संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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देश थे वे सब लुप्त हो गये थे अर्थात् समुद्र में लीन हो गये थे ।५४। समुद्र के समीप में रहने वाले समस्त क्षेत्र सभी ओर से निमग्न हो गये थे और हे नृप ! वहाँ पर जो भी जन निवास करते थे वे सभी इधर-उधर चले गये थे ।५५। गोकर्ण नाम वाला क्षेत्र है जिसके विषय में पूर्व में ही आपसे कहा गया था। वह समुद्र के ही समीप में विद्यमान होने से समुद्र के ही अन्दर में छिप गया था ।५६। इसके अनन्तर उसके विनाश करने वाले सब उसके उद्धार की आकाङ्क्षा वाले थे और सह्य अद्रि पर भृगुशार्दूल की देखने की इच्छा वाले हे नृप ! वे सब वहाँ गये थे ।५७।
गान्धर्व मूर्छना लक्षण
सूत उवाच-
विसर्गं मनुपुत्राणां विस्तरेण निबोधत ।
पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गां निशि तत्क्षये ॥१
शापाच्छूद्रत्वमापन्नश्च्यवनस्य महात्मनः ।
करूषस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥२
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः संबभूव ह ।
नाभागो दिष्टपुत्रस्तु विद्वानासीद्द्वालंदनः ॥३
भलंदनस्य पुत्रोऽभूत्प्रांशुर्नाममहाबलः ।
प्रांशोरेकोऽभवत्पुत्रः प्रजापतिसमो नृपः ॥४
संवर्तेन दिवं नीतः समुहृत्सहबांधवः ।
विवादोऽत्र महानासीत्संवर्त्तस्य वृहस्पतेः ॥५
ऋद्धिं दृष्ट्वा तु यज्ञस्य क्रुद्धस्तस्य वृहस्पतिः ।
संवर्त्तेन तते यज्ञे चुकोप स भृशं तदा ॥६
लोकानां स हि नाशाय दैवतैर्हि प्रसादितः ।
मरुत्तश्चक्रवर्त्ती स नरिष्यंतमवासवान् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—अब आप मनु के पुत्रों का विसर्ग विस्तार के साथ समझ लीजिए। पृषध्र रात्रि में गुरुदेव की गौ की हिंसा करके उसके क्षय होने पर महात्मा च्यवन के शाप से शूद्रता को प्राप्त हो गया था। करूष