भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४७

जैमिनी मुनि ने कहा—इसके अनन्तर राजा सगर ने प्रेम से विह्वल होकर अपने पौत्र का परिष्वजन किया था और अत्यधिक आशीर्वचनों से उसका अभिनन्दन करके बहुत ही अधिक लाड़ करते हुए उसकी प्रशंसा की थी ।१। इसके उपरान्त सब ऋत्विजों और सदस्यों के सहित उस नृप श्रेष्ठ ने वेदों के पारगामी विप्रों के द्वारा उस यज्ञ का विधि सहित उपक्रम किया था ।२। इसके अनन्तर सब प्रकार की सम्पत्ति और गुणों से संयुत वह यज्ञ आरम्भ हुआ था जिसका समारम्भ और्व और वसिष्ठ आदि मुनियों के द्वारा भली भांति सम्प्रवर्तित किया गया था ।३। उस यज्ञ की वेदी सुवर्ण से निर्मित की गयी थी तथा उसके उपयुक्त सभी छोटे-बड़े पात्र अत्युत्तम जुटाये गये थे । उस यज्ञ में शास्त्र के अनुसार सभी वस्तुएं सुसमृद्ध थीं ।४ इस प्रकार से आरम्भ किया हुआ वह यज्ञ था जिसको सभी ऋत्विजों ने किया था और यजमान के साथ उन्होंने उसको समाप्त किया था।५। विधि के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ राजा ने उस यज्ञ को समाप्त कराकर उसी समय में ऋत्विजों के लिए उचित दक्षिणा दी थी ।६। इसके उपरान्त ऋत्विज-सदस्य-ब्राह्मण तथा याचकों के लिए सबको जो भी उनका आकांक्षित था उस से अधिक धन दिया था ।७।

एवं संतर्प्य विप्रादीन्दक्षिणाभिर्यथाक्रमम् ।
क्षमापयामास गुरून्सदस्यान्प्रणिपत्य च ॥८
ब्राह्मणैस्ततो वर्णैऋत्विग्भिश्च समन्वितः ।
वारकीयाकदंबैश्च सूतमागधवंदिभिः ॥९
अन्वीयमानः सस्त्रीकः श्वेतच्छत्रविराजितः ।
दोधूयमानचमरो बालव्यजनराजितः ॥१०
नानावादित्रनिर्घोषैर्बधिरीकृतदिङ्मुखः ।
स गत्वा सरयूतीरं यथाशास्त्रं यथाविधि ॥११
चकारावभृथस्नानं मुदितः सह बन्धुभिः ।
एवं स्नात्वा सपत्नीकः सुहृद्भिर्ब्राह्मणैः सह ॥१२
वीणावेणुमृदंगादिनानावादित्रनिःस्वनैः ।
मंगल्यैर्वेदघोषैश्च सह विप्रजनेरितैः ॥१३