संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तत्रासंख्यानि तीर्थानि मुनिदेवालयाश्च वै । वसंति सिद्धसंघाश्च क्षेत्रे तस्मिन्पुरा नृप ॥८ क्षेत्रं तल्लोकविख्यातं सर्वपापहरं शुभम् । तत्तीर्थमब्धेरपतद्भागे दक्षिणपश्चिमे ॥६ यत्र सर्वे तपस्तप्त्वा मुनयः शंसितव्रताः । निर्वाणं परमं प्राप्ताः पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥१० तत्क्षेत्रस्य प्रभावेण प्रीत्या भूतगणैः सह । देव्या च सकलैर्देवैर्नित्यं वसति शंकरः ॥११ एनांसि यत्समुद्दिश्य तीर्थयात्रां प्रकुर्वताम् । नृणामाशु प्रणश्यंति प्रवाते शुष्कपर्णवत् ॥१२ तत्क्षेत्रसेवनरतिर्नैव जात्वभिजायते । समीपे वसमानानामपि पुंसां दुरात्मनाम् ॥१३ महता सुकृतेनैव तत्क्षेत्रगमने रतिः । नृणां संजायते राजन्नान्यथा तु कथंचन ॥१४
हे नृप ! पहिले वहां पर उस क्षेत्र में अगणित तीर्थ मुनियों और देवों के आलय और सिद्धों के संघ निवास किया करते थे ।८। वह क्षेत्र लोक में विख्यात था और परम शुभ समस्त पापों के हरण करने वाला था । वह तीर्थ समुद्र के दक्षिण भाग में गिर गया था ।६। जहाँ पर सब मुनिगण तपश्चर्या करके संशित व्रत वाले हुए थे और वे सब निर्वाण पद को प्राप्त हो गये थे जिस पद पर पहुँच कर इस लोक में पुनः आवृत्ति नहीं होती है ।१०। उस क्षेत्र का ऐसा प्रभाव था कि उसी के कारण से भगवान् शङ्कर बड़ी ही प्रीति से अपनी प्रिया देवी-सकल देवगण और भूत गणों के साथ निवास किया करते हैं ।११। इसी का उद्देश्य करके तीर्थ यात्रा करने वाले मनुष्यों के समस्त अघ तेज वायु में शुष्क पुत्रों के ही समान शीघ्र ही विनष्ट हो जाया करते हैं ।१२। जो उसके समीप में ही निवास करने वाले दुरात्मा मनुष्य होते हैं और वहीं पर निवासी हैं उनको कभी भी उस क्षेत्र के सेवन करने की रति नहीं हुआ करती है ।१३। हे राजन् यह एक महान् सुकृत हो तभी उस क्षेत्र के गमन में रति हुआ करती है । यदि कोई महान् पुण्यों का