भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

अंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४६

स प्रविश्य गृहं रम्यं सर्वमंडलमंडितम् । सम्यक्संभावयामास सुहृदो ब्राह्मणानपि ॥१९ संसेव्यमानश्च तदा नानादेशेश्वरैर्नृपैः । सभायां राजशार्दूलो रेमे शक्र इवापरः ॥२० एवं सुहृद्भिः सहितः पूरयित्वा मनोरथम् । सगरः सह भार्याभ्यां रेमे नृपवरोत्तमः ॥२१

उस पुरी की शोभा का वर्णन किया जाता है कि उसमें सर्वत्र छत्र पताका-ध्वजाओं की मालायें दिखाई दे रही थीं सर्वत्र पुरी का भूभाग संमार्जित तथा संसिक्त था और उसमें दुकान और बाजारों की भी अतीव अद्भुत शोभा हो रही थी ।१५। उस पुरी में बड़े-बड़े भवनों की की पंक्तियां थी जो बहुत ही ऊँचे थे और जिनमें प्रकाश हो रहा था । वे ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों उज्ज्वल कैलाश गिरि के शिखर हों । वहाँ पर अगुरु की धूप की गन्ध चारों ओर फैल रही थी जिससे सभी दिशाओं के मुख आमोदित हो रहे थे ।१६। नगर निवासिनी नारियों का समुदाय सभी ओर बारम्बार खीलों की वर्षा राजा के ऊपर कर रहा था और नगर निवासी पुरुष बड़े आनन्द के साथ राजा का मुखावलोकन कर रहे थे ।१७। साकेत पुरी के वणिग्जन अपनी भेंटें लेकर जो अनेक प्रकार की थी जहाँ-तहाँ पर राजा का सम्मान कर रहे थे । इस रीति से राजा धीरे-धीरे अपने पुर की ओर गये थे ।१८। उस नृप ने सभा मण्डलों से मण्डित अपने सुरम्य गृह में प्रवेश किया था ओर वहाँ पर अपने सुहृदों का तथा ब्राह्मणों का भली भाँति सत्कार-समादर किया था ।१९। वहाँ पर अनेक देशों के नृप उस समय में विद्यमान थे और उनके द्वारा राजा का पूर्ण सेवा-सम्मान किया गया था । वह राजाशार्दूल अपनी सभी में दूसरे इन्द्र के ही समान रमण किया करता था ।२०। इस प्रकार से सुहृदों के सहित नृप नरोत्तम सगर ने मनोरथ को पूर्ण किया था और वह अपनी दोनों भार्याओं के साथ रमण किया करता था ।२१।

अंशुमन्तं ततः पौत्रं मुदा विनयशालिनम् । वसिष्ठानुमते राजा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥२२ पौरजानपदानां तु बंधूनां सुहृदामपि ।

५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स प्रियोऽभवदत्यर्थमुदारैश्च गुणैर्नृपः ॥२३ प्रजास्तमन्वरज्यंत बालमप्यमितौजसम् । नवं च शुक्लपक्षादौ शीतांशुमचिरोदितम् ॥२४ स तेन सहितः श्रीमान्सुहृद्भिश्च नृपोत्तमः । भार्याभ्यामनुरूपाभ्यां रममाणोऽवसच्चिरम् ॥२५ युवैव राजशार्दूलः साक्षाद्धर्म इवापरः । पालयामास वसुधां सशैलवनकाननाम् ॥२६ एवं महानहिमदीधितिवंशमौलिरत्नायामानवपुरुत्तर- कोसलेशः । पूर्णेन्दुवत्सकललोकमनोऽभिरामः सार्द्धं प्रजाभिरखिलाभिरलं जहर्ष ॥२७

इसके अनन्तर राजा सगर ने अपने विनयशील अंशुमान् पौत्र को बसिष्ठ मुनि की अनुमति प्राप्त करने पर यौवराज्य पद पर बड़ी प्रसन्नता से अभिषिक्त कर दिया था ।२२। वह नृप अपने अत्यन्त उदार गुण गणों से पुरवासी जनपद निवासी-बन्धुगण और सुहृदों का भी सबका परम प्रिय हो गया था ।२३। जिस तरह से शुक्ल पक्ष के आदि में अचिरोदित अर्थात् तुरन्त ही उगे हुए चन्द्रमा को जो कि नवीन होता है सभी उसका दर्शन करके परम प्रसन्न हुआ करते हैं ठीक उसी भाँति से वह राजा बालक था और अपरिमित ओज से समन्वित था अतः उसको बहुत प्यार किया करती थी ।२४। वह उत्तम नृप सगर भी श्री से सुसम्पन्न उस नवीन राजा के साथ मित्रों के सहित अपनी अनुरूप दोनों भार्याओं के साथ रमण करता हुआ वहाँ पर निवास किया करता था ।२५। यद्यपि वह राजाशार्दूल युवा ही था किन्तु साक्षात् दूसरे धर्म के ही समान था । उसने पर्वतों और काननों के सहित पृथ्वी का पालन किया था ।२६। इस प्रकार से सूर्यवंश के शिरोमणि रत्न के सदृश वपु वाला महान् उत्तर कोसल का स्वामी राजा अंशुमान पूर्ण चन्द्र के समान सभी लोकों में परम सुन्दर अपनी सब प्रजाओं के साथ परमाधिक प्रसन्न हुआ था ।२७।

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५१

गंगा का पृथ्वी पर आगमन

जैमिनिरुवाच-
एतत्ते चरितं सर्वं सगरस्य महात्मनः ।
संक्षेपविस्तराभ्यां तु कथितं पापनाशनम् ॥१
खंडोऽयं भारतो नाम दक्षिणोत्तरमायतः ।
नवयोजनसाहस्रं विस्तारपरिमंडलम् ॥२
पुत्रैस्तस्य नरेंद्रस्य मृगयद्भिस्तुरंगमम् ।
योजनानां सहस्रं तु खात्वाष्टौ विनिपातिताः ॥३
सगरस्य सुतैैर्यस्माद्वर्द्धितो मकरालयः ।
ततः प्रभृति लोकेषु सागराख्यामवाप्तवान् ॥४
ब्रह्म पादावधि महीं सतीर्थक्षेत्रकाननाम् ।
अब्धिः संक्रमयोमास परिक्षिप्य निजांभसा ॥५
ततस्तन्निलयाः सर्वे सदेवासुरमानवाः ।
इतस्ततश्च संजाता दुःखेन महतान्विताः ॥६
गोकर्ण नाम विख्यातं क्षेत्रं सर्वसुरार्चितम् ।
सार्द्धयोजनविस्तारं तीरे पश्चिमवारिधेः ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—हमने यह महात्मा सगर का सम्पूर्ण चरित संक्षेप तथा विस्तार से आपके सामने कहकर सुना दिया है जो कि पापों का विनाश कर देने वाला है ।१। यह दक्षिण से उत्तर पर्यन्त भारत खण्ड है । इसके विस्तार का परिमण्डल नौ सहस्र योजन होता है ।२। उस नरेन्द्र के पुत्रों ने उस यज्ञ के अश्व की खोज करते हुए एक सहस्र योजन खोदकर आठ ही विनिपातित किये हैं ।३। क्योंकि सगर के पुत्रों के द्वारा वह समुद्र बढ़ा दिया गया है । तभी से लेकर इसका सागर यह नाम प्राप्त हो गया है ।४। तीर्थों और काननों तथा क्षेत्रों के सहित ब्रह्म पाद की अवधि तक इस मही को समुद्र ने अपने जल से परिक्षिप्त करके संक्रामित कर दिया था ।५। फिर सब निलय-देव-असुर और मानव महान् दुःख से संयुत होते हुए इधर-उधर हो गये थे ।६। पश्चिम समुद्र के तट पर हुए योजन विस्तार वाला गोकर्ण नामक क्षेत्र विख्यात था जो सभी सुरों के द्वारा अर्चित था ।७।

५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्रासंख्यानि तीर्थानि मुनिदेवालयाश्च वै । वसंति सिद्धसंघाश्च क्षेत्रे तस्मिन्पुरा नृप ॥८ क्षेत्रं तल्लोकविख्यातं सर्वपापहरं शुभम् । तत्तीर्थमब्धेरपतद्भागे दक्षिणपश्चिमे ॥६ यत्र सर्वे तपस्तप्त्वा मुनयः शंसितव्रताः । निर्वाणं परमं प्राप्ताः पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥१० तत्क्षेत्रस्य प्रभावेण प्रीत्या भूतगणैः सह । देव्या च सकलैर्देवैर्नित्यं वसति शंकरः ॥११ एनांसि यत्समुद्दिश्य तीर्थयात्रां प्रकुर्वताम् । नृणामाशु प्रणश्यंति प्रवाते शुष्कपर्णवत् ॥१२ तत्क्षेत्रसेवनरतिर्नैव जात्वभिजायते । समीपे वसमानानामपि पुंसां दुरात्मनाम् ॥१३ महता सुकृतेनैव तत्क्षेत्रगमने रतिः । नृणां संजायते राजन्नान्यथा तु कथंचन ॥१४

हे नृप ! पहिले वहां पर उस क्षेत्र में अगणित तीर्थ मुनियों और देवों के आलय और सिद्धों के संघ निवास किया करते थे ।८। वह क्षेत्र लोक में विख्यात था और परम शुभ समस्त पापों के हरण करने वाला था । वह तीर्थ समुद्र के दक्षिण भाग में गिर गया था ।६। जहाँ पर सब मुनिगण तपश्चर्या करके संशित व्रत वाले हुए थे और वे सब निर्वाण पद को प्राप्त हो गये थे जिस पद पर पहुँच कर इस लोक में पुनः आवृत्ति नहीं होती है ।१०। उस क्षेत्र का ऐसा प्रभाव था कि उसी के कारण से भगवान् शङ्कर बड़ी ही प्रीति से अपनी प्रिया देवी-सकल देवगण और भूत गणों के साथ निवास किया करते हैं ।११। इसी का उद्देश्य करके तीर्थ यात्रा करने वाले मनुष्यों के समस्त अघ तेज वायु में शुष्क पुत्रों के ही समान शीघ्र ही विनष्ट हो जाया करते हैं ।१२। जो उसके समीप में ही निवास करने वाले दुरात्मा मनुष्य होते हैं और वहीं पर निवासी हैं उनको कभी भी उस क्षेत्र के सेवन करने की रति नहीं हुआ करती है ।१३। हे राजन् यह एक महान् सुकृत हो तभी उस क्षेत्र के गमन में रति हुआ करती है । यदि कोई महान् पुण्यों का

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५३

उदय नहीं तो फिर मानवों के हृदय में किसी भी प्रकार से उस क्षेत्र के सेवन करने की रति समुत्पन्न नहीं हुआ करती है ।१४।

निबंधेन तु ये तस्मिन्प्राणिनः स्थिरजंगमाः ।
म्रियंते नृप सद्यस्ते स्वर्गं प्राप्स्यंति शाश्वतम् ॥१५
स्मृत्याऽपि सकलैः पापैर्यस्य मुच्येत मानवः ।
क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं सर्वतीर्थनिकेतनम् ॥१६
स्नात्वा चैतेषु तीर्थेषु यजंतश्च सदाशिवम् ।
सिद्धिकामा वसंति स्म मुनयस्तत्र केचन ॥१७
कामक्रोधविनिर्मुक्ता ये तस्मिन्वीतमत्सराः ।
निवसंत्यचिरेणैव तत्सिद्धिं प्राप्नुवंति हि ॥१८
जपहोमरताः शांता नियता ब्रह्मचारिणः ।
वसंति तस्मिन्ये ते हि सिद्धिं प्राप्स्यंत्यभीप्सिताम् ॥१९
दानहोमजपाद्यं वै पितृदेवद्विजार्चनम् ।
अन्यस्मात्कोटिगुणितं भवेत्तस्मिन्फलं नृप ॥२०
अंभोधिसलिले मग्ने तस्मिन् क्षेत्रेऽतिपावने ।
महता तपसा युक्ता मुनयस्तन्निवासिनः ॥२१

हे नृप ! जो स्थावर या जंगम प्राणी निर्बन्ध होने के कारण से वहां पर अपना प्राण परित्याग किया करते हैं वे तुरन्त ही शाश्वत स्वर्ग की प्राप्ति कर लिया करते हैं। यद्यपि स्वर्ग का निवास सावधिक होता है और पुण्य क्षीण हो जाने पर वहां से हटना होता है परन्तु इस क्षेत्र के प्रभाव से सदा ही स्वर्ग निवास होता है ।१५। इसकी ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि इसकी स्मृति भी कोई कर लेवे तो स्मरण मात्र से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाया करता है । यह सभी क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है और सब तीर्थों का निकेतन है ।१६। कुछ मुनिगण तो इन तीर्थों में स्नान करके सदा ही शिव का यजन करते हुए सिद्धि की कामना वाले यहां पर निवास किया करते थे ।१७। जो मनुष्य काम और क्रोध से रहित होकर मत्सरता को त्याग कर उसमें निवास किया करते हैं वे थोड़े ही समय में सिद्धि को प्राप्त

५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कर लिया करते हैं।१८। मन्त्रों के जाप करने तथा हवन करने में जो निरत रहते हुए परम शान्त-नियत तथा ब्रह्मचर्य पालन करने वाले इसमें निवास करते हैं वे भी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर लिया करते हैं।१९। हे नृप ! दान-होम-जप और पितृगण तथा देवगण एवं द्विजों का अर्चन आदि सभी धार्मिक कृत्यों का फल इसमें करने से अन्य स्थल से करोड़ों गुना अधिक हुआ करता है ।२०। अति पावन उस क्षेत्र के समुद्र के जल में निमग्न हो जाने पर जो मुनिगण अपने महान् तप से युक्त थे और वहाँ पर निवास किया करते थे वे पर्वत पर चले गये थे ।२१।

सह्यं शिखरिणं श्रेष्ठं निलयार्थं समारुहन् ।
वसन्तस्तत्र ते सर्वे संप्रधार्य परस्परम् ॥२२
महेंद्राद्रौ तपस्यंतं रामं गन्तुं प्रचक्रमुः ।
राजोवाच-
अगस्त्यपीततोयेऽब्धौ परितो राजनंदनैः ॥२३
खात्वाधः पातिते क्षेत्रे सतीर्थश्रमकानने ।
भूभागेषु तथान्येषु पुरग्रामाकरादिषु ॥२४
विनाशितेषु देशेषु समुद्रोपांतवर्त्तिषु ।
किमकार्षुर्मु निश्रेष्ठ जनास्तन्निलयास्ततः ॥२५
तत्रैव चावसन्कृच्छात्प्रस्थितान्यत्र वा ततः ।
कियता चैव कालेन संपूर्णोऽभूदपां निधिः ।
केन वापि प्रकारेण ब्रह्मन्नेतद्वदस्व मे ॥२६
जैमिनिरुवाच-
अनूपेषु प्रदेशेषु नाशितेषु दुरात्मभिः ॥२७
जनास्तन्निलयाः सर्वे संप्रयाता इतस्ततः ।
तत्रैव चावसन्कृच्छात्केचित्क्षेत्रनिवासिनः ॥२८

उन्होंने परम श्रेष्ठ सह्य पर्वत पर निवास के लिए समारोहण किया था। वहाँ पर ही सब निवास करने लगे थे और उन्होंने परस्पर में निश्चय किया था ।२२। महेन्द्र पर्वत पर जो राम तपस्या कर रहे थे वहाँ पर गमन

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५५

करने का उन्होंने उपक्रम किया था। राजा ने कहा-जब अगस्त्य मुनि ने समुद्र के जल का पान कर लिया था और सभी ओर सगर पुत्रों ने उसका खनन किया था तथा सभी तीर्थ-क्षेत्र और कानन नीचे की ओर गिरा दिये गये थे और अन्य पुरग्राम तथा आकर आदि भू भाग एवं देश विनाborder: नाशित हो गये थे जो भी समुद्र के समीप में विद्यमान थे हे मुनिश्रेष्ठ ! वहाँ पर पतरों वाले मनुष्यों ने फिर क्या किया था ? ।२३-२५। वे सब वहीं पर बस गये थे अथवा बड़ी कठिनाई से कहीं अन्य स्थलों में प्रस्थान कर गये थे ? फिर कितने समय में यह समुद्र परिपूर्ण हो गया था ? हे ब्रह्मन् ! यह किस प्रकार से सब हुआ था-यह आप अब कृपया मुझे बतलाइये ।२६। जैमिनि मुनि ने कहा--जब दुरात्माओं के द्वारा सभी अनूप प्रदेश नष्ट कर दिये गये थे तब वहाँ पर रहने वाले सभी जन इधर-उधर प्रयाण कर गये थे। कुछ क्षेत्र के निवासी बड़ी कठिनाई से वहीं पर निवास करने लगे थे ।२७-२८।

एतस्मिन्नेव काले तु राजन्नंशुमतः सुतः ।
बभूव भुवि धर्मात्मा दिलीप इति विश्रुतः ॥२९
राज्येऽभिषिच्य तं सम्यग्भुक्तभोगोऽशुमान्नृपः ।
वनं जगाम मेधावी तपसे धृतमानसः ॥३०
दिलीपस्तु ततः श्रीमानशेषां पृथिवीमिमाम् ।
पालयामास धर्मेण विजित्य सकलानरीन् ॥३१
भगीरथो नाम सुतस्तस्यासील्लोकविश्रुतः ।
सर्वधर्मार्थकुशलः श्रीमानमितविक्रमः ॥३२
राज्येऽभिषिच्य तं राजा दिलीपोऽपि वनं ययौ ।
स चापि पालयन्नुर्वी सम्यग्विहतकंटकाम् ॥३३
मुमुदे विविधैर्भोगैर्दिवि देवपतिर्यथा ।
स शुश्रावात्मनः पूर्वं पूर्वजानां महीपतिः ॥३४
निरये पतनं घोरं विप्रकोपसमुद्भवम् ।
ब्रह्मदंडहतान्सर्वान्पितॄञ्छ्रुत्वाऽतिदुःखितः ॥३५

इसी समय में हे राजन् ! अंशुमान का सुत परम धर्मात्मा दिलीप —इस नाम से प्रसिद्ध हुआ था। अर्थात् दिलीप ने भूमि में जन्म ग्रहण

५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

किया था।२९। समस्त सांसारिक भोगों के उपभोग करने वाले अंशुमान नृप ने राज्यासन पर उस अपने पुत्र को अभिषिक्त करा दिया था और मेधा सम्पन्न वह तपश्चर्या करने का संकल्प मन में करके वन में चला गया था।३०। फिर श्री सम्पन्न राजा दिलीप ने समस्त शत्रुओं को परास्त करके इस सम्पूर्ण भूमि का परिपालन धर्म पूर्वक किया था।३१। इस दिलीप का पुत्र भगीरथ हुआ था। जो लोक में परम प्रख्यात था सभी धर्म-अर्थ में महाकुशल और श्रीमान् अपरिमित बल-विक्रम से समन्वित था।३२। वह दिलीप भी अवसर आने पर राज्यासन पर भगीरथ का अभिषेक कराकर वन में गमन कर गया था। उस भागीरथ ने भी भूमि का परिपालन अच्छी तरह से किया था और उसने भूमि के सभी कण्टकों को हत कर दिया था।३३। स्वर्गलोक में देवाधीश्वर की ही भाँति नाना प्रकार भोगों का उपभोग करके परम प्रसन्न हुआ था। उस राजा ने पहिले अपने पूर्वजों की जो दशा हुई थी उसका पूरा वृत्तान्त सुन लिया था।३४। विप्र के कोप से महान घोर नरक में पूर्वजों का पतन हुआ है और उसके सभी पितृगण ब्रह्मदण्ड से मारे गये हैं—यह सब सुनकर उसको बहुत अधिक दुःख हुआ था।३५।

राज्ये बंधुषु भोगे वा निर्वेदं परमं ययौ ।
स मंत्रि वरे राज्यं विन्यस्य तपसे वनम् ॥३६

प्रययौ स्वपितॄन्नाकं निनीषुर्नृपसत्तमः ।
तपसा महता पूर्वमायुषे कमलोद्भवम् ॥३७

आराध्य तस्माल्लेभे च यावदायूर्निजेप्सितम् ।
ततो गंगां महाराज समाराध्य प्रसाद्य च ॥३८

वरमागमनं वव्रे दिवस्तस्वा महीं प्रति ।
ततस्तां शिरसा धत्तुं तपसाऽऽराध्यच्छिवम् ॥३९

स चापि तद्वरं तस्मै प्रददौ भक्तवत्सलः ।
मेरोर्मूर्ध्नस्ततो गंगां पतंती शिरसात्मनः ॥४०

सग्राहनक्रमकरां जग्राह जगतां पतिः ।
सा तच्छिरः समासाद्य महावेगप्रवाहिनी ॥४१

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५७

तज्जटामंडले शुभ्रे विलिल्ये साऽतिगह्वरे ।
चुलकोदकवच्छंभोर्विलीनां शिरसि प्रभोः ॥४२

फिर तो राजा भगीरथ को उस विशाल अपने राज्य में—बन्धु-बान्धवों में तथा सुखोपभोगों में परम वैराग्य उत्पन्न हो गया था अर्थात् उसे कुछ भी नहीं सुहाता था और सबको उसने निस्सार ही समझ लिया था। उसने फिर अपने एक परमश्रेष्ठ मन्त्री को राज्य शासन का भार सौंप दिया था और तप करने के लिए वन में चला गया था। ३६। उसकी उत्कट इच्छा यही थी कि वह श्रेष्ठ नृप अपने पितरों को नरक की घोर यातना से मुक्त कर स्वर्ग वासी बना देवे। सर्वप्रथम उसने महान तप के द्वारा आयु के द्वारा आयु के लिए ब्रह्माजी की समाराधना की थी। ३७। उनकी आराधना से भगीरथ ने अपनी अभीष्ट आयु प्राप्त करली थी। फिर हे महाराज ! गङ्गा की आराधना की थी और गङ्गा को अपने ऊपर प्रसन्न कर लिया था। ३८। भगीरथने स्वर्ग से गङ्गा का भूमि पर समागमन करने का वरदान प्राप्त किया था। फिर उस स्वर्ग से समापतन करने वाली गंगा की विशाल धारा को अपने शिर पर धारण करने की कृपा करें—इसलिए शिव की आराधना तप द्वारा की थी। क्योंकि अन्य किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी जो गंगा के वेग को सह सके। ३९। शिव भी भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। उन्होंने भी यह वरदान दे दिया था। मेरु पर्वत की शिखर से समापतन करती हुई गंगा देवी को अपने शिर पर जगतों के स्वामी ने ग्रहण किया था जिसमें बड़े-बड़े ग्रह-नक्र और मकर आदि सभी जल के जीव विद्यमान थे। वह गंगा उनके शिर पर सम्प्राप्त हुई थी जिसमें महान् प्रवाह का वेग विद्यमान था। ४०-४१। किन्तु वह गंगा अति गहन परम शुभ शिव के जटा-जूटों का मण्डल था उसमें ही विलीन हो गयी थी। प्रभु शम्भु के शिर में वह ऐसे ही विलीन हो गयी थी जैसे एक चुल्लू जल विहीन हो जाया करता है। ४२।

विलोक्य तत्प्रमोक्षाय पुनराराधयद्धरम् ।
स तां शर्वप्रसादेन लब्ध्वा तु भुवमागताम् ॥४३
आनिन्ये सागरा दग्धा यत्र तां वै दिशं प्रति ।
सऽनुव्रजंती राजानं राजर्षेर्यजतः पथि ॥
तद्यज्ञवाटमखिलं प्लावयामास सर्वतः ।

५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स तु राजऋषिः संक्रुद्धो यज्ञवाटेऽखिले तथा ।।४५
मग्ने गंडूषजलवत्स पपौ तामशेषतः ।
मग्ने गंडूषजलवत्स षपौ तामशेषतः ।
अतंद्रितो वर्षशतं शुश्रूषित्वा स तं पुनः ।।४६
तस्मात्प्रसन्नान्नृपतिर्लेभे गंगां महात्मनः ।
उषित्वा सुचिरं तस्य निसृता जठराच्चतः ।।४७
प्रथितं जाह्नवीत्यस्यास्ततो नामाभवद्भुवि ।
भगीरथानुगा भूत्वा तत्पितॄणामशेषतः ।।४८
निजांभसाऽस्थिभस्मानि सिषेच सुरनिम्नगा ।
ततस्तदंभसा सिक्तेष्वस्थिभस्मसु तत्क्षणात् ।।४६

राजा भगीरथ ने जब ऐसा देखा तो उस गङ्गा देवी के प्रमोक्षण के लिये पुनः भगवान् शङ्कर की आराधना की थी। फिर भगवान् शिव के प्रसाद से राजा भगीरथ ने गङ्गा को भूमि पर लाने का कार्य सम्पन्न किया था।४३। राजा भगीरथ उस गङ्गा को उसी दिशा की ओर लाये थे जहाँ पर सगर सुत दग्ध हुए थे । वह गंगा राजा भगीरथ के पीछे ही अनुगमन कर रही थी कि उसके मार्ग में एक राजर्षि यज्ञ का यजन कर रहे थे।४४। गंगा देवी ने उसके यज्ञ स्थल को सभी ओर से पूर्णतया प्लावित कर दिया वह राजर्षि बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था जबकि गंगा के द्वारा उसका सब यज्ञ वाट निमग्न हो गया था। उस राजर्षि ने एक कुल्ली के ही समान उस सम्पूर्ण गंगा का पान कर लिया था। फिर बहुत ही सावधान होकर भगीरथ ने सौ वर्षों तक उस राजर्षि की शुश्रूषा की थी ।४५-४६। फिर जब वह राजर्षि प्रसन्न हुए तो भगीरथ ने उन महान् आत्मा वाले से गङ्गा की प्राप्ति की थी। बहुत समय पर्यन्त निवास करके फिर उनके जटा से गंगा निकली थी। इसीलिए सभी से जह्नु के उदर से निकलने से ही उनका भूमण्डल में जाह्नवी—यह नाम प्रख्यात हो गया था। फिर भागीरथ के पीछे अनुगमन करने वाली होकर उसके समस्त पितरों का उसने उद्धार कर दिया था ।४७-४८। फिर सुर नदी ने अपने परम पुनीत जल से सगर सुतों की अस्थियों और भस्म का सेवन किया था। गंगा जल के सेचन होने पर जो उनकी अस्थियाँ और भस्म पर हुआ था उसी क्षण में उन सबका उद्धार हो गया था ।४६।

गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५६

निर्यातात्सागराः सर्वे नष्टपापा दिवं ययुः ।
एवं सा सागरान्सर्वान्दिवं नीत्वा महानदी ॥५०
तेनैव मार्गेण जवात्प्रयाता पूर्वसागरम् ।
मेरोर्मूध्नँश्चतुर्भेदा भूत्वा याता चतुर्दिशम् ॥५१
चतुर्भेदतया चाभूत्तस्या नाम्नां चतुष्टयम् ।
सीता चालकनंदा च सुचक्षुर्भद्रवत्यपि ॥५२
अगस्त्यपीतसलिलाच्चिरं शुष्कोदका अपि ।
गंगांभसा पुनः पूर्णाश्चत्वारोऽम्बुधयोऽभवन् ॥५३
पूर्यमाणे समुद्रे तु सागरैः परिवर्द्धिते ।
अंतर्हिताऽभवन्देशा बहवस्तत्समीपगाः ॥५४
समुद्रोपांतवर्त्तीनि क्षेत्राणि च समंततः ।
इतस्ततः प्रयाताश्च जनास्तन्निलया नृप ॥५५
गोकर्णमिति च क्षेत्रं पूर्वं प्रोक्तं तु यत्तव ।
अर्णवोपात्तवर्त्तित्वात्समुद्रैंस्तद्विभागमत् ॥५६
ततस्तन्निलयाः सर्वे तदुद्धाराभिकांक्षिणः ।
सह्याद्रेर्भृगुशार्दूलं द्रष्टुकामा ययुर्नृप ॥५७

नरकों में जो घोर यातना पा रहे थे वे सभी सगर के पुत्र समस्त पापों के नष्ट होने से नरक से उसी क्षण में स्वर्ग लोक में चले गये थे। इस रीति से उस महा नदी ने सब सगर सुतों को स्वर्ग में पहुँचा कर फिर वहन करने लगी थी ।५०। उसी मार्ग से बड़े वेग से उसने पूर्व सागर की ओर प्रयाण किया था। मेरु पर्वत के मस्तक से चार भेद होकर वह चारों दिशाओं में गमन कर गयी थी ।५१। उसके चार भेद होने से उसके नाम भी चार हो गये थे। वे नाम में हैं—सीता—अलक नन्दा— सुचक्षु और भद्रवती ये चार नाम हुए हैं ।५२। अगस्त्य मुनि के द्वारा जल पीये जाने पर बहुत समय तक जल के शुष्क ही जाने वाले चारों समुद्र भी गंगा के जल से पुनः परिपूर्ण जल वाले हो गये थे ।५३। समुद्र के पूरित होने पर और सगर सुतों के द्वारा परिवर्द्धित हो जाने पर उसके समीप में स्थित बहुत से

६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देश थे वे सब लुप्त हो गये थे अर्थात् समुद्र में लीन हो गये थे ।५४। समुद्र के समीप में रहने वाले समस्त क्षेत्र सभी ओर से निमग्न हो गये थे और हे नृप ! वहाँ पर जो भी जन निवास करते थे वे सभी इधर-उधर चले गये थे ।५५। गोकर्ण नाम वाला क्षेत्र है जिसके विषय में पूर्व में ही आपसे कहा गया था। वह समुद्र के ही समीप में विद्यमान होने से समुद्र के ही अन्दर में छिप गया था ।५६। इसके अनन्तर उसके विनाश करने वाले सब उसके उद्धार की आकाङ्क्षा वाले थे और सह्य अद्रि पर भृगुशार्दूल की देखने की इच्छा वाले हे नृप ! वे सब वहाँ गये थे ।५७।


गान्धर्व मूर्छना लक्षण

सूत उवाच-
विसर्गं मनुपुत्राणां विस्तरेण निबोधत ।
पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गां निशि तत्क्षये ॥१
शापाच्छूद्रत्वमापन्नश्च्यवनस्य महात्मनः ।
करूषस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥२
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः संबभूव ह ।
नाभागो दिष्टपुत्रस्तु विद्वानासीद्द्वालंदनः ॥३
भलंदनस्य पुत्रोऽभूत्प्रांशुर्नाममहाबलः ।
प्रांशोरेकोऽभवत्पुत्रः प्रजापतिसमो नृपः ॥४
संवर्तेन दिवं नीतः समुहृत्सहबांधवः ।
विवादोऽत्र महानासीत्संवर्त्तस्य वृहस्पतेः ॥५
ऋद्धिं दृष्ट्वा तु यज्ञस्य क्रुद्धस्तस्य वृहस्पतिः ।
संवर्त्तेन तते यज्ञे चुकोप स भृशं तदा ॥६
लोकानां स हि नाशाय दैवतैर्हि प्रसादितः ।
मरुत्तश्चक्रवर्त्ती स नरिष्यंतमवासवान् ॥७

श्री सूतजी ने कहा—अब आप मनु के पुत्रों का विसर्ग विस्तार के साथ समझ लीजिए। पृषध्र रात्रि में गुरुदेव की गौ की हिंसा करके उसके क्षय होने पर महात्मा च्यवन के शाप से शूद्रता को प्राप्त हो गया था। करूष

गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६१

के कारूष क्षत्रिय हुए थे जो युद्ध करने में दुर्मद थे ।१-२। यह एक सहस्र क्षत्रियों का समुदाय था जो बहुत ही अधिक विक्रान्त हुआ था दिष्ट पुत्र नाभाग था और भलन्दन विद्वान था ।३। इस भलन्दन का पुत्र महान् बल-वान् प्रांशु नाम वाला हुआ था। प्रांशु का एक ही पुत्र हुआ था जो नृप प्रजापति के ही समान था ।४। उसको सुहृत् और बान्धवों के साथ संवर्त्त के द्वारा स्वर्ग में ले जाया गया था। इस विषय में संवर्त्त का और वृहस्पति का बड़ा भारी विवाद हुआ था ।५। उसके यज्ञ की ऋद्धि का अवलोकन करके वृहस्पति क्रुद्ध हो गये थे। संवर्त्त के द्वारा यज्ञ के विस्तृत होने पर उस समय में वह अत्यधिक कुपित हो गया था ।६। लोकों के विनाश करने के लिए देवगणों के द्वारा वह प्रसन्न किया था। मरुत चक्रवर्त्ती उसने नरिष्यन्त को बसाया था ।७।

नरिष्यंतस्य दायादो राजा दंडधरो दमः ।
तस्य पुत्रस्तु विज्ञातो राजाऽसीद्राष्ट्रवर्द्धनः ॥८
सुधृतिस्तस्य पुत्रस्तु नरः सुधृतितः पुनः ।
केवलस्य पुत्रस्तु बंधुमान्केवलात्मजः ॥९
अथ बंधुमतः पुत्रो धर्मात्मा वेगवान्नृप ।
बुधो वेगवतः पुत्रस्तृणबिंदुर्बुधात्मजः ॥१०
त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये संबभूव ह ।
कन्या तु तस्येडविडा माता विश्रवसो हि सा ॥११
पुत्रो योऽस्य विशालोऽभूद्राजा परमधार्मिकः ।
दाश्वान्प्रख्यातवीर्य्योऽजा विशाला येन निर्मिता ॥१२
विशालस्य सुतो राजा हेमचन्द्रो महाबलः ।
सुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तरः ॥१३
सुचन्द्रतनयो राजा धूम्राश्व इति विश्रुतः ।
धूम्राश्वतनयो विद्वान्सृंजयः समपद्यत ॥१४

नरिष्यन्त का दायाद दण्डधर राजा दम था। उसका पुत्र परम विद्वान राष्ट्र वर्धन राजा हुआ था ।८। उसका पुत्र सुधृति हुआ था और फिर सुधृति से नर पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था। केवल का पुत्र तो एक

६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

केवलात्मज बन्धुमान् हुआ था ।९। हे नृप ! फिर बन्धुमान् के यहाँ धर्मात्मा वेगवान् ने पुत्र के रूप में जन्म धारण किया था। वेगवान् का पुत्र बुध हुआ था और बुध का पुत्र तृण बन्धु उत्पन्न हुआ था ।१०। तृतीय त्रेता के मुख में राजा हुआ था। उसकी कन्या इडविडा थी जो विश्रवा की माता थी ।११। इसका पुत्र विशाल राजा हुआ था जो परम धार्मिक था। यह दाश्वान् और प्रख्यात वीर्य तथा ओज वाला था जिसने विशाल का निर्माण किया था ।१२। इस विशाल का पुत्र महाबलवान् हेमचन्द्र उत्पन्न हुआ था। इस हेमचन्द्र के अनन्तर सुचन्द्र नाम वाला विख्यात हुआ था ।१३। सुचन्द्र का पुत्र राजा धूम्राश्व हुआ था जो प्रसिद्ध था और धूम्राश्व का पुत्र परम विद्वान् सृंजय हुआ था ।१४।

सृञ्जयस्य सुतः श्रीमान्सहदेवः प्रतापवान् ।
कृशाश्वः सहदेवस्य पुत्रः परमधार्मिकः ॥१५
कृशाश्वस्य महातेजा सोमदत्तः प्रतापवान् ।
सोमदत्तस्य राजर्षेः सुतोऽभूज्जनमेजयः ॥१६
जनमेजयात्मजश्चैव प्रमतिर्नाम विश्रुतः ।
तृणबिंदुप्रभावेण सर्वे विशालका नृपाः ॥१७
दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः ।
शर्यातेर्मिथुनं त्वासीदानर्त्तो नाम विश्रुतः ॥१८
पुत्रः सुकन्या कन्या च भार्या या च्यवनस्य च ।
आनर्त्तस्य तु दायादो रेवो नाम सुवीर्यवान् ॥१९
आनर्त्तविषयो यस्य पुरी चापि कुशस्थली ।
रेवस्य रेवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः ॥२०
ज्येष्ठो भ्रातृशतस्यासीद्राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम् ।
कन्यया सह श्रुत्वा च गांधर्वं ब्रह्मणोऽन्तिके ॥२१

इस सृंजय का जो पुत्र समुत्पन्न हुआ था वह श्री सम्पन्न और प्रताप वाला सहदेव था। सहदेव के पुत्र का नाम कृशाश्व था। यह भी परम धार्मिक हुआ था ।१५। कृशाश्व का तनय सोमदत्त हुआ था जो महान तेज वाला था और परम प्रतापी था। राजर्षि सोमदत्त के यहां जनमेजय ने पुत्र

गान्धर्वं मूच्छेना लक्षण ] [ ६३

के रूप में जन्म धारण किया था। १६। इस जनमेजय का पुत्र प्रमति नाम वाला बहुत ही प्रख्यात हुआ था। तृणबिन्दु के प्रभाव से ये सब वैशालक नृप हुए थे। १७। ये सभी सुदीर्घ आयु वाले—महान् समुच्च आत्माओं वाले—बल—वीर्य से सुसमन्वित और बहुत ही अधिक धार्मिक वृत्ति वाले हुए थे। शर्याति के एक जोड़ा हुआ था जो आनर्त्त के नाम विश्रुत था। १८। एक पुत्र था और एक सुकन्या नाम वाली कन्या थी जो च्यवन ऋषि की भार्या थी। उस आनर्त्त के दायको ग्रहण करने वाला पुत्र रेव नामक हुआ था जो बड़ा वीर्य वाला था। १६। आनर्त्त का देश था जिसको कुशस्थली नाम वाली पुरी थी। रेव का पुत्र रेवत ककुद्मी नाम वाला बड़ा धार्मिक हुआ था। २०। यह सौ भाइयों में सबसे बड़ा था। इसने ही कुशस्थली के राज्य को प्राप्त किया था। ब्रह्माजी के समीप में कन्या का श्रवण करके उसके साथ गन्धर्व ज्ञान कर लिया था। २१।

मुहूर्त्तं देवदेवस्य मार्त्यं बहुयुगं विभो।
आजगाम युवा चैव स्वां पुरीं यादवैर्वृताम् ॥२२
कृतां द्वारवतीं नाम बहुद्वारां मनोरमाम् ।
भोजवृष्ण्यन्धकैर्गुप्तां वसुदेवपुरोगमैः ॥२३
तां कथां रेवतः श्रुत्वा यथातत्त्वमरिंदमः।
कन्यां तु बलदेवाय सुव्रतां नाम रेवतीम् ।
दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः ॥२४
रेमे रामश्च धर्मात्मा रेवत्या सहितः किल ।
तां कथामृषयः श्रुत्वा पप्रच्छुस्तदनंतरम् ॥२५

ऋषय ऊचुः-

कथं बहुयुगे काले समतीते महामते।
न जरा रेवतीं प्राप्ता रैवतं वा ककुद्मिनम् ।
एतच्छुश्रूषमाणान्नो गान्धर्वं वद चैव हि ॥२६

सूत उवाच-

न जरा क्षुत्पिपासे वा न च मृत्युभय ततः ।
न च रोगः प्रभवति ब्रह्मलोकं गतस्य ह ॥२७

६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गांधर्वं प्रति यच्चापि पृष्टस्तु मुनिसत्तमाः । ततोऽहं संप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ॥२८

हे विभो ! वह समय देवों के देव का तो एक ही मुहूर्त था और मनुष्यों का वह समय बहुत से युगों के बराबर था । फिर वह युवा यादवों के समुदायों से घिरी हुई अपनी पुरी में आ गया था ।२२। वह पुरी द्वारवती नाम वाली की गयी थी जिसमें बहुत से द्वार थे और यह परम मनोहर थी । भोज-वृष्णि और अन्धक जो यादवों के विभिन्न भेद थे जिनमें वसुदेव अग्र-गामी थे—इन सबने उसकी रक्षा की थी ।२३। अरियों के दमन करने वाले रैवत ने ठीक तात्त्विक रूप से उस कथा का श्रवण किया और फिर उसने अपनी सुन्दर व्रत वाली रेवती नाम वाली कन्या को बलदेवजी के लिए समर्पित करके वह फिर मेरु पर्वत के शिखर तप चला गया था और वहाँ पर करने में संस्थित हो गया था ।२४। फिर बलरामजी भी जो परम धर्मात्मा थे, अपनी प्रिय पत्नी रेवती के साथ रमण किया करते थे । इस कथा को ऋषियों ने श्रवण करके इसके पश्चात उन्होंने पूछा था ।२५। ऋषियों ने कहा—हे महामते ! बहुत युगों वाले काल के व्यतीत जाने पर भी रेवती को और ककुद्मी रैवत को जरावस्था किस कारण से प्राप्त नहीं हुई थी ? इस सबके श्रवण करने की इच्छा वालों को वह गान्धर्व क्या है—यह भी बतलाने की कृपा कीजिए ।२६। श्रीसूतजी ने कहा-जो प्राणी ब्रह्म लोक में गमन कर जाया करता है उसको न तो कोई रोग ही होता है और उसको न मृत्यु का भय रहता है । वहां पर जरा और भूख प्यास भी नहीं सताया करती हैं ।२७। हे श्रेष्ठ मुनिगणो ! आपने जो मुझसे गान्धर्व के विषय में पूछा है उसको भी मैं हे सुव्रतो ! ठीक-ठीक रूप से बतलाऊँगा ।२८।

सप्त स्वरात्रयो ग्रामा मूर्छनास्त्वेकविंशतिः । तानाश्चैकोनपंचाशदित्येतत्स्वरमंडलम् ॥२६ षड्जर्षभौ च गांधारो मध्यमः पंचमस्तथा । धैवतश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादकः ॥३० सौवीरा मध्यमा ग्रामा हरिणाश्च तथैव च ॥३१ तस्याः कालायनोपेताश्चतुर्थाशुद्धमध्यमाः । अग्नि च पौषा वै देव दृष्ट्वा कांच यथाक्रमः ॥३२

गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६५

मध्यमग्रामिकाख्याता षड्जग्रामा निबोधत ।
उत्तरं मंद्रा रजनी तथा वाचोन्नरायताः ॥३३
मध्यषड्जा तथा चैव तथान्या चाभिमुद्गणा ।
गांधारग्रामिका श्यामा कीर्तिमाना निबोधत ॥३४
अग्निष्टोमं तु माद्यं तु द्वितीयं वाजपेयिकम् ।
यवरातसूयस्तु षष्ठवत्तु सुवर्णकम् ॥३५

सात तो स्वर होते हैं-तीन ग्राम हैं और इक्कीस मूर्च्छनाएं होती हैं। और तान उनचास हैं—यह सम्पूर्ण स्वर मण्डल होता है ।२६। सात स्वरों के नाम बताये जाते हैं—षड्ज-ऋषभ-गान्धार मध्यम-धैवत और निषाद ये सात स्वर हैं ।३०। सौवीरा-मध्यमा और हरिणा—ये तीन ग्राम हैं ।३१। उसके कालायनोपेता चतुर्था शुद्ध मध्यमा है। हे देव ! क्रमानुसार नग्न-घोषा और कांच ये देखकर होती हैं ।३२। ये मध्य ग्रामिका कही गयी हैं। अब षड्ज ग्रामा को समझ लीजिए। उत्तर-मन्द्रा-रजनी और वाचोन्नारायता है ।३४। तथा मध्यषड्जा है और अन्य अभिमुद्रणा होती है। गान्धारग्रामिका-श्यामा अब कीर्त्तिमाना होती है उसको समझलो ।३४। अग्निष्टोम-माद्य-द्वितीय वाजयिक-यवरातसूया-षष्ठवत्-सुवर्णक है ।३५।

सप्त गोसवना नाम महावृष्टिक्राष्टमाम् ।
ब्रह्मदानं च नवमं प्राजापत्यमनंतरम् ।
नागयक्षाश्रयं विद्वान् तद्गोत्तरस्तथैव च ॥३६
पदक्रांतमृगक्रांतं विष्णुक्रांतमनोहरा ।
सूर्यकांतधरेण्यैव संतकोकिलविश्रुतः ॥३७
तेनवानित्यपवशपिशाचातीवनह्यपि ।
सावित्रमर्धसावित्रं सर्वतोभद्रमेव च ॥३८
मनोहरमधात्र्यं च गन्धर्वानुपतश्च यः ।
अलंबुषेमथो विष्णुर्वणवरावुभौ ॥३९
सागराविजयं चैव सर्वभूतमनोहरः ।
हतोत्सृष्टो विजानीत स्कंधं तु प्रियमेव च ॥४०

६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मनोहरमधात्र्यं च गन्धर्वानुपतश्च यः । अलंबुसेष्टस्य तथा नारदप्रिय एव च ॥४१ कथितो भीमसेनेन नगरातानयप्रियः । विकलोपनीतविनताश्रीराख्यो भार्गवप्रियः ॥४२

सप्त गौसवना और महावृष्टिकृता अष्टमा है और प्रह्लादान नवम है । इसके अनन्तर प्राजापत्य है । नागयक्षाश्रय विद्वान् और तदुगोत्तर तथा है ।३६। पदक्रान्त-मृगक्रान्त-विष्णुक्रान्त-मनोहरा । सूर्यकान्त धरेण्या-सन्त कोकिलविश्रुत है तेनवानित्यपवशपिशाचा-अतीवनही-सावित्र-अर्ध सावित्र और सर्वतोभद्र है ।३७-३८। मनोहर-अधात्र्य और गन्धर्वानुपत है । अलम्बु-षेष्ट-विष्णु और वेणवर ये दो हैं ।३६। सागरा विजय और सर्वभूत मनोहर-हृतोत्सृष्ट-स्कन्ध और प्रिय जान लेना चाहिए ।४०। जो मनोहर अधात्र्य तथा गन्धर्वानुपत है । अलम्बुषेष्ट की और नारद प्रिय है ।४१। नगरातान-प्रिय भीमसेन के द्वारा कहा गया है । विकलोपनीत विनता श्री नाम वाला भार्गव को प्रिय है ।४२।

चतुर्दश तथा पंचदशेच्छंतीह नापदः । ससौवीरां सुसोवीरा ब्रह्मणो ह्युपगीयते ॥४३ उत्तरादिस्वरश्चैव ब्रह्मा वै देवतास्त्रयः । हरिदेशसमुत्पन्ना हरिणस्याव्यजायत ॥४४ मूर्च्छना हरिणा ते वै चन्द्रस्यास्याधिदैवतम् । करोपनीता विवृतावनुद्विः स्वरमंडले ॥४५ साकलोपनता तस्मान्मनुतस्र्यान्नदैवतः । मनुदेशाः समुत्पन्ना मूच्छर्नाशुद्धमात्मना ॥४६ तस्मात्तास्मान्मृगामार्गीमृगेंद्रोस्याधिदेवता । सावाश्रमसमाद्युम्ना अनेकापोरुषानखान् ॥४६ मूर्च्छनायोजना ह्येषा स्याद्रजसारजनी ततः । तानि उत्तरतद्ब्रांसपदगदैवतकं विदुः ॥४८ तस्मादुत्तरता यावत्प्रथमं स्वायमं विदुः । तमोदुत्तरमंद्रीयदेवतास्याध्रुवेन च ॥४६

गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६७

यहाँ पर चतुर्दश और पञ्चदश की नारद इच्छा किया करते हैं ? ससोवीरा और सुसोवीरा ब्रह्माजी की उपगीत की जाती हैं।४३। और उत्तरादि स्वर है। ब्रह्मा तीन देवता हैं। हरि देश में समुत्पन्ना हरिण की हुई थी।४४। जो मूर्च्छना हरिणा है वे इस चन्द्रकी अधिदैवत हैं। निवृत्ति में करोपनीत स्वरमण्डल में अनुद्रि है।४५। साकलोपनता है इसलिये मन उसका अन्नदैवत है। मनुदेशा समुत्पन्ना मूर्च्छना आत्मा से शुद्ध है।४६। इससे मृगामार्गी मृगेन्द्र इसका अधिदेवता है। वह अनेक पौरुषा नखों को समुत्पन्ना है।४७। यह मूर्च्छना योजना रजसारजनीत से होती है। उनको उत्तरमद्रांस सपद्ग दैवत जाननी चाहिए।४८। इस कारण से जब तक उत्त-रता हो तब तक इस स्त्रायम जानना चाहिए। इस देयता तमोदुत्तर मन्द्रोम निश्चित रूप से समझना चाहिए।४६।

अपामदुत्तरत्वावधैवतस्योत्तरायणः । स्यादिजमूर्च्छनाह्येच पितरः श्राद्धदेवताः ॥५० शुद्धषड्जस्वरं कृत्वा यस्मादग्निमहर्षयः । उपैति तस्मान्नजानीयाच्छुद्धयच्छिकरासभाः ॥५१ इत्येता मूर्च्छनाः कृत्वा यस्यामीदृशभावनः । पक्षिणां मूर्च्छनाः श्रुत्वा पक्षोका मूर्च्छनाः स्मृताः ॥५२ नागादृष्टिविषागीता नोपसर्पन्तिमूर्च्छनाः । नानासाधारणाश्चैव वडवान्रिविदस्तथा ॥५३

अपामदुत्तरत्व होने से अवधैवत का उत्तरायण हैं। यह इजमूर्च्छना है और पितर श्राद्ध देवता होते हैं।५०। शुद्ध षड्ज स्वर करके जिससे अग्नि महर्षि हैं। इससे प्राप्त होता है अतः शुद्धयच्छिकरा सभा नहीं जाननी चाहिए।५१। ये इतनी मूर्च्छना करके जिसमें जैसा भी भाव हो। पक्षियों की मूर्च्छना का श्रवण करके पक्षी का मूर्च्छना कही गयी है। नानादृष्टि विषा गीता वडवा त्रिविद होती हैं।५२-५३।

गान्धर्व लक्षण वर्णन

पूर्वाचार्यमतं बुद्ध्वा प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । विख्यातान्वे अलंकारांस्तन्मे निगदतः शृणु ॥१

६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अलंकारास्तु वक्तव्याः स्वैः स्वैर्वर्णैः प्रहेतवः । संस्थानयोगैश्च तथा सदा नाट्याद्यवेक्षया ॥२ वाक्यार्थपदयोगार्थैरलंकारैश्च पूरणम् । पदानि गीतकस्याहुः पुरस्तात्पृष्ठतोऽथ वा ॥३ स्थातोनिन्नीनरो नीड्डीमनः कंठशिरस्थया । एतेषु त्रिषु स्थानेषु प्रवृत्तो विधिरुत्तमः ॥४ चत्वारः प्रकृतौ वर्णाः प्रविचारश्चतुर्विधा । विकल्पमष्टधा चैव देवाः षोडशधा विदुः ॥५ सृष्टो वर्णः प्रसंचारी तृतीयमवरोहणम् । आरोहणं चतुर्थं तु वर्णं वर्णविदो विदुः ॥६ तत्रैकः संचरस्थायी संचरस्तु चरोऽभवत् । अवरोहणवर्णानामवरोहं विनिर्दिशेत् ॥७

श्री सूतजी ने कहा—मैं अपने पूर्व में होने वाले आचार्यों के मत को समझ कर क्रम से आरम्भ से अन्त तक बताऊँगा जो भी अलंकार परम प्रसिद्ध हैं उनको मुझ से आप लोग अब श्रवण कीजिए।१। जो अपने-अपने वर्णों से प्रकृष्ट हेतुओं वाले हैं वे ही अलंकार बताने चाहिए। और जो नाट्य आदि के अवेक्षण से संस्थान योगों से सदा समन्वित हुआ करते हैं।२। जहाँ पर वाक्य-अर्थ-पद-योग-अर्थ और अलंकारों से पूर्ति होती है वे गीत के पद आगे अथवा पीछे कहे गये हैं।३। स्थातोनिन्नीनर-नीड्डीमनः कण्ठ और शिर में स्थित-इन तीन स्थानों में जो विधि है वही उत्तम होती है ।४। प्रकृति में चार वर्ण हैं और प्रविचार के चार-प्रकार के हैं। आठ प्रकार से विकल्प है। इसको देव १६ प्रकार का जानते हैं।५। वर्ण प्रसंचारी सृजन किया गया है। तीसरा अवरोहण होता है। चौथा आरोहण है—इस तरह से वर्णों के ज्ञाता वर्ण को जानते हैं ।६। वहाँ पर संचर स्थायी है और संचर तो चर होगया है। जो अवरोहण वर्ण हैं उनका अवरोह विनिर्दिष्ट करना चाहिए ।७।

आरोहणेन वारोहान्वर्णान्वर्णविदो विदुः । एतेषामेव वर्णानामलंकारान्निबोधत ॥८