भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सागरांस्तानशेषेण भस्मसादकरोत्स तान् ॥३८ एवं क्रोधाग्निना तेन सागराः पापचेतसः । जज्वलुः सहसा दावे तरवो नीरसा इव ॥३९ दृष्ट्वा तेषां तु निधनं सागराणां दुरात्मनाम् । अन्योन्यमब्रुवन्देवा विस्मिता ऋषिभिः सह ॥४० अहोदारुणपापानां विपाको न चिरायितः । दुरंतः खलु लोकेऽस्मिन्नराणामसदात्मनाम् ॥४१ यदि मे पर्वताकारा नृशंसाः क्रूरबुद्धयः । युगपद्विलयं प्राप्ताः सहसैव तृणाग्निवत् ॥४२

सरर-सरर करती हुई महाध्वनि से परिपूर्ण बड़ी जोरदार हवा के प्रकोप से चारों ओर फैली हुई अग्नि की धुँआ के गुब्बारों से और अत्यधिक ऊपर की ओर उठकर उड़ती हुई भूमि की धूलि के सम्पूर्ण लोक ढक सा गया था और बहुत ही अधिक लोक में विकलता हो गयी थी।३६। इसके पश्चात् वह अग्नि वायु के वेग से समाहृत शिखाओं से जो घूम-घूम करके ऊपर की ओर उठ रहीं थीं नभस्तत में मानों वे कुछ लिख रहीं होवें चारों ओर फैली हुई थी। उन्होंने उन सुरगण के शत्रु नृप के पुत्रों को पूर्णतया तुरन्त ही प्रदग्ध कर दिया था ।३७। समग्र लोक का विनाश करने वाले उन सगर के पुत्रों का पूर्णतया उस कपिल मुनि की क्रोधाग्नि ने दाह करके राख की ढेरियाँ बना दिया था और उस यज्ञ के अश्व को छोड़ दिया था ।३८। नीरस सूखे हुए वृक्ष तुरन्त ही दाव की अग्नि से जल जाया करते हैं उसी भाँति पुण्य रस विहीन पापात्मा के सगर सुत तुरन्त ही जल गये थे ।३९। इस रीति से उन महान् दुष्ट सगर सुतों का निधन का अवलोकन करके सभी देवगण अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हो गये थे और परस्पर में ऋषियों के साथ एक दूसरे से कहने लगे थे ।४०। अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है कि महान् दारुण पाप करने वालों के पापों का विपाक कितनी शीघ्रता से हो गया है। निश्चय ही इस लोक में जो असत् आत्माओं वाले नर होते हैं उनका अन्त बड़ा ही दुःख से पूर्ण हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि नीचों का विनाश तुरन्त ही अवश्यम्भावी होता है। ।४१। यही बात है कि ये महान् क्रूर बुद्धि वाले निर्दयी जिनका कलेवरा-कार पर्वतों के सदृश था और कितनी अधिक संख्या में थे इस समय में तृण