संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स प्रियोऽभवदत्यर्थमुदारैश्च गुणैर्नृपः ॥२३ प्रजास्तमन्वरज्यंत बालमप्यमितौजसम् । नवं च शुक्लपक्षादौ शीतांशुमचिरोदितम् ॥२४ स तेन सहितः श्रीमान्सुहृद्भिश्च नृपोत्तमः । भार्याभ्यामनुरूपाभ्यां रममाणोऽवसच्चिरम् ॥२५ युवैव राजशार्दूलः साक्षाद्धर्म इवापरः । पालयामास वसुधां सशैलवनकाननाम् ॥२६ एवं महानहिमदीधितिवंशमौलिरत्नायामानवपुरुत्तर- कोसलेशः । पूर्णेन्दुवत्सकललोकमनोऽभिरामः सार्द्धं प्रजाभिरखिलाभिरलं जहर्ष ॥२७
इसके अनन्तर राजा सगर ने अपने विनयशील अंशुमान् पौत्र को बसिष्ठ मुनि की अनुमति प्राप्त करने पर यौवराज्य पद पर बड़ी प्रसन्नता से अभिषिक्त कर दिया था ।२२। वह नृप अपने अत्यन्त उदार गुण गणों से पुरवासी जनपद निवासी-बन्धुगण और सुहृदों का भी सबका परम प्रिय हो गया था ।२३। जिस तरह से शुक्ल पक्ष के आदि में अचिरोदित अर्थात् तुरन्त ही उगे हुए चन्द्रमा को जो कि नवीन होता है सभी उसका दर्शन करके परम प्रसन्न हुआ करते हैं ठीक उसी भाँति से वह राजा बालक था और अपरिमित ओज से समन्वित था अतः उसको बहुत प्यार किया करती थी ।२४। वह उत्तम नृप सगर भी श्री से सुसम्पन्न उस नवीन राजा के साथ मित्रों के सहित अपनी अनुरूप दोनों भार्याओं के साथ रमण करता हुआ वहाँ पर निवास किया करता था ।२५। यद्यपि वह राजाशार्दूल युवा ही था किन्तु साक्षात् दूसरे धर्म के ही समान था । उसने पर्वतों और काननों के सहित पृथ्वी का पालन किया था ।२६। इस प्रकार से सूर्यवंश के शिरोमणि रत्न के सदृश वपु वाला महान् उत्तर कोसल का स्वामी राजा अंशुमान पूर्ण चन्द्र के समान सभी लोकों में परम सुन्दर अपनी सब प्रजाओं के साथ परमाधिक प्रसन्न हुआ था ।२७।