भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कर लिया करते हैं।१८। मन्त्रों के जाप करने तथा हवन करने में जो निरत रहते हुए परम शान्त-नियत तथा ब्रह्मचर्य पालन करने वाले इसमें निवास करते हैं वे भी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर लिया करते हैं।१९। हे नृप ! दान-होम-जप और पितृगण तथा देवगण एवं द्विजों का अर्चन आदि सभी धार्मिक कृत्यों का फल इसमें करने से अन्य स्थल से करोड़ों गुना अधिक हुआ करता है ।२०। अति पावन उस क्षेत्र के समुद्र के जल में निमग्न हो जाने पर जो मुनिगण अपने महान् तप से युक्त थे और वहाँ पर निवास किया करते थे वे पर्वत पर चले गये थे ।२१।

सह्यं शिखरिणं श्रेष्ठं निलयार्थं समारुहन् ।
वसन्तस्तत्र ते सर्वे संप्रधार्य परस्परम् ॥२२
महेंद्राद्रौ तपस्यंतं रामं गन्तुं प्रचक्रमुः ।
राजोवाच-
अगस्त्यपीततोयेऽब्धौ परितो राजनंदनैः ॥२३
खात्वाधः पातिते क्षेत्रे सतीर्थश्रमकानने ।
भूभागेषु तथान्येषु पुरग्रामाकरादिषु ॥२४
विनाशितेषु देशेषु समुद्रोपांतवर्त्तिषु ।
किमकार्षुर्मु निश्रेष्ठ जनास्तन्निलयास्ततः ॥२५
तत्रैव चावसन्कृच्छात्प्रस्थितान्यत्र वा ततः ।
कियता चैव कालेन संपूर्णोऽभूदपां निधिः ।
केन वापि प्रकारेण ब्रह्मन्नेतद्वदस्व मे ॥२६
जैमिनिरुवाच-
अनूपेषु प्रदेशेषु नाशितेषु दुरात्मभिः ॥२७
जनास्तन्निलयाः सर्वे संप्रयाता इतस्ततः ।
तत्रैव चावसन्कृच्छात्केचित्क्षेत्रनिवासिनः ॥२८

उन्होंने परम श्रेष्ठ सह्य पर्वत पर निवास के लिए समारोहण किया था। वहाँ पर ही सब निवास करने लगे थे और उन्होंने परस्पर में निश्चय किया था ।२२। महेन्द्र पर्वत पर जो राम तपस्या कर रहे थे वहाँ पर गमन