संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
त्वयि क्रुद्धे जगत्सर्वं प्रकाशमुपयास्यति ।
प्रशांतिमुपयाह्याशु लोकाः संतु गतव्यथाः ॥३२
प्रसन्नोऽस्मान्महाभाग पश्य सौम्येन चक्षुषा ।
ये त्वत्क्रोधाग्निनिर्दग्धास्तत्संततिमवेहि माम् ॥३३
नाम्नांशुमंतं नप्तारं सगरस्य महीपतेः ।
सोऽहं तस्य नियोगेन त्वत्प्रसादाभिकांक्षया ॥३४
प्राप्तो दास्यसि चेद्ब्रह्मंस्तुरगानयनाय च ।
जैमिनिरुवाच—
इति तद्वचनं श्रुत्वा योगींद्रप्रवरो मुनिः ॥३५
जैमिनि मुनि ने कहा—जब राजा के द्वारा अपने पौत्र अंशुमान् से इस प्रकार से कहा गया था तो महान् बुद्धिमान उसने पिता के पिता को प्रणाम किया था ओर मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर वह कपिल मुनि के समीप में चला गया था ।२६। उसके समीप में प्राप्त होकर उसने विधि के साथ उनके प्रणाम किया था और फिर बुद्धि के अनुसार विनम्रता से अवनत होकर धीरे से उनसे कहा था ।३०। हे विप्रशार्दूल ! मुझ पर कृपया प्रसन्न होइए—मैं तो आपके चरणों की शरण में समागत हुआ हूँ । आपके हृदय में जो कोप समुत्पन्न हो गया है उसका संहरण शीघ्र ही कर लीजिए क्योंकि आपका यह कोप समस्त लोकों के विनाश कर देने वाला है ।३१। आपके क्रुद्ध हो जाने पर तो यह समग्र जगत विनाश को ही प्राप्त हो जायगा । अब आप प्रशान्ति को शीघ्र प्राप्त हो जाइए । जिससे इन सब लोकों की व्यथा दूर हो जावे ।३२। हे महाभाग ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइए । सौम्य नेत्रों से हमको देखिए । जो आपके क्रोध की अग्नि से संदग्ध हो गये हैं उन्हीं की सन्तति मुझे आप समझिए ।३३। मेरा नाम अंशुमान है और मैं राजा सगर का नाती हूँ । वह मैं राजा के ही नियोग से आपकी प्रसन्नता की अभिकांक्षा से ही मैं यहाँ पर समागत हुआ हूँ ।३४। मैं तो उस यज्ञ के अश्व के ले जाने के ही लिए आया हूँ यदि कृपा कर मुझे देंगे । जैमिनि मुनि ने कहा—उस अंशुमान के इस वचन को सुनकर योगीन्द्र प्रवर मुनि ने अंशुमान का अवलोकन किया और परम प्रसन्न होकर यह वचन उससे कहा था ।३५।