भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

संस्तूयमानः परितः सूतमागधबंदिभिः । प्रविवेश पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनायुताम् ॥१४

इस प्रकार से विप्रगण आदि की दक्षिणाओं से भली-भाँति तृप्ति करके क्रम के अनुसार गुरुवर्गों को और सदस्यों को प्रणिपात करके उनसे क्षमा की याचना की थी ।८। फिर वह राजा शोभा यात्रा के स्वरूप में सरयू के तट पर गया था । उसके साथ ब्राह्मण आदि सभी वर्णों वाले लोग तथा ऋत्विज गण थे और जो मार्ग में रोकथाम करने वाले लोग थे उनके भी समूह और सूत—मागध और बन्दी जन भो थे ।६। इन सब को साथ में लेकर अपनी पत्नियों के सहित राजा वहाँ से चला था जिसके ऊपर श्वेत छत्र शोभित था । उसके दोनों ओर चमर ढुलाये जा रहे थे तथा बाल व्यजन भी किये जा रहे थे ।१०। अनेक वाद्य उस समय बजाये जा रहे थे जिनकी तुमुल ध्वनि से सभी दिशाओं कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था । इस रीति से वह शास्त्र के कथनानुसार विधिपूर्वक सरयू पर प्राप्त हो गया था ।११। समस्त बन्धु-बान्धवों के साथ परम प्रसन्न होकर अवभृथ अर्थात् यज्ञान्त स्नान राजा ने किया था । इस रीति के पत्नियों के सहित सुहृद्गण और विप्रों के साथ स्नान करके वहाँ से राजा वापिस चला था ।१२। उस समय में वीणा-वेणु-मृदङ्ग आदि अनेक बाजे रहे थे और माङ्गलिक वेद-मन्त्रों की भी ध्वनि हो रही थी जिन मन्त्रों को ब्राह्मण बोल रहे थे ।१३। सूत-मागध और बन्दीजन सभी ओर से संस्तवन कर रहे थे । इस रीति से हृष्ट-पुष्टजनों से समन्वित अपनी सुरम्यपुरी में राजा ने प्रवेश किया था ।१४।

श्वेतव्यजनसच्छत्रपताकाध्वजमालिनीम् । सिक्तसंमृष्टभूभागापणशोभासमन्विताम् ॥१५ कैलासाद्रिप्रकाशाभिरुज्ज्वलां सौधपक्तिभिः । स तत्रागरुधूपोत्थगंधामोदितदिङ्मुखम् ॥१६ विकीर्यमाणः परितः पौरनारीजनैर्मुहुः । लाजवर्षेण सानंदं वीक्षमाणश्च नागरैः ॥१७ उपदाभिरनेकाभिस्तत्र तत्र वणिग्जनैः । संभाव्यमानः शनकैर्जगाम स्वपुरं प्रति ॥१८