संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ने कहा—इसके अनन्तर उस महामति ने—ऐसा ही करूंगा—यह कहकर उनको भक्ति से प्रणाम किया था और उनकी आज्ञा प्राप्त कर साकेत नगरी की ओर वहाँ से गमन किया था ।५४। राजा सगर के समीप में पहुँच कर उसने क्रमानुसार उनको प्रणाम किया था और फिर उन सबका—मुनि का और अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त राजा से निवेदन कर दिया था ।५५। और वह अश्व भी राजा को दे दिया था । जिसको वह बड़े प्रयत्न से लाया था । फिर राजा की सेवा में प्रार्थना की थी कि अब आगे मुझे क्या सेवा करनी चाहिए—यह अपनी आज्ञा प्रदान कीजिए ।५६।
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।। अंशुमान को राज्य प्राप्ति ।।
जैमिनिरुवाच— ततः पौत्रं परिष्वज्य सगरः प्रेमविह्वलः । अभिनंद्याशिषात्यर्थं लालयन्प्रशंस ह ॥१॥ अथ ऋत्विक्सदस्यैश्च सहितो राजसत्तमः । उपाक्रमत तं यज्ञं विधिवद्वेदपारगः ॥२॥ ततः प्रवृत्ते यज्ञः सर्वसंपद्गुणान्वितः । सम्यगौर्ववसिष्ठाद्यैर्मुनिभिः संप्रवर्त्तितः ॥३॥ हिरण्मयमयी वेदिः पात्राण्युच्चावचानि च । सुसमृद्धं यथाशास्त्रं यज्ञे सर्वं बभूव ह ॥४॥ एवं प्रवर्त्तितं यज्ञमृत्विजः सर्व एव ते । क्रमात्समापयामासुर्यजमानपुरस्सराः ॥५॥ समापयित्वा तं यज्ञं राजा विधिविदां वरः । यथावद्दक्षिणां चैव ऋत्विजां प्रददौ तदा ॥६॥ अथ ऋत्विक्सदस्यानां ब्राह्मणानां तथार्थिनाम् । तत्कांक्षितादभ्यधिकं प्रददौ वसु सर्वशः ॥७॥