संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ३६
उसको कहीं पर भी प्राप्त नहीं किया था और वह किस ओर गया है—यह भी बहुत समय तक उनको ज्ञात नहीं हुआ था ।१०। इसके पश्चात् उन्होंने इस वसुन्धरा के नीचे उस अश्व की खोज करने निश्चय किया था। उन आपके पुत्रों ने समारम्भ करके इस वसुधा के तल भाग को खोद डाला था ।११। जब वे लगातार पृथ्वी को खोदते ही चले गये तो हे नृप ! उन्होंने पाताल में उस अश्व को देखा था जिस अश्व के ही समीप में योगीन्द्र महा-मुनि कपिल जी समाधि में स्थित हुए उनको दिखाई दिये थे ।१२। उन महामुनि को वहाँ देखकर पापपूर्ण कर्मों वाले उन सबने काल की गति से प्रेरित होकर उन कपिल देव के ही ऊपर बड़ा कोप किया था और यह ही इस अश्व के हरण करने वाला है—यह कहा था ।१३। इसके अनन्तर उन मुनि को क्रोध उत्पन्न हो गया था और उससे संभूत नेत्रों की अग्नि से जो दशों दिशाओं को दग्ध कर रही थी आपके समस्त पुत्र इन्धन हो गये थे और जल भुनकर उसके देह भस्मीभूत हो गये थे तथा सब नष्ट हो गये थे ।१४।
क्रूराः पापसमाचाराः सर्वलोकोपरोधकाः ।
यतस्ते तेन राजेंद्र न शोकं कर्तुमर्हसि ॥१५
स त्वं धैर्यधनो भूत्वा भवितव्यतयात्मनः ।
नष्टः मृतमतीतं च नानुशोचंति पंडिताः ॥१६
तस्मात्पौत्रमिमं बालमंशुमंतं महामतिम् ।
तुरगानयनार्थाय नियुंक्ष्व नृपसत्तम ॥१७
इत्युक्त्वा राजशार्दूलं सदस्यर्त्विक्समन्वितम् ।
क्षणेन पश्यतां तेषां नारदोऽतर्दधे मुनिः ॥१८
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य नृपोत्तमः ।
दुःखशोकपरीतात्मा दध्यौ चिरमुदारधीः ॥१९
तं ध्यानयुक्तं सदसि समासीनमवाङ्मुखम् ।
वसिष्ठः प्राह राजानं सांत्वयन्देशकालवित् ॥२०
किमिदं धैर्यसाराणामवकाशं भवादृशाम् ।
लभते हृदि चेच्छोकः प्राप्तं धीरतया फलम् ॥२१