भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५३

उदय नहीं तो फिर मानवों के हृदय में किसी भी प्रकार से उस क्षेत्र के सेवन करने की रति समुत्पन्न नहीं हुआ करती है ।१४।

निबंधेन तु ये तस्मिन्प्राणिनः स्थिरजंगमाः ।
म्रियंते नृप सद्यस्ते स्वर्गं प्राप्स्यंति शाश्वतम् ॥१५
स्मृत्याऽपि सकलैः पापैर्यस्य मुच्येत मानवः ।
क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं सर्वतीर्थनिकेतनम् ॥१६
स्नात्वा चैतेषु तीर्थेषु यजंतश्च सदाशिवम् ।
सिद्धिकामा वसंति स्म मुनयस्तत्र केचन ॥१७
कामक्रोधविनिर्मुक्ता ये तस्मिन्वीतमत्सराः ।
निवसंत्यचिरेणैव तत्सिद्धिं प्राप्नुवंति हि ॥१८
जपहोमरताः शांता नियता ब्रह्मचारिणः ।
वसंति तस्मिन्ये ते हि सिद्धिं प्राप्स्यंत्यभीप्सिताम् ॥१९
दानहोमजपाद्यं वै पितृदेवद्विजार्चनम् ।
अन्यस्मात्कोटिगुणितं भवेत्तस्मिन्फलं नृप ॥२०
अंभोधिसलिले मग्ने तस्मिन् क्षेत्रेऽतिपावने ।
महता तपसा युक्ता मुनयस्तन्निवासिनः ॥२१

हे नृप ! जो स्थावर या जंगम प्राणी निर्बन्ध होने के कारण से वहां पर अपना प्राण परित्याग किया करते हैं वे तुरन्त ही शाश्वत स्वर्ग की प्राप्ति कर लिया करते हैं। यद्यपि स्वर्ग का निवास सावधिक होता है और पुण्य क्षीण हो जाने पर वहां से हटना होता है परन्तु इस क्षेत्र के प्रभाव से सदा ही स्वर्ग निवास होता है ।१५। इसकी ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि इसकी स्मृति भी कोई कर लेवे तो स्मरण मात्र से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाया करता है । यह सभी क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है और सब तीर्थों का निकेतन है ।१६। कुछ मुनिगण तो इन तीर्थों में स्नान करके सदा ही शिव का यजन करते हुए सिद्धि की कामना वाले यहां पर निवास किया करते थे ।१७। जो मनुष्य काम और क्रोध से रहित होकर मत्सरता को त्याग कर उसमें निवास किया करते हैं वे थोड़े ही समय में सिद्धि को प्राप्त