संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५६
निर्यातात्सागराः सर्वे नष्टपापा दिवं ययुः ।
एवं सा सागरान्सर्वान्दिवं नीत्वा महानदी ॥५०
तेनैव मार्गेण जवात्प्रयाता पूर्वसागरम् ।
मेरोर्मूध्नँश्चतुर्भेदा भूत्वा याता चतुर्दिशम् ॥५१
चतुर्भेदतया चाभूत्तस्या नाम्नां चतुष्टयम् ।
सीता चालकनंदा च सुचक्षुर्भद्रवत्यपि ॥५२
अगस्त्यपीतसलिलाच्चिरं शुष्कोदका अपि ।
गंगांभसा पुनः पूर्णाश्चत्वारोऽम्बुधयोऽभवन् ॥५३
पूर्यमाणे समुद्रे तु सागरैः परिवर्द्धिते ।
अंतर्हिताऽभवन्देशा बहवस्तत्समीपगाः ॥५४
समुद्रोपांतवर्त्तीनि क्षेत्राणि च समंततः ।
इतस्ततः प्रयाताश्च जनास्तन्निलया नृप ॥५५
गोकर्णमिति च क्षेत्रं पूर्वं प्रोक्तं तु यत्तव ।
अर्णवोपात्तवर्त्तित्वात्समुद्रैंस्तद्विभागमत् ॥५६
ततस्तन्निलयाः सर्वे तदुद्धाराभिकांक्षिणः ।
सह्याद्रेर्भृगुशार्दूलं द्रष्टुकामा ययुर्नृप ॥५७
नरकों में जो घोर यातना पा रहे थे वे सभी सगर के पुत्र समस्त पापों के नष्ट होने से नरक से उसी क्षण में स्वर्ग लोक में चले गये थे। इस रीति से उस महा नदी ने सब सगर सुतों को स्वर्ग में पहुँचा कर फिर वहन करने लगी थी ।५०। उसी मार्ग से बड़े वेग से उसने पूर्व सागर की ओर प्रयाण किया था। मेरु पर्वत के मस्तक से चार भेद होकर वह चारों दिशाओं में गमन कर गयी थी ।५१। उसके चार भेद होने से उसके नाम भी चार हो गये थे। वे नाम में हैं—सीता—अलक नन्दा— सुचक्षु और भद्रवती ये चार नाम हुए हैं ।५२। अगस्त्य मुनि के द्वारा जल पीये जाने पर बहुत समय तक जल के शुष्क ही जाने वाले चारों समुद्र भी गंगा के जल से पुनः परिपूर्ण जल वाले हो गये थे ।५३। समुद्र के पूरित होने पर और सगर सुतों के द्वारा परिवर्द्धित हो जाने पर उसके समीप में स्थित बहुत से