भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५१

गंगा का पृथ्वी पर आगमन

जैमिनिरुवाच-
एतत्ते चरितं सर्वं सगरस्य महात्मनः ।
संक्षेपविस्तराभ्यां तु कथितं पापनाशनम् ॥१
खंडोऽयं भारतो नाम दक्षिणोत्तरमायतः ।
नवयोजनसाहस्रं विस्तारपरिमंडलम् ॥२
पुत्रैस्तस्य नरेंद्रस्य मृगयद्भिस्तुरंगमम् ।
योजनानां सहस्रं तु खात्वाष्टौ विनिपातिताः ॥३
सगरस्य सुतैैर्यस्माद्वर्द्धितो मकरालयः ।
ततः प्रभृति लोकेषु सागराख्यामवाप्तवान् ॥४
ब्रह्म पादावधि महीं सतीर्थक्षेत्रकाननाम् ।
अब्धिः संक्रमयोमास परिक्षिप्य निजांभसा ॥५
ततस्तन्निलयाः सर्वे सदेवासुरमानवाः ।
इतस्ततश्च संजाता दुःखेन महतान्विताः ॥६
गोकर्ण नाम विख्यातं क्षेत्रं सर्वसुरार्चितम् ।
सार्द्धयोजनविस्तारं तीरे पश्चिमवारिधेः ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—हमने यह महात्मा सगर का सम्पूर्ण चरित संक्षेप तथा विस्तार से आपके सामने कहकर सुना दिया है जो कि पापों का विनाश कर देने वाला है ।१। यह दक्षिण से उत्तर पर्यन्त भारत खण्ड है । इसके विस्तार का परिमण्डल नौ सहस्र योजन होता है ।२। उस नरेन्द्र के पुत्रों ने उस यज्ञ के अश्व की खोज करते हुए एक सहस्र योजन खोदकर आठ ही विनिपातित किये हैं ।३। क्योंकि सगर के पुत्रों के द्वारा वह समुद्र बढ़ा दिया गया है । तभी से लेकर इसका सागर यह नाम प्राप्त हो गया है ।४। तीर्थों और काननों तथा क्षेत्रों के सहित ब्रह्म पाद की अवधि तक इस मही को समुद्र ने अपने जल से परिक्षिप्त करके संक्रामित कर दिया था ।५। फिर सब निलय-देव-असुर और मानव महान् दुःख से संयुत होते हुए इधर-उधर हो गये थे ।६। पश्चिम समुद्र के तट पर हुए योजन विस्तार वाला गोकर्ण नामक क्षेत्र विख्यात था जो सभी सुरों के द्वारा अर्चित था ।७।