संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४३
अंशुमंतं समालोक्य प्रसन्न इदमब्रवीत् । स्वागतं भवतो वत्स दिष्ट्या च त्वमिहागतः ॥३६ गच्छ शीघ्रं हयश्चायं नीयतां सगरांतिकम् । अधिक्षिप्तोऽस्य यज्ञोऽपि प्रागतः संप्रवर्त्तताम् ॥३७ व्रियतां च वरो मत्तस्त्वया यस्ते मनोगतः । दास्ये सुदुर्लभमपि त्वद्भक्तिपरितोषितः ॥३८ एषां तु संप्रणाशं हि गत्वा वद पितामहम् । पापानां मरणं त्वेषां न च शोचितुमर्हसि ॥३९ ततः प्रणम्य योगींद्रमंशुमानिदमब्रवीत् । वरं ददासि चेन्मह्यं वरये त्वां महामुने ॥४० वरमर्हामि चेत्त्वत्तः प्रसन्नो दातुमर्हसि । त्वद्रोषपावकप्लुष्टाः पितरो ये ममाखिलाः ॥४१ संप्रयास्यंति ते ब्रह्मन्निरयं शाश्वतीः समाः । ब्रह्मदंडहतानां तु न हि पिंडोदकक्रियाः ॥४२
हे वत्स ! आपका स्वागत है । बड़े ही हर्ष की बात है कि आप यहाँ पर आ गये हो ।३६। अब बहुत शीघ्र जाओ यह अश्व राजा सगर के समीप में ले जाओ । पूर्व से ही संप्रवृत्त हुआ इस राजा का यज्ञ रुक गया है उसको पूर्ण करो ।३७। और आपके मन में जो भी कुछ हो वह वरदान अब मुझसे प्राप्त कर लो । मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही परितुष्ट हो गया हूँ यदि तुम्हारा वर परम दुर्लभ भी होगा तो भी मैं तुमको दे ही दूँगा ।३८। अब तुम इन साठ सहस्र नृप के पुत्रों का विनाश हो गया है—यह राजा से कह देना । ये महान पापी थे अतः इनके मरण के विषय में राजा से कह देना कि कोई शोक न करें ।३९। फिर उन योगीन्द्र मुनि को प्रणाम करके अंशुमान ने उनसे यह कहा था । हे मुने ! आप यदि मुझको वरदान देने की इच्छा करते हैं तो मैं आपसे वर का वरण करूँ ।४०। यदि मैं वर पाने के योग्य हूँ तो आपसे वरदान प्राप्त करूँ किन्तु वह वरदान आप सुप्रसन्न होकर ही मुझे दीजिए । आपके रोष की अग्नि से मेरे सभी पितृगण संप्लुष्ट हो गये हैं ।४१। हे ब्रह्मन् ! क्योंकि उन्होंने आपका महान अपराध किया