशसुतानशेषतो ददाह सद्यः सुर- विद्विषस्तान् ॥३७ मिषतः सर्वलोकस्य क्रोधाग्निस्तमृते हयम् ।