संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वे सब आपके पुत्र अत्यन्त क्रूर थे—पाप कर्मों का समाचरण करने वाले तथा समस्त लोकों के उपरोधक थे। क्योंकि ऐसे ही जघन्य थे अतः हे राजेन्द्र ! अब आप उनके लिए शोक करने के योग्य नहीं हैं ।१५। आप तो धैर्य को ही धन मानने वाले हैं अतएव आपको धीरज की रक्षा करनी चाहिए। जो भी कुछ भवितव्यता होती है तथा नष्ट हो जाता है और व्यतीत हो जाता है उसको पण्डित लोग नहीं सोचा करते हैं ।१६। इस कारण से अब इस अपने अंशुमान् पौत्र को जो महान् मतिमान् है हे नृप श्रेष्ठ ! उस अश्व को लाने के कार्य में नियुक्त करो ।१७। समस्त सदस्य और ऋत्विजों से युक्त उस नृप शार्दूल से यही कहकर सभी के देखते हुए एक ही क्षण में नारदजी अन्तर्धान हो गये थे ।१८। फिर उस राजा ने नारदजी के कहे हुए उन वचनों का श्रवण करके भी महान् दुःख और शोक से पूर्णतया घिरा हुआ होकर उस उदार बुद्धि वाले ने बहुत काल तक चिन्तन किया था ।१६। उस समय में राजा सभा में नीचे की ओर मुख वाला होकर बैठे हुए थे। उसी समय में देश और काल के ज्ञाता वसिष्ठजी ने आकर राजा को सान्त्वना देते हुए कहा था ।२०। आप तो धैर्य को बहुत महत्त्व देने वाले हैं फिर आप जैसे महान् पुरुषों को यह ऐसा अवसर क्यों प्राप्त हो रहा है। यदि आपके हृदय में भी शोक ने स्थान ग्रहण कर लिया है तो धीरता से क्या फल होता है। अर्थात् फिर तो धैर्य व्यर्थ ही है ।२१।
दौर्मनस्यं शिथिलयन्सर्वं दिष्टवशानुगम् ।
मन्वानोऽनन्तरं कृत्यं कर्तुमर्हस्यसंशयम् ॥२२
वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु राजा कार्यार्थतत्त्ववित् ।
धृतिं सत्त्वं समालंब्य तथेति प्रत्यभाषत ॥२३
अंशुमंतं समाहूय पौत्रं विनयशालिनम् ।
ब्रह्म क्षत्रसभामध्ये शनैरिदमभाषत ॥२४
ब्रह्मदंडहताः सर्वे पितरस्तव पुत्रक ।
पतिताः पापकर्माणो निरये शाश्वतीः समाः ॥२५
त्वमेव संततिर्मह्यं राज्यस्यास्य च रक्षिता ।
त्वदायत्तमशेषं मे श्रेयोऽमुत्र परत्र च ॥२६
स त्वं गच्छ ममादेशात्पाताले कपिलांतिकम् ।