संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४६
स प्रविश्य गृहं रम्यं सर्वमंडलमंडितम् । सम्यक्संभावयामास सुहृदो ब्राह्मणानपि ॥१९ संसेव्यमानश्च तदा नानादेशेश्वरैर्नृपैः । सभायां राजशार्दूलो रेमे शक्र इवापरः ॥२० एवं सुहृद्भिः सहितः पूरयित्वा मनोरथम् । सगरः सह भार्याभ्यां रेमे नृपवरोत्तमः ॥२१
उस पुरी की शोभा का वर्णन किया जाता है कि उसमें सर्वत्र छत्र पताका-ध्वजाओं की मालायें दिखाई दे रही थीं सर्वत्र पुरी का भूभाग संमार्जित तथा संसिक्त था और उसमें दुकान और बाजारों की भी अतीव अद्भुत शोभा हो रही थी ।१५। उस पुरी में बड़े-बड़े भवनों की की पंक्तियां थी जो बहुत ही ऊँचे थे और जिनमें प्रकाश हो रहा था । वे ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों उज्ज्वल कैलाश गिरि के शिखर हों । वहाँ पर अगुरु की धूप की गन्ध चारों ओर फैल रही थी जिससे सभी दिशाओं के मुख आमोदित हो रहे थे ।१६। नगर निवासिनी नारियों का समुदाय सभी ओर बारम्बार खीलों की वर्षा राजा के ऊपर कर रहा था और नगर निवासी पुरुष बड़े आनन्द के साथ राजा का मुखावलोकन कर रहे थे ।१७। साकेत पुरी के वणिग्जन अपनी भेंटें लेकर जो अनेक प्रकार की थी जहाँ-तहाँ पर राजा का सम्मान कर रहे थे । इस रीति से राजा धीरे-धीरे अपने पुर की ओर गये थे ।१८। उस नृप ने सभा मण्डलों से मण्डित अपने सुरम्य गृह में प्रवेश किया था ओर वहाँ पर अपने सुहृदों का तथा ब्राह्मणों का भली भाँति सत्कार-समादर किया था ।१९। वहाँ पर अनेक देशों के नृप उस समय में विद्यमान थे और उनके द्वारा राजा का पूर्ण सेवा-सम्मान किया गया था । वह राजाशार्दूल अपनी सभी में दूसरे इन्द्र के ही समान रमण किया करता था ।२०। इस प्रकार से सुहृदों के सहित नृप नरोत्तम सगर ने मनोरथ को पूर्ण किया था और वह अपनी दोनों भार्याओं के साथ रमण किया करता था ।२१।
अंशुमन्तं ततः पौत्रं मुदा विनयशालिनम् । वसिष्ठानुमते राजा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥२२ पौरजानपदानां तु बंधूनां सुहृदामपि ।